सुप्रीम कोर्ट पर व्यंग्य के जरिये पनपी कॉकरोच जनता पार्टी अपने रास्ते से भटकती दिख रही है। शिक्षा और रोजगार के नाम पर शुरू हुआ इसका वर्चुअल आंदोलन जमीन पर आते ही राजनीतिक रंग लेने लगा। महज तीन महीने के अंदर सीजेपी के मुद्दे बदल गए, केंद्र और जहां-जहां भाजपा की सरकार है, वहां-वहां विरोध ने जनता के बीच यह साफ किया कि इसका भी उद्देश्य राजनीतिक प्रतीत होता है। आम आदमी पार्टी और विपक्ष के अन्य नेताओं का समर्थन इसे मिलना शुरू हुआ।
राजस्थान का तबेले वाला वीडियो और कर्नाटक के तबेले वाले वीडियो पर इसकी प्रतिक्रिया को सभी ने देखा। पंजाब में इसके नेता सौरभ दास द्वारा एक स्कूल के बारे में जो वीडियो अपलोड किया गया, उससे जनता का समर्थन और कम हुआ। सीजेपी के नेता सोशल मीडिया पर बार-बार आकर संविधान और लोकतंत्र की बात करते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि जनता सब समझती है। नीट आंदोलन और चुनाव आयोग दोनों अलग मुद्दे हैं। भारत की यह खूबी रही है कि उसने इंदिरा गांधी को भी हराया था, जिन्हें आयरन लेडी कहा जाता है।
सचाई को क्यों नहीं कर रहे स्वीकार
छात्रहित से शुरू हुआ आंदोलन राजनीति की रपटीली राहों में फिसल चुका है। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगने लगे। जबकि यह साफ है कि एसआईआर की अनुमति सुप्रीम कोर्ट ने भी दी है। वोट चोरी नहीं हो रही है, यह कई बार साबित हो चुका है। उपचुनाव में भाजपा के पक्ष में प्रचंड जनसमर्थन इसका एक और सबूत है।
मोदी सरकार का विरोध करने वाले जर्मन यूट्यूबर ध्रुव राठी भी 10 अक्तूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से एक दिन पहले इंडिया गेट से वीडियो पोस्ट करते हैं। इस बार भारत माता के नारे को आगे किया गया। लेकिन यह भी काम नहीं आया। आईजीआई एयरपोर्ट पर जब दिल्ली पुलिस अभिजीत दीपके के पास पहुंची तो उन्होंने गिरफ्तार करो कहकर विरोध किया, लेकिन पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया। उनसे बस सहयोग करने के लिए कहा। इससे पहले भी दिल्ली पुलिस को बदनाम करने की पूरी चालें चली गईं, लेकिन पुलिस ने धैर्य से काम लिया।
जनता ने किया सहयोग
10 अक्तूबर को जंतर-मंतर पर बड़े स्तर पर भीड़ जुटाने का दावा करने वाली सीजेपी की टीम को जनता का समर्थन न मिलने के पीछे ये बड़े कारण रहे। दिल्ली पुलिस के डीसीपी (स्पेशल सेल) नारा चैतन्य का शनिवार दोपहर करीब एक बजे बयान आया कि हम इंडिया गेट पर हैं और स्थिति शांत है। कोई भीड़ नहीं है। लोगों को पता है कि BNSS की धारा 163 लागू है और किसी भी तरह का विरोध-प्रदर्शन, भीड़ जमा करना या जुलूस निकालना मना है। लोग सुबह से ही सहयोग कर रहे हैं। कोई गलत गतिविधि या ऐसी कोई चीज़ नहीं हुई है। हालात काबू में हैं।
बिना अनुमति प्रदर्शन की जिद, CJP की स्टंटबाजी पर उठे सवाल
दिल्ली पुलिस के अनुसार, प्रदर्शन के लिए कम से कम 10 दिन पहले सूचना देना आवश्यक था जोकि नहीं किया गया। पुलिस ने बताया कि सीजेपी के साथ पिछला अनुभव ठीक नहीं था। तीन दिन पहले सौरभ दास का बयान आया कि हम सूचना देने नहीं, बताने गए थे। देश संविधान से चलता है न कि अराजकता से। निर्धारित समय पर सूचना नहीं मिलने के कारण प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई। इसके बावजूद CJP की ओर से प्रदर्शन की कोशिश की गई। सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए मेट्रो बंद की गई, ट्रेनें कैंसल हुईं। सीजेपी की स्टंटबाजी से आम नागरिकों को परेशानी हुई। नियम यही कहता है कि अनुमति लें और फिर प्रदर्शन करें। इसके बाद भी यदि अनुमति न मिले तो जनता के बीच जाएं। लोकतंत्र में लोक का ही सिस्टम है।
राजनीतिक खेल से बचें
अभिजीत दीपके ने इस साल अगस्त में महाराष्ट्र के हिंगोली जिले के संतुक पिंपरी गांव से कथित ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान की शुरुआत की थी। बुनियादी सुविधाएं सभी को मिलनी चाहिए, यह जरूरी है। लेकिन इसकी आड़ में राजनीतिक खेल नहीं खेला जाना चाहिए। सीजेपी का आंदोलन चुनाव आयोग जैसे राजनीतिक मुद्दों पर पहुंच गया है। सीजेपी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण प्रकिया पर सवाल उठाए। अभिजीत दीपके ने कहा कि लोकतंत्र में जनता सरकार चुनती है, लेकिन आयोग यह तय कर रहा है कि कौन वोट देगा और कौन नहीं। आरोप के अलावा एक पक्ष यह भी है कि अभिजीत दीपके औक कॉकरोच जनता पार्टी की ही बात को क्यों सच माना जाए? यह फैसला तो जनता करती है और कोर्ट।
सीजेपी पर इसलिए उठ रहे सवाल
सीजेपी की सक्रियता पहले शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सार्वजनिक मुद्दों पर थी। सीजेपी से जुड़े लोगों ने इस साल जुलाई में नीट परीक्षा लीक के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के साथ प्रदर्शन भी किया। लेकिन अब चुनाव आयोग को लेकर उनका विरोध यह सवाल खड़ा करता है कि क्या सामाजिक समस्याओं को उठाने वाले अभियान धीरे-धीरे व्यापक राजनीतिक आंदोलनों का रूप ले रहे हैं? क्या दीपके शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सामाजिक मुद्दों का फायदा उठाकर राजनीति में प्रवेश करना चाहते हैं? यह तो सभी जानते हैं कि अभिजीत दीपके और आशुतोष रांका आम आदमी पार्टी का हिस्सा रह चुके हैं? सवाल यह भी है कि क्या ऐसा वह राजनीति में आने के लिए कर रहे हैं?
क्या बच्चों के भविष्य की चिंता करना नाटक था?
कॉकरोच जनता पार्टी का स्कूलों से चुनाव आयोग तक पहुंचना उसके अभियान के बदलते स्वरूप को दर्शाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वह सच में स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं में सुधार चाहती है? क्या उन्हें बच्चों के भविष्य की चिंता है? या फिर यह सब उन्होंने केवल सुर्खियों में बने रहने के लिए किया? लोकतंत्र में सरकार, प्रशासन और चुनाव आयोग की जवाबदेही पर सवाल उठाना नागरिक अधिकारों का हिस्सा है। लेकिन बिना किसी ठोस तथ्य और प्रमाण के आरोप लगाकर चर्चा में बने रहना कहीं से भी उचित नहीं। इससे आम जनता का विश्वास जीतने के बजाय पार्टी की ही छवि धूमिल होती है।
लाशों पर राजनीति करने का लगा आरोप
पिछले कुछ महीनों में मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में संक्रामक बीमारियों के चलते कई बच्चों की मौत हो गई। इसको लेकर इस साल सितंबर में कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने जनजातीय गांवों का दौरा किया। इस दौरान अभिजीत दीपके संक्रमित बच्चों को लेकर स्थानीय पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवालों का एक भी जवाब नहीं दे पाए। पत्रकारों के समूह ने उस समय उन पर लाशों पर राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने गाड़ी में बैठे दीपके से कहा था, ”आ गए लाशों पर राजनीति करने, अब सुध मिली है आपको, कितना समय हो चुका है, आप अब आएं हैं अपनी संवेदनाएं व्यक्त करने के लिए। कंटेंट मिल गया आपको ये बताइए।” इतने सवाल वो भी एक साथ सुनकर दीपके अपनी गाड़ी लेकर वहां से भाग गए थे।















