फ्रांस में वर्ष 1789 का उदाहरण आज तक दिया जाता है, जनता सड़कों पर थी और रानी के खिलाफ गुस्सा था, क्योंकि देश में अन्न का संकट था, आज 2026 में भी फ्रांस की कथित जनता सड़कों पर है, क्योंकि स्कूलों में आधारभूत सुविधाओं का अभाव है।
रोटी का संकट भी सच था, और वर्तमान में फ्रांस में स्कूलों में समस्याएं भी असली हैं। क्रोध असली है, परंतु क्या इन समस्याओं से लड़ने वाले लोग बिना एजेंडे के हैं? क्या देश के घरेलू संकट या कहें स्थानीय असंतोष का प्रयोग वामपंथी ताकतें अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने में तो नहीं कर रही हैं?
यह बड़ा प्रश्न खड़ा होता है उसी पैटर्न से जो वर्ष 1789 से लगातार चलता चला आ रहा है, कि स्थानीय समस्याओं को भुनाकर सत्ता हासिल करना, जैसे कि वर्ष 1789 में जैकोबिंस ने किया था। वर्तमान में फ्रांस में जो छात्र आंदोलन चल रहा है, उसे लेकर फॉक्स न्यूज ने जो खुलासा किया है, वह स्थानीय समस्याओं के इर्दगिर्द फेक न्यूज के आधार पर बड़े एजेंडे बनाने के पूरे षड्यन्त्र को दिखाता है।
इस रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस के इस छात्र आंदोलन में से अब छात्र तो लगभग पूरी तरह से गायब हो गए हैं और वामपंथी संगठन सक्रिय हैं। फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट जहां यह बताती है कि फ्रांस में छात्रों के दंगों के पीछे वामपंथी संगठन और एक वैश्विक प्रोपागैंडा नेटवर्क है।
क्या कहती है फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट?
फॉक्स न्यूज ने 9 अक्टूबर की अपनी एक रिपोर्ट में यह दावा किया कि इस आंदोलन में चरमपंथी लेफ्ट कम्युनिस्ट और समाजवादी संगठनों का नेटवर्क है। इसमें एक अल्पज्ञात पोर्टल BreakThrough News के गुरुवार के एक ब्रेकिंग अलर्ट का उल्लेख किया, जिसमें लिखा था कि “फ्रांसीसी छात्रों ने पेरिस में बैस्टिल स्क्वेर में भारी संख्या में इकट्ठे हुए!”
फॉक्स न्यूज डिजिटल की पड़ताल में इसी पोर्टल ने अपनी वेबसाइट पर एक और हेडलाइन चलाई, जिसमें लिखा था कि “फ्रांस के छात्रों ने सरकार के खिलाफ ऐतिहासिक रूप से स्कूल बंद कराए और उन्हें संगठनों और “प्रोग्रेसिव फोर्सेस अर्थात प्रगतिशील ताकतों” के समर्थन मिला।
और ये प्रगतिशील ताकतें केवल छात्रों की नहीं है बल्कि ये ताकतें चरमपंथी वामपंथी ताकते हैं। इस पड़ताल में यह उभर कर आया कि फ्रांस मे इस कथित आंदोलन में 50 के लगभग संगठन सक्रिय हैं। उनका पूरा ईकोसिस्टम सक्रिय है। इनमें केवल 15 संगठन ही छात्र संगठन हैं। यह ऐसा ईकोसिस्टम है, जो प्रदर्शन आरंभ करने वाले छात्रों से कहीं अधिक है और बड़ा है। इन 15 छात्र संगठनों में ही कई कम्युनिस्ट छात्र और मुस्लिम छात्र समूह हैं।
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और जो शेष 35 समूह हैं, उनमें एक दर्जन से अधिक श्रम संगठन, आठ कम्युनिस्ट या समाजवादी संगठन, पाँच ऐसे संगठन हैं, जो करों से लेकर ऐड्वकसी की बात करते हैं, पर्यावरण एक्टिविजम, आर्थिक न्याय, अंतर्राष्ट्रीय मीडिया और डायसपोरा संगठन हैं, पाँच नगरिक अधिकार या मानवाधिकार समूह हैं, चार राजनीतिक दल, जिनमें फ्रेंच कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल है; एक फिलिस्तीन ऐड्वकसी समूह, जो मुसलमानों और वामपंथियों के “लाल-हरे गठबंधन” को पूरा करता है।
कौन है मास्टरमाइंड?
जब इतने संगठन काम कर रहे हैं, तो यह भी स्पष्ट होता है कि आखिर इन सब घटनाओं का मास्टरमाइंड कौन है? जिस व्यक्ति का नाम निकलकर आ रहा है, उसका भारतीय कनेक्शन बहुत रोचक है। फॉक्स न्यूज के अनुसार इन सभी का मास्टर माइंड और कोई नहीं बल्कि चीन का कम्युनिस्ट खरबपति नेविले रॉय सिंघम है, जिस पर भारत में भी कार्यवाही चल रही है, जो भारत में भी वांटेड है! यह जो लाल हरा गठबंधन है, इसमें फ्रांस के क्लासरूम्स और श्रम संघ से लेकर ग्रीस और ब्रिटेन में वामपंथी संगठन, अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी मीडिया आउटलेट्स, जैसे कि BreakThrough News शमैल हैं, और यह बताता है कि कैसे एक स्थानीय असंतोष को पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, पुलिस, सेना व्यय और इजरायल जैसे मुद्दों तक विस्तारित कर दिया जाता है।
यह और भी हैरानी की बात है कि जिस देश में वामपंथ शब्द का जन्म हुआ, और जहां पर सड़कों पर प्रदर्शन का एक लंबा इतिहास रहा हो, वह एक बार फिर से सड़कों पर प्रदर्शन कर रहा है और उन राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों की मांग कर रहा है, जो शायद मौजूदा लेफ्ट संस्थानों से परे हों। हालांकि, ला फ्रांस इंसुमिस पार्टी के वर्ष 2027 के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जीन-ल्यूक मेलांशों अपने भाषणों में यह वादा कर रहे हैं कि यदि उन्हें चुना जाता है तो वे ऐसा फ्रांस बनाएंगे जहां पर नस्ल और रंगभेद तो होगा ही नहीं, बल्कि नए फ्रांस में इस आधार पर भी नागरिकों में भेद नहीं होगा कि वे मूलत: किस देश से थे!
उन्होनें कल ही एक्स पर अपने भाषण को पोस्ट किया है। जिसमें वे कह रहे हैं कि वे जनमत से सरकार चलाएंगे और रीकॉल जनमत संग्रह भी कराएंगे, जिससे कि उन लोगों को बाहर निकाला जा सके, जिन्हें वे नहीं चाहते हैं। उन्होनें कहा कि वे ईको रीजंस के साथ ईकोलॉजिकल राज्य का निर्माण करेंगे! हालांकि यह इसी वर्ष अगस्त 2026 में दिया गया भाषण है।
इस वाक्य को समझना आवश्यक है। उन्होनें अपने यहाँ लोगों से कहा कि वे ईकोलॉजिकल राज्य का निर्माण करेंगे अर्थात भूमि पर खींची गई लकीरों के हिसाब से नहीं, बल्कि विचार से होगा। उन्होनें यह भाषण अपनी पार्टी के सालाना समर यूनिवर्सिटी के समापन के दौरान दिया था। जिसे उनका आधिकारिक प्रचार आरंभ करने वाला भाषण भी कहा जा सकता है। और सबसे हैरत की बात है कि उन्होनें अपने लंबे भाषण की यही क्लिपिंग क्यों उस समय साझा की जब फ्रांस में छात्र और छात्रों की आड़ में 50 अन्य संगठन सड़कों पर हैं? क्यों उन्होनें कहा कि वे फ्रांस के मौजूदा ढांचे के स्थान पर ईको-रीजन बनाना चाहते हैं?
और क्या है फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट में?
फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट परत दर परत शब्दों के जाल को भी बताती है। एक चरमपंथी वाम पर्यावरण समूह Les Soulèvements de la Terre, या “Earth Uprisings,” ने दंगों के बीच ही छात्रों के लिए “Glory to the rebellious high school students” कहा था। और साथ ही कहा था कि “एक फासीवादी विरोधी क्रांति के लिए”
हेरिटेज फाउंडेशन में एक वरिष्ठ रिसर्च फ़ेलो माइक गोनजलेज ने फॉक्स न्यूज से कहा कि इन सभी का उद्देश्य हमें डिसमेंटल करना है। माइक ने भी 1789 की क्रांति का उल्लेख करते हुए कहा कि “स्पष्ट है कि 1789 में रक्तपात वाली हिंसा हुई थी।“
विरोध का अधिकार और अधिकारियों का शामिल होना
सितंबर अंत से ही वामपंथी राजनीतिक पार्टी ला फ्रांस इंसुमिस से राजनेताओं को पेरिस के कम आय वाले उप शहर Seine-Saint-Denis में सड़कों पर अवरोध पैदा करते हुए देखे जा रहे थे। फ्रांसीसी-मोरक्कियन पत्रकार नोरा बुससीगनी ने लिखा था कि ला फ्रांस इंसुमिस से कई निर्वाचित अधिकारियों ने असल में स्टूडेंट प्रोटेस्ट को अपने साथ मिलाने का काम किया है, और उन्हें काबू से बाहर होते देखने का खतरा भी उठाया है: आग को हवा देकर, पुलिस जैसी संस्थाओं को बदनाम करके, और पॉलिटिकल हिंसा के सिद्धांत को सही ठहराकर।”
और उसके एकदम बाद से ही अचानक चरम वामपंथी समूहों ने कई सेकन्डेरी स्कूल विद्यार्थियों और समर्थकों से अपील की कि वे 6 अक्टूबर को पेरिस चलें। और तब तक पूरे फ्रांस में प्रदर्शन फैल चुके थे।
6 अक्टूबर के आंदोलन में विद्यार्थियों को लाने का काम यूनियन सिंडिकेल लाइसीन, या हाई स्कूल स्टूडेंट्स यूनियन; यूनियन एटुडिएंट, या स्टूडेंट यूनियन; फ़ेडरेशन डेस एसोसिएशन्स जेनरल एटुडिएंट्स, या फ़ेडरेशन ऑफ़ जनरल स्टूडेंट एसोसिएशन्स; और यूनियन नेशनेल डेस एटुडिएंट्स डी फ़्रांस, या नेशनल यूनियन ऑफ़ स्टूडेंट्स ऑफ़ फ़्रांस जैसे संगठनों ने किया। और इस भीड़ का समर्थन करने वाली लॉबी यहीं तक नहीं है।
पहले ये किशोर सड़कों पर उतरे और उसके बाद नेशनल लेबर फ़ेडरेशन और प्रोफ़ेशनल एजुकेशन यूनियनों ने एडल्ट वर्कर्स से इस भीड़ में शामिल होने की अपील की इसके साथ ही कन्फेडरेशन नेशनेल डू ट्रैवेल, या नेशनल कन्फेडरेशन ऑफ़ लेबर ने कहा: “हाई स्कूल के स्टूडेंट्स की मांगें भी हमारी हैं। उनका विरोध प्रदर्शन करना सही है।
इसके बाद कन्फेडरेशन जेनरल डू ट्रैवेल, या जनरल कन्फेडरेशन ऑफ़ लेबर; फोर्स ओउवरिएर, या वर्कर्स फ़ोर्स; और यूनियन नेशनेल डेस सिंडिकेट्स ऑटोनोम्स, या नेशनल यूनियन ऑफ़ ऑटोनॉमस ट्रेड यूनियंस इस विरोध प्रदर्शन में सम्मिलित हुए।
कई शैक्षणिक संस्थान भी इसमें शामिल हुए और हड़ताल एवं प्रदर्शन का आह्वान किया। इनमें CFDT पब्लिक एजुकेशन, ट्रेनिंग एंड रिसर्च; CGT Éduc’action; नेशनल फेडरेशन ऑफ़ एजुकेशन, कल्चर एंड वोकेशनल ट्रेनिंग–वर्कर्स फ़ोर्स; SUD Éducation; और सिंडिकेट नेशनल डेस एनसेग्नमेंट्स डे सेकंड डिग्री, नेशनल यूनियन ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन, जो यूनिटरी ट्रेड यूनियन फेडरेशन से जुड़ा है, सम्मिलित हैं।
मगर यह यहीं तक नहीं हैं, इनमें Fédération des Conseils de Parents d’Élèves, या फेडरेशन ऑफ़ पेरेंट्स काउंसिल्स; Ligue des Droits de l’Homme, या ह्यूमन राइट्स लीग; Mouvement Contre le Racisme et Pour L’amitié entre Les Peuples, या मूवमेंट अगेंस्ट रेसिज़्म एंड फॉर फ्रेंडशिप बिटवीन पीपल्स; और SOS Racisme, या SOS Racism जैसे सामाजिक और नस्लवाद विरोधी समूह भी शामिल हैं।
वामपंथी नारों की गूंज
पेरिस में मंगलवार को चरमपंथी वाम संगठन शामिल हुए और लाल झंडों के साथ फिलिस्तीनी स्कार्फ भी हिस्सा बने। ये लोग नारा लगा रहे थे “साम्राज्यवादी युद्धों के खिलाफ़” और साथ ही वर्ग संघर्ष के भी नारे लग रहे थे। पीले रंग के बैनर थे। ये बैनर Young Communists Movement of France के युवा कम्युनिस्ट थे जो फ्रेंच कम्युनिस्ट पार्टी के साथ काम करते हैं।
इन्होनें इंस्टाग्राम पर Democratic and Antifascist Vigilance Committees को शुरू करने का अभियान शुरू किया था। इस समूह ने घोषणा की थी कि हाई स्कूलों की उपेक्षा हो रही है, फिलिस्तीन समर्थक कार्यकर्ताओं का शोषण हो रहा है, यूनियनिस्ट नौकरी से निकाले जा रहे है और राज्य ने पिछले कुछ वर्षों में हमारे अधिकार छीन लिए हैं।
ये अभियान नए-नए रूप में सामने आ रहे हैं, जैसे कि इजरायल को हथियार न बेचना और फिलिस्तीन मे जेनसाइड बंद करना। और अन्य क्रांतिकारी लेफ्ट समूह जैसे कि Le Poing Levé,या The Raised Fist, and Révolution Permanente, या Permanent Revolution, हाई स्कूल विद्यार्थियों और यूनिवर्सिटी कार्यकर्ताओं के बीच एकता बनाने का काम कर रहे हैं।
कई समूह हैं, जो लगातार इस आंदोलन के बहाने वामपंथ का प्रचार कर रहे हैं। माओ से संबंधित फिल्में बच्चों को दिखाई जा रही हैं और उनके दिमाग मे यह भरा जा रहा है कि कैसे माओ ने चीन को बदला था।
इतना ही नही एक भारतीयों से भी जुड़ा हुआ हैंडल है, जो फ्रांस में रह रहे भारतीय कम्युनिस्ट लोगों का हैंडल हो सकता है, जो कथित रूप से भारत के डेमोक्रेटिक और इक्वालिटेरियन आइडिया के लिए कमिटेड है। और जब इसकी प्रोफ़ाइल पर जाए तो पता चलता है कि गुजरात, हिन्दू धर्म, आरएसएस आदि से घृणा करने वाले लोगों का समूह है।
इस रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2023 के बीच में, इंडियन अलायंस पेरिस ने मैनहट्टन में एक टीच-इन को को-स्पॉन्सर किया, जिसमें नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन के विस्तार का विरोध किया गया। स्थान: पीपल्स फोरम इंक., कम्युनिस्ट ऑर्गनाइज़िंग के लिए मिडटाउन मैनहट्टन हब, जिसे सिंघम ने 2017 में $22.44 मिलियन की फंडिंग से लॉन्च किया था। पिछले करीब एक दशक में, पीपल्स फोरम के नेताओं ने अमेरिका की सड़कों पर सैकड़ों विरोध प्रदर्शनों को कोऑर्डिनेट किया है।
पीपल्स फोरम ने इस इवेंट को डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट्स ऑफ अमेरिका और सिंघम-फंडेड एक्टिविस्ट इकोसिस्टम के दूसरे ऑर्गनाइज़ेशन, जिसमें कोडपिंक और पार्टी फॉर सोशलिज़्म एंड लिबरेशन शामिल हैं, के साथ को-स्पॉन्सर किया था।
इतना ही नहीं मई 2024 के बीच में, पीपल्स फोरम ने 1967 की फ्रेंच फिल्म “ला चिनोइस” की स्क्रीनिंग होस्ट की, और फिल्म को फ्रेंच स्टूडेंट्स के एक छोटे ग्रुप की कहानी बताया जो चीनी कम्युनिस्ट लीडर माओ की पढ़ाई कर रहे थे। इसमें आने वालों से $8 का “सॉलिडैरिटी टिकट” खरीदकर आने के लिए कहा गया था।
7 अक्टूबर को इंडियन अलाइअन्स पेरिस ने भारत के कथित छात्र आंदोलन का वह वीडियो साझा किया, जो मोहम्मद ज़ुबैर ने साझा किया था।
Bella ciao : Delhi version.
As powerful today in Hindi as it was, and still is, in Italian. https://t.co/L1wU9MOFrV— Indian Alliance Paris (@paris_alliance) October 6, 2026
आरएसएस और भाजपा की आलोचना करने वाले प्रियंक खरगे का भी पोस्ट इसने किया है।
भारत से लेकर फ्रांस तक कम्युनिस्ट षड्यन्त्र
फॉक्स न्यूज ने हालांकि फ्रांस को लेकर एक पूरे चरमपंथी वामपंथी नेटवर्क का खुलासा किया, परंतु अंतत: इसके तार आकर भारत में जुड़ रहे हैं। दिल्ली में जो हो रहा है इसका निर्धारण दिल्ली वाले कथित युवा नही बल्कि कहीं न कहीं वही नेटवर्क कर रहा है, जिसे चीन का कम्युनिस्ट खरबपति नेविले रॉय सिंघम कर रहा है।
एक अमेरिकी रॉय सरनेम कैसे रख सकता है, इसकी भी रोचक जानकारी निकलकर आई है। इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार नेविल रॉय सिंघम के पिता का नाम आर्चीबाल्ड वेंडरपूल सिंघम (A. W. Singham) था। वह श्रीलंकाई तमिल (Sri Lankan Tamil) मूल के एक बहुत प्रसिद्ध राजनीति वैज्ञानिक (Political Scientist) और इतिहासकार थे। नेविल की माँ का नाम जूलिया रेनोड था। वह भारतीय नहीं थीं, मगर चूंकि नेविल के पिता का झुकाव वामपंथ की ओर था, तो उन्होनें कुख्यात वामपंथी एमएन रॉय से प्रभावित होकर अपने बेटे के नाम में रॉय जोड़ दिया था।
ये सभी समूह पूरे विश्व मे हो रहे ऐसे ही आंदोलनों का रिकार्ड रखते हैं और फिर उन्हें वैश्विक रूप से बढ़ रही अशान्ति के रूप में पोस्ट करते हैं। और गुरुवार को, जब फ्रेंच स्टूडेंट्स बैस्टिल पर घेराबंदी के बाद घर लौटे तो ब्रेकथ्रू न्यूज़ ने इंस्टाग्राम पर अमेरिका, स्पेन, इंडिया, फ्रांस, ब्राज़ील, बेल्जियम, चिली और जर्मनी के छोटे वीडियो क्लिप का एक कोलाज पोस्ट किया, जिसमें युवा कम्युनिस्ट झंडे लहरा रहे थे, पुलिस से भिड़ रहे थे और सड़कों पर उतर रहे थे।
इसने वीडियो के ऊपर बोल्ड कैपिटल लेटर्स में एक हेडलाइन पोस्ट की: “पूरी दुनिया के जागृत होते युवा”
तो इससे यह समझा जा सकता है कि जो कुछ भी फ्रांस में हुआ या भारत में हो रहा है, वह एक घटना नहीं है, यह वैश्विक रूप से विशुद्ध वामपंथी हमला है।















