संभवतः 2020 की बात है। जब अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भारत की मीडिया रैंकिंग के लिए यहां के मीडिया का जायजा ले रही थीं, तब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कुछ वरिष्ठ पत्रकारों की एक समिति बनाई थी। पीआईबी महानिदेशक की देखरेख में बनी इंडेक्स मॉनिटरिंग सेल नामक व्यवस्था में विभिन्न मुद्दों पर बात हुई। कुछ पत्रकारों ने अभिव्यक्ति और पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर अपना पक्ष रखा।
मेरा सवाल तब भी यही था और आज भी यही है-किसी रैंकिंग से पहले यह तय होना चाहिए कि पत्रकार कौन है, मीडिया संस्थान किसे माना जाए और वास्तविक पत्रकारिता की कसौटी क्या हो? आज सीजेपी के कथित आंदोलन और जंतर-मंतर के प्रदर्शनों में भी ‘पत्रकारों’ के मुद्दे पर सवाल उठ रहे हैं। इसलिए मूल प्रश्न अब भी वही है। यह अस्पष्टता उपद्रव और अव्यवस्था बढ़ा रही है। आम लोगों के मन में आंदोलन, उसके मुद्दों, आंदोलनकारियों और पत्रकारिता को लेकर असमंजस पैदा हो रहा है। यह स्थिति माहौल बिगाड़ने वालों के लिए तो अच्छी हो सकती है, किंतु लोकतंत्र और प्रशासन के हित में इसे समय रहते सुलझाना जरूरी है।
2020 में मैंने समिति के सामने जो प्रश्न रखे थे, वे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। पहला सवाल यह है कि पत्रकार किसे माना जाए और पत्रकारिता की स्वतंत्रता के नाम पर कितनी छूट दी जाए?
दिल्ली के हालिया प्रदर्शनों में हाथ में माइक्रोफोन, सामने कैमरा और ‘स्वतंत्र पत्रकार’ का परिचय-क्या इतना ही पत्रकार होने के लिए पर्याप्त है? जो व्यक्ति प्रदर्शनकारियों के साथ नारे लगाता है, उनकी रणनीति में शामिल होता है, और फिर कैमरा लेकर पुलिस से सवाल करने पहुंचता है, वह पत्रकार है या आंदोलनकारी?
किसी के आंदोलन की बात रिकॉर्ड करने या उसे लोगों तक पहुंचाने में कोई बुराई नहीं। आपत्ति तब है जब वह अपनी असली भूमिका छिपाकर स्वतंत्र पत्रकार की पहचान और सुविधाएं मांगे। पत्रकार का काम किसी पक्ष की आवाज मात्र बनना नहीं, बल्कि उसके दावों को परखना भी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर क्या संविधान किसी को यह अधिकार देता है कि वह पुलिसकर्मियों को घेरे, उनके काम में बाधा डाले और टकराव पैदा कर उसी को खबर बना दे?
निश्चित रूप से नहीं। संविधान शांतिपूर्ण विरोध और स्वतंत्र अभिव्यक्ति की रक्षा करता है, अराजकता की नहीं। यदि दिल्ली पुलिस संवेदनशील स्थल पर विशेष मीडिया सुविधा चाहने वाले व्यक्ति से पहचान पूछे और सुरक्षित दूरी रखने को कहे, तो उसे सीधे सेंसरशिप नहीं कहा जा सकता। हां, इसी व्यवस्था के नाम पर वास्तविक पत्रकारों को रोकना भी अनुचित होगा। सवाल कैमरे पर प्रतिबंध का नहीं, कैमरे के पीछे खड़े व्यक्ति की भूमिका और आचरण का है।
दूसरा सवाल और भी महत्वपूर्ण है। जिस आंदोलन को स्वतःस्फूर्त जनाक्रोश बताया जा रहा है, उसके पीछे संगठन, प्रचार और पैसे की क्या व्यवस्था है? आज किसी मुद्दे को बड़ा बनाने के लिए केवल नारे और पोस्टर पर्याप्त नहीं हैं। पीआर एजेंसियां, राजनीतिक प्रचार दल और डिजिटल माध्यमों पर सक्रिय प्रभावशाली लोग कुछ ही घंटों में किसी विषय को चर्चा का केंद्र बना सकते हैं। इसलिए सीजेपी प्रदर्शन के आयोजकों से पूछना स्वाभाविक है कि आंदोलन का आह्वान किसने किया, प्रचार सामग्री किसने बनाई, एक जैसी भाषा वाले संदेश कई माध्यमों तक कैसे पहुंचे, और वीडियो बनाने वालों को सामग्री कहां से मिली? क्या किसी पेशेवर प्रचार एजेंसी की भूमिका रही?
जुलाई 2026 के प्रदर्शनों के दौरान दूसरे राज्यों से ऑनलाइन भुगतान से भोजन भेजे जाने की खबरें भी आईं। स्वैच्छिक सहायता में कुछ गलत नहीं है, लेकिन यह जानना जरूरी है कि भोजन, परिवहन, ठहराव, प्रचार और अन्य व्यवस्थाओं का वास्तविक खर्च कितना था और उसे किसने उठाया? क्या राजनीतिक दलों ने वित्तीय मदद दी? क्या किसी एजेंसी को प्रचार का ठेका मिला? क्या कुछ प्रभावशाली लोगों को सामग्री बनाने या प्रसारित करने के बदले भुगतान हुआ?
अभी इन सवालों के उत्तर प्रमाणित रूप से सामने नहीं हैं। विपक्षी दलों की भागीदारी को ही छिपे वित्तपोषण का प्रमाण मान लेना भी सही नहीं। पर यदि खर्च और प्रचार तंत्र पारदर्शी है, तो उसका हिसाब सामने आने में कठिनाई क्यों होगी? स्वैच्छिक जनसहयोग और पैसे देकर जुटाई गई भीड़ में बड़ा अंतर है, और इसे सामने लाना आंदोलनकारियों व जनता, दोनों के हित में है।
तीसरा सवाल पत्रकारिता की बदलती प्राथमिकताओं से जुड़ा है। आज खबर महत्वपूर्ण है या उसे देखने वालों की संख्या? स्मार्टफोन ने सामान्य नागरिक को अपनी बात लाखों लोगों तक पहुंचाने का अवसर दिया है। यह अच्छी बात है, लेकिन इसके साथ एक नई प्रतिस्पर्धा भी शुरू हुई है। कौन अधिक उत्तेजक सवाल पूछ सकता है, कौन पुलिस के साथ टकराव का दृश्य बना सकता है और किसका वीडियो सबसे तेजी से फैल सकता है?
मान लीजिए, एक पत्रकार किसी घटना की जानकारी जुटाता है, दस्तावेज पढ़ता है, पुलिस और प्रदर्शनकारियों दोनों से बात करके समाचार देता है। दूसरा व्यक्ति सीधे किसी पुलिसकर्मी को घेरकर लगातार उत्तेजक सवाल पूछता है। बात बढ़ती है और धक्का-मुक्की का वीडियो सामने आ जाता है। दूसरा वीडियो संभवतः अधिक देखा जाएगा, लेकिन क्या उसे बेहतर पत्रकारिता कहा जाएगा?
दिल्ली में एसीपी विवेक भगत से संबंधित कथित फर्जी वीडियो प्रसारित करने के मामले में हुई गिरफ्तारी इसी खतरे की ओर ध्यान खींचती है। आरोपों का अंतिम फैसला अदालत करेगी, लेकिन किसी अधिकारी या नागरिक की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली अपुष्ट सामग्री प्रसारित करने की जवाबदेही का प्रश्न तो उठेगा ही। क्या पहले से तय राजनीतिक उद्देश्य के लिए वीडियो के चुनिंदा हिस्से दिखाना समाचार है? क्या किसी घटना का पूरा संदर्भ छिपाकर सनसनी पैदा करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जिम्मेदार उपयोग है? और सबसे जरूरी बात, यदि वीडियो बनाने वाले को किसी राजनीतिक संगठन या प्रचार एजेंसी से भुगतान मिल रहा है तो क्या दर्शकों को इसकी जानकारी नहीं होनी चाहिए? लोकप्रियता और विश्वसनीयता एक ही चीज नहीं हैं। लाखों लोगों द्वारा देखा गया वीडियो भी गलत हो सकता है।
चौथा सवाल उन युवाओं से है जो ऐसे प्रदर्शनों में शामिल होते हैं। क्या उनकी राय अपने अध्ययन और समझ से बन रही है या कोई दूसरा उनके लिए मुद्दे और निष्कर्ष तय कर रहा है? भारत में छात्र आंदोलनों का अपना इतिहास है। युवाओं ने समय-समय पर सत्ता से कठिन सवाल पूछे हैं और लोकतंत्र को नई दिशा दी है। इसलिए हर प्रदर्शनकारी युवा को किसी की कठपुतली मान लेना न उचित है, न न्यायसंगत। पर यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि जिस मुद्दे पर वह सड़क पर उतरा है, उसकी जानकारी उसे कहां से मिली? यदि निर्वाचन आयोग पर आरोप लगाया गया है, तो क्या उसने आयोग का पक्ष भी पढ़ा? क्या मूल दस्तावेज देखे? क्या उस नेता का पूरा भाषण सुना, जिसके तीस सेकंड का हिस्सा वायरल हुआ? क्या उसे पता है कि आरोप लगाने वाले ने अपने दावे के समर्थन में कौन-से प्रमाण दिए हैं?
आज राजनीतिक प्रचार का बड़ा हिस्सा भावनाएं जगाने पर टिका है। चुनिंदा वीडियो, उत्तेजक नारे और बार-बार दोहराए गए संदेश लोगों की राय प्रभावित कर सकते हैं। यदि इसके पीछे संगठित प्रचार तंत्र सक्रिय है, तो उसके उद्देश्य और आर्थिक हित भी समझने चाहिए। युवाओं को केवल इसलिए किसी अभियान का समर्थन नहीं करना चाहिए कि हजारों लोग उसके साथ हैं। युवा का अपना विवेक ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। सवाल यह है कि हमारी राजनीति और पत्रकारिता उस विवेक को मजबूत कर रही हैं या उसे तैयार संदेशों का उपभोक्ता बना रही हैं?
पांचवां और अंतिम सवाल पूरे मीडिया जगत से है। दुनिया की कई संस्थाएं प्रेस की स्वतंत्रता के आधार पर देशों की रैंकिंग करती हैं। ऐसी निगरानी जरूरी है, पर क्या इसकी प्रक्रिया पर सवाल नहीं पूछे जाने चाहिए? मूल्यांकनकर्ता संस्थाओं को धन कहां से मिलता है, विशेषज्ञ कैसे चुने जाते हैं, किन पत्रकारों और माध्यमों से राय ली जाती है, और भारतीय भाषाओं व छोटे शहरों की पत्रकारिता को कितना महत्व मिलता है? ये उत्तर भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितना किसी देश का स्थान।
भारत को अपने भीतर भी देखना होगा। मीडिया संस्थान किसे मानें? क्या समाचार नाम से डिजिटल पेज बनाने वाला व्यक्ति पत्रकार हो जाता है? क्या किसी राजनीतिक दल के लिए भुगतान लेकर सामग्री बनाने वाला प्रचारक स्वयं को स्वतंत्र पत्रकार कह सकता है? क्या स्थापित मीडिया संस्थान अपने पत्रकारों को उचित वेतन, सुरक्षा और संपादकीय स्वतंत्रता दे रहे हैं? क्या उनके स्वामित्व और वित्तीय हितों की जानकारी सार्वजनिक है? क्या गलत समाचार सुधारने की व्यवस्था है?
भारत को ऐसी स्वतंत्र राष्ट्रीय मीडिया मूल्यांकन प्रणाली विकसित करनी चाहिए, जिसमें पत्रकारों की स्वतंत्रता के साथ समाचारों की विश्वसनीयता, संस्थागत जवाबदेही, वित्तीय पारदर्शिता और पेशेवर आचरण भी परखे जाएं। इसका अर्थ पत्रकारिता के लिए सरकारी अनुमति अनिवार्य करना नहीं, बल्कि जनता को वास्तविक पत्रकारिता और प्रायोजित प्रचार में अंतर समझने का आधार देना है।
सीजेपी प्रदर्शन ने यही पुराना, पर महत्वपूर्ण सवाल फिर उठाया है। कैमरा लेकर जनता के सामने खड़ा व्यक्ति सच खोज रहा है, किसी आंदोलन में भाग ले रहा है, या किसी राजनीतिक-आर्थिक हित के लिए जनमत प्रभावित कर रहा है? इन भूमिकाओं में अंतर करना आज सबसे जरूरी है। पत्रकारिता की स्वतंत्रता बनी रहे, लेकिन पत्रकारिता के नाम पर काम करने वालों से उनकी भूमिका और आर्थिक संबंधों के बारे में सवाल पूछने की स्वतंत्रता भी बनी रहनी चाहिए।
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