यह श्लोक प्राचीन हिंदू ग्रंथ महाभारत के उद्योगपर्व (विदुर नीति / विदुर प्रज्ञा) से लिया गया है।
श्लोक :
न हि दैवेन सिध्यन्ति कार्याण्येकेन सत्तमः।
न चापि कर्मणैकेन द्वाभ्यां सिद्धिस्तु योगतः॥
भावार्थ :
केवल दैव अर्थात् अकेले भाग्य भरोसे कभी भी कार्य सिद्ध नहीं होते और न ही केवल पुरुषार्थ (कर्म) के द्वारा अकेले सिद्धि प्राप्त होती है। सिद्धि तो दोनों (भाग्य एवं पुरुषार्थ) के योग से प्राप्त होती देखी गई है।
श्लोक की प्रासंगिकता (Relevance):
यह श्लोक जीवन के सबसे बड़े सत्यों में से एक को रेखांकित करता है। यह हमें यह सिखाता है कि सफलता के लिए केवल भाग्य या भगवान के भरोसे बैठे रहना (अकर्मणि होना) और केवल अपने परिश्रम पर ही पूर्ण अहंकार करना—दोनों ही स्थितियां अधूरी हैं। एक सफल, संतुलित और सार्थक जीवन के लिए ईश्वरीय कृपा (भाग्य) और मानव प्रयास (पुरुषार्थ/कर्म) दोनों का समन्वय आवश्यक है। जब व्यक्ति पूरी निष्ठा और ईमानदारी से कर्म करता है, तभी भाग्य भी उसका साथ देता है।
















