बहुआयामी वीर सावरकर : भाषा शुद्धि का राष्ट्रदर्शन
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बहुआयामी वीर सावरकर : भाषा शुद्धि का राष्ट्रदर्शन

विदेशी प्रभावों से मुक्त होकर अपनी भाषाई अस्मिता को पुनर्स्थापित करने का वीर सावरकर का अभियान केवल शब्दों की शुद्धि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकात्मता की दूरदर्शी संकल्पना था

Written byडॉ. नीरज देवडॉ. नीरज देव
Aug 7, 2026, 12:45 pm IST
inभारत, संघ @100

वीर सावरकर (9) कड़ी

लगभग एक सहस्राब्दी तक रहे मुस्लिम शासन और उसके बाद के अंग्रेजी शासन के प्रभाव से भारतीय भाषाएं अनेक विदेशी शब्दों और अभिव्यक्तियों से प्रभावित होकर अपनी मूल प्रकृति से पर्याप्त दूर चली गई थीं। तब अंग्रेजी का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता था, किंतु अरबी, फारसी और तुर्की के शब्द भारतीय भाषाओं में इतने घुल-मिल गए थे कि उनका विदेशी स्वरूप पहचानना कठिन हो गया। उर्दू ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया। उसकी वाक्य-रचना भारतीय भाषाओं जैसी थी, परंतु शब्दावली मुख्यतः अरबी-फारसी-तुर्की मूल की थी। परिणामस्वरूप अधिकांश भारतीय भाषाएं विदेशी प्रभाव से प्रभावित हो चुकी थीं।

आंदोलनों की पृष्ठभूमि

उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय भाषाओं के शुद्धीकरण और मानकीकरण के प्रयास प्रारंभ हुए। बांग्ला में ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने गद्य को आधुनिक रूप दिया तथा प्रमथ चौधरी ने ‘चलित भाषा’ को प्रतिष्ठित किया। हिंदी में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका के माध्यम से खड़ी बोली हिंदी का परिष्कार किया। मराठी में भाषा-सुधार की परंपरा का सूत्रपात छत्रपति शिवाजी महाराज के राजव्यवहार कोश से हुआ, जिसे आगे विष्णुशास्त्री चिपलूणकर और महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने विकसित किया।

भाषा-शुद्धि की प्रेरणा

सावरकर अपनी भाषा-शुद्धि की प्रेरणा मुख्यतः छत्रपति शिवाजी महाराज और विष्णुशास्त्री चिपलूणकर से प्राप्त मानते थे। उनकी पुस्तक भाषाशुद्धि के मुखपृष्ठ पर शिवाजी महाराज सावरकर को भाषाशुद्धि का दायित्व सौंपते हुए चित्रित हैं। इससे स्पष्ट होता है कि वे भाषा-शुद्धि को केवल भाषाई सुधार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्जागरण का माध्यम मानते थे। साथ ही, बांग्ला और हिंदी के भाषा-सुधार आंदोलनों का भी उनके विचारों पर प्रभाव था।

 कमाल पाशा से प्रेरणा

तुर्की में मुस्तफा कमाल पाशा ने अरबी प्रभाव को कम कर तुर्की भाषा को उसकी स्वदेशी पहचान दिलाने का अभियान चलाया। इस आंदोलन ने सावरकर को भी प्रेरित किया। उल्लेखनीय है कि भाषाशुद्धि के प्रस्तावनाकार तथा वैचारिक विरोधी श्रीकृष्ण क्षीरसागर ने भी स्वीकार किया कि कमाल पाशा की अपेक्षा सावरकर अधिक विद्वान, स्वाध्यायी और मौलिक चिंतक थे। दोनों में समानता केवल इतनी थी कि वे अपने भाषाई आदर्शों को व्यवहार में उतारने के लिए समान रूप से दृढ़ थे।

अभिनव भारत से सार्वजनिक आंदोलन तक

सावरकर ने भाषा-शुद्धि का प्रयोग पहले अपने क्रांतिकारी संगठन अभिनव भारत में आरंभ किया। बैठकों में अनावश्यक अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग वर्जित था। लंदन में यदि कोई सदस्य भूल से भी अंग्रेजी शब्द बोल देता, तो उसे दंडस्वरूप उस दिन की चाय नहीं मिलती थी। इससे स्पष्ट है कि सावरकर के लिए भाषा-शुद्धि केवल सिद्धांत नहीं, अपितु व्यवहार का विषय थी।

अंडमान की सेल्युलर जेल में उन्होंने देखा कि प्रशासनिक कार्यों में उर्दू का वर्चस्व है और अनेक हिंदू बंदी भी उसी का प्रयोग करने लगे हैं। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी हिंदी और देवनागरी के प्रचार का अभियान चलाया, जिसके परिणामस्वरूप वहां हिंदी को सम्मानजनक स्थान मिला।

21 अप्रैल, 1925 से तिलक के केसरी में प्रकाशित ‘मराठी भाषेचे शुद्धीकरण’ लेखमाला से भाषा-शुद्धि आंदोलन का सार्वजनिक आरंभ हुआ। इन लेखों ने मराठी साहित्य-जगत में व्यापक चर्चा छेड़ी। विरोधियों की आपत्तियों के उत्तर में सावरकर ने अनेक लेख लिखे। 1926 में उन्होंने विदेशी शब्दों के स्थान पर भारतीय पर्याय सुझाए, जिनमें विधिमंडल, निर्वाचन, इच्छुक और निवेदन जैसे शब्द स्वतंत्र भारत के सरकारी व्यवहार का अंग बन गए। 1926, 1931 और 1952 में भी उन्होंने अपने आंदोलन पर उठी आलोचनाओं का क्रमबद्ध उत्तर दिया।

भाषाशुद्धि के मूल सिद्धांत

सावरकर ने भाषाशुद्धि की संक्षिप्त परिभाषा देते हुए लिखा-‘हिंदू भाषा संघ छोड़कर अहिंदू भाषाओं के शब्द, चाहे वे पुराने हों या नए, अकारण अपनी भाषाओं में नहीं आने चाहिए।’

इसी आधार पर उन्होंने चार सिद्धांत प्रतिपादित किए-

  1. संस्कृत, संस्कृतोद्भव तथा सभी भारतीय भाषाओं और बोलियों की शब्द-संपदा हमारी राष्ट्रीय शब्द-संपदा है।
  2. जिन विचारों और वस्तुओं के लिए भारतीय भाषाओं में शब्द उपलब्ध हैं या बनाए जा सकते हैं, वहां विदेशी शब्दों का प्रयोग नहीं होना चाहिए।
  3. जिन नई वस्तुओं के लिए उपयुक्त भारतीय शब्द उपलब्ध नहीं हैं, वहां विदेशी शब्द स्वीकार किए जा सकते हैं।
  4. विदेशी भाषाओं की उपयोगी शैली और अभिव्यक्ति को अपनाने में कोई आपत्ति नहीं है।

स्पष्ट है कि सावरकर की भाषाशुद्धि विदेशी भाषाओं के प्रति द्वेष नहीं, किन्तु स्वभाषा के प्रति आग्रह और विवेकपूर्ण गुणग्राहकता पर आधारित थी। मराठी काव्य में उनके द्वारा निर्मित ‘वैनायक वृत्त’ इसी सृजनात्मक दृष्टि का उदाहरण है।

हिंदू भाषा संघ

सावरकर की भाषाशुद्धि केवल मराठी तक सीमित नहीं थी। वे मराठी, हिंदी, बांग्ला, गुजराती, कन्नड़, तमिल, तेलुगु, मलयालम, ओड़िया और असमिया सहित सभी भारतीय भाषाओं को “हिंदू भाषा संघ” कहते थे तथा इनके समस्त शब्द-भंडार को राष्ट्रीय शब्द-संपदा मानते थे। इसलिए इन भाषाओं के बीच शब्दों का आदान-प्रदान वे भाषाशुद्धि के अनुकूल मानते थे। इसके विपरीत उर्दू, अरबी, फ़ारसी, अंग्रेजी, फ़्रेंच और डच जैसी विदेशी भाषाओं के अनावश्यक शब्दों को वे भारतीय भाषाओं के मूल शब्दों के विस्थापन का कारण मानते थे। यही उनके भाषाशुद्धि आंदोलन की प्रमुख कसौटी थी।

सावरकर निर्मित अथवा पुनरुज्जीवित कुछ शब्द

सावरकर का मानना था कि अपनी भाषा में निर्मित नए शब्द आसान, सरल, अर्थपूर्ण व कर्णमधुर होने चाहिए। उसी कसौटी पर रखकर सावरकर ने सैकड़ों नए शब्दों का निर्माण किया व हजारों पुराने शब्द प्रचलित किए। सावरकर स्वयं अपने लेखन, भाषण, संवाद, चर्चा, विमर्शणा सभी भाषिक क्रियाकलापों में देशी शब्दों का कठोरता से उपयोग करते थे। इतना ही नहीं, उनके साथ चर्चा करनेवाले को भी भाषाशुद्धि का स्मरण दिलाते थे। उनका मानना था, शब्दों का उपयोग करते जाओ, शब्द अपने-आप रूढ़ हो जाएंगे।

उदाहरण स्वरूप: प्राचार्य, प्राध्यापक, नौदल, टपाल, दूरध्वनि, दूरमुद्रक, दूरदर्शन, ध्वनिक्षेपक, ध्वनिवर्धक, विधिमंडल, संसद, संसदपटु, अर्थसंकल्प, राजस्व, चित्रपटगृह, मध्यांतर, त्रिमितिपट, नेपथ्य, दिग्दर्शक, वृत्तपट, आवेदन, इतिवृत्त, बंदीवान, मूल्य, संचलन, शिरगणना, विज्ञापन, न्यास, अभ्युत्थान, दिनांक, आजीव, मानचित्र, शुल्क आदि अनेक शब्द। इनमें से अनेक शब्द आज हमारी भाषाओं में इस प्रकार रच-बस गए हैं कि उनके मूल प्रवर्तक का स्मरण भी प्रायः नहीं रहता। यह सावरकर जी की राष्ट्र के प्रति एक अनूठी देन है।

विरोध और समर्थन

सावरकर के भाषाशुद्धि आंदोलन का प्रारंभ में अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने विरोध किया, किंतु गहन अध्ययन के बाद उनमें से अनेक उसके समर्थक बन गए।

मराठी के प्रसिद्ध साहित्यकार माधव ज्युलियन प्रारंभ में भाषाशुद्धि के घोर विरोधी थे। उनका फारसी भाषा पर असाधारण अधिकार था, वे अरबी-फारसी शब्दों को हटाने के पक्ष में नहीं थे। किंतु सावरकर के विचारों का अध्ययन करने के बाद वे भाषाशुद्धि के सबसे मुखर समर्थकों में शामिल हुए। उन्होंने अपने पूर्व प्रकाशित काव्य-संग्रहों का पुनः भाषिक परिष्कार किया, जबकि ऐसा कार्य स्वयं सावरकर ने भी अपने पुराने साहित्य के साथ नहीं किया था।

प्रसिद्ध कवि, नाटककार और व्यंग्यकार, श्रीपाद कृष्ण कोल्हटकर ने मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण में भाषाशुद्धि का विरोध किया। किंतु सावरकर के तर्कपूर्ण उत्तर के बाद वे भी भाषाशुद्धि समर्थक बन गए।

श्रीकृष्ण क्षीरसागर जीवनभर सावरकर की मूल अवधारणा से सहमत नहीं हुए, फिर भी उन्होंने भाषाशुद्धि की प्रस्तावना में सावरकर के इस प्रयास की तुलना छत्रपति शिवाजी, कमाल पाशा और लेनिन जैसे राष्ट्रनिर्माताओं के भाषा-सुधार अभियानों से करते हुए उसकी ऐतिहासिक महत्ता स्वीकार की। न. चि. केलकर जैसे विद्वानों ने भी प्रारंभिक विरोध के बाद भाषाशुद्धि का समर्थन किया।

विरोधियों की प्रमुख आपत्तियां

विरोधियों का पहला आक्षेप यह था कि ‘भाषाशुद्धि’ शब्द से हिंदुत्व की गंध आती है। दूसरा आरोप यह लगाया गया कि यह आंदोलन मुसलमानों के प्रति द्वेष से प्रेरित है। इसके उत्तर में सावरकर ने प्रश्न किया-यदि अंग्रेजी शब्दों को हटाना अंग्रेजों के प्रति द्वेष नहीं माना जाता, तो अरबी-फारसी शब्दों के स्थान पर भारतीय शब्दों के प्रयोग का आग्रह मुसलमानों के प्रति द्वेष कैसे हो सकता है? इस प्रश्न का उनके विरोधी संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके।

माधवराव पटवर्धन ने भाषाशुद्धि ग्रंथ में प्रयुक्त लगभग 98 अरबी-फारसी शब्दों की सूची प्रस्तुत कर बताया कि स्वयं सावरकर भी इन शब्दों से पूरी तरह मुक्त नहीं थे। सावरकर ने इस आलोचना को सहजता से स्वीकार किया, पटवर्धन को स्वयं से बड़ा भाषा-सुधारक कहा और माना कि अनेक विदेशी शब्द अनजाने में उनके लेखन में रह गए थे।

पटवर्धन और क्षीरसागर की दूसरी आपत्ति यह थी कि सावरकर हिंदी, बांग्ला, कन्नड़, असमिया आदि भारतीय भाषाओं के शब्दों को मराठी में स्वीकार करते थे। उनके अनुसार इससे मराठी की स्वायत्तता प्रभावित होती थी। वस्तुतः यही सावरकर की व्यापक राष्ट्रीय भाषा-दृष्टि का आधार था।

‘मराठी का बलिदान करने के लिए हम तैयार हैं’

सावरकर कहते हैं, एक राष्ट्रीय भाषा के निर्माण के लिए “मराठी का एक झटके में बलिदान करने के लिए हम तैयार हैं’-ऐसा निर्भीक कथन शायद ही किसी पुराने या आधुनिक राष्ट्रीय नेता ने कहा हो। इससे भी अधिक आश्चर्य की बात यह है कि इस कथन के बाद भी मराठी समाज का सावरकर के प्रति प्रेम, आदर और श्रद्धा कभी कम नहीं हुई। आज जब हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रश्न पर कुछ प्रांतों में विरोध के स्वर सुनाई देते हैं, तब सावरकर के इस कथन को सहर्ष स्वीकार करने वाला मराठी समाज भारतीय राष्ट्रीयता का उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत करता है।

सावरकर का मानना था कि जिस प्रकार जातिगत भिन्नता हिंदू समाज की एकता में बाधक बन सकती है, उसी प्रकार भाषागत भिन्नता भी राष्ट्रीय एकता को दुर्बल कर सकती है। इसलिए उन्होंने हिंदू भाषा संघ की परिकल्पना प्रस्तुत की, जिससे भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय बढ़े, भाषाई विवाद कम हों और राष्ट्रीय एकात्मता सुदृढ़ हो।

बहुआयामी वीर सावरकर (7) : व्यक्ति नहीं राष्ट्र की बात

वर्तमान संदर्भ में भाषाशुद्धि

आज भारतीय भाषाएं अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव का सामना कर रही हैं। शिक्षा, प्रशासन, मीडिया और दैनिक व्यवहार में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग निरंतर बढ़ रहा है। स्थिति यह है कि हमारी मातृभाषाओं के अंक और अनेक सामान्य शब्द भी नई पीढ़ी को अलग से समझाने पड़ते हैं। ऐसे समय में संघर्ष भारतीय भाषाओं के बीच नहीं, बल्कि अपनी भाषाओं के स्वाभाविक स्वरूप और शब्द-संपदा को सुरक्षित रखने का है।

इस दृष्टि से सावरकर का भाषाशुद्धि आंदोलन तथा हिंदू भाषा संघ की उनकी परिकल्पना आज भी विचारणीय प्रतीत होती है। भारतीय भाषाओं के पारस्परिक सहयोग, स्वदेशी शब्द-संपदा के विकास तथा अनावश्यक विदेशी शब्दों के स्थान पर भारतीय पर्यायों के प्रयोग का उनका आग्रह आज भी भाषिक स्वाभिमान और राष्ट्रीय एकता की दिशा में मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।

सावरकर का भाषाशुद्धि आंदोलन किसी एक भाषा के परिष्कार तक सीमित नहीं था, बल्कि अखिल हिंदू भाषा संघ की संकल्पना के माध्यम से एकमेव अखिल भारतीय राष्ट्रभाषा की स्थापना का दूरदर्शी राष्ट्रीय अभियान था। इस दृष्टि से सावरकर एक अखिल भारतीय राष्ट्रभाषा के प्रथम द्रष्टा सिद्ध होते हैं।

बहुआयामी वीर सावरकर : राष्ट्रजागरण के पत्रकार

 

Topics: राष्ट्रभाषा और देवनागरीस्वदेशी शब्दावलीveer savarkarभाषाई स्वाभिमानअभिनव भारतकमाल पाशापाञ्चजन्य विशेषराष्ट्रीय एकात्मताभाषाई अस्मितासंघ के 100 वर्षसांस्कृतिक पुनर्जागरणभाषा शुद्धि आंदोलनहिंदू भाषा संघ
डॉ. नीरज देव
डॉ. नीरज देव
(दशग्रंथी सावरकर इस पीएचडी समकक्ष उपाधि से तथा महाराष्ट्र शासन-विवेक व्यासपीठ द्वारा ‘सावरकर वीरता’ पुरस्कार से सन्मानित) [Read more]
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