यह श्लोक भी सनातन संस्कृति के नीति-साहित्य और विवेकपूर्ण कर्म-मीमांसा (Duty & Ethical Dilemma) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
श्लोक :
इह मे किं नु कर्तव्यमकर्तव्यं किमस्ति च।
इति चिन्तयतां पुंसां कर्म शुद्धं भवेद् ध्रुवम्॥
भावार्थ :
संसार में मेरा क्या कर्तव्य है, मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए – इस तरह विचार करने वालों के कर्म शुद्ध हो जाते हैं, यह निश्चत है।
प्रासंगिकता (Relevance)
आत्म-विश्लेषण और सजगता (Self-Reflection): यह श्लोक सिखाता है कि कोई भी कदम उठाने से पहले ‘क्या सही है और क्या गलत’ (कर्तव्य और अकर्तव्य) पर विचार करना व्यक्ति को जल्दबाज़ी और पश्चाताप से बचाता है।
कर्मों की शुद्धि : जब व्यक्ति बिना सोचे-समझे केवल स्वार्थ या आवेश में कर्म नहीं करता, बल्कि नीति और विवेक की कसौटी पर परखकर निर्णय लेता है, तो उसके कर्म स्वतः ही निष्पादित और शुद्ध हो जाते हैं।
संदेह और दुविधा का निवारण: आज के आधुनिक जीवन में जहां हर मोड़ पर नैतिक दुविधाएँ (Ethical Dilemmas) आती हैं, यह श्लोक मनुष्य को आंतरिक विवेक (Conscience) का उपयोग करने की प्रेरणा देता है।
11
श्लोक :
यद् यत् परवशं कर्म तत्तद्यत्नेन वर्जयेत्।
यद् यदात्मवशं तु स्वात् तत्तत्सेवेत यत्नतः॥ 11
भावार्थ :
जो-जो कर्म परवश हों, उन्हें कभी न करे। जो जो कार्य स्ववश हो, उन्हें यत्न से करना चाहिए। 11
12
श्लोक :
यत् कृत्वा न भवेद् धर्मो न कीर्तिर्न यशो ध्रुवम्।
शरीरस्य भवेत् खेदो न तत् कर्म समाचरेत्॥ 12
भावार्थ :
जिस कार्य को करने से न धर्म होता हो, न कीर्ति, न यश केवल शरीर को कष्ट देता है उस कर्म का आचरण नहीं करना चाहिए। 12

















