देश के चार प्रदेशों में हुए पांच विधानसभा और एक लोकसभा के उपचुनाव ने कांग्रेस पार्टी, कॉकरोच जनता पार्टी और समस्त विपक्षी दलों के सरकार विरोधी नरेटिव को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। ये चारों प्रदेश की भौगोलिक स्थित अलग-अलग है, इसलिए यह और भी महत्वपूर्ण है कि सभी विपक्षी दलों के खिलाफ यह जनमत किसी खास क्षेत्र नहीं, बल्कि पूरे देश की प्रतिध्वनि है। देश की जनता विपक्षी दलों के झूठे राजनीतिक हथकंडों और प्रलापों को पूरी तरह से दरकिनार कर जनसरोकार के मुद्दे पर भाजपा नीत गठबंधन को अपना समर्थन दे रही है।
चुनाव परिणाम विपक्ष के मिथ्या प्रलाप पर करारा प्रहार
कांग्रेस असम की नौगांव लोकसभा सीट पर लगातार दो बार जीती थी, इसके बावजूद उपचुनाव में जमानत जब्त होना यह बताता है कि पार्टी अपना आधार पूरी तरह से खो चुकी है। राहुल गांधी, प्रियंका वाड्रा और कांग्रेस द्वारा सरकार और चुनाव आयोग पर लगाए जा रहे मिथ्या प्रलाप भी ध्वस्त हो गए हैं।
भाजपा 2014 के बाद अब इस सीट को जीत सकी है जो उसके राज्य और केंद्र सरकारों के कामकाज पर जनता की मुहर है। पुडुचेरी में भाजपा की सहयोगी एआईएनआरसी ने जीत दर्ज करके कांग्रेस की हकीकत बता दी है। पुडुचेरी में कांग्रेस का द्रमुक से गठबंधन टूट गया है और दोनों दलों ने थट्टानचावडी विधानसभा सीट पर अलग-अलग चुनाव लड़ा है। भाजपा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की जीत का सिलसिला जारी रखते हुए नंदीग्राम और मुस्लिम बहुल रेजीनगर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव में बड़ी जीत हासिल की है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत ने अधिकारी सरकार के कार्यकलाप पर जनता की मुहर के तौर पर देखा जा रहा है। पश्चिम बंगाल की जनता ने अधिकारी सरकार द्वारा अवैध बांग्लादेशियों को कठोरता से निकाले जाने का पुरजोर समर्थन इन चुनावों के जरिये किया है।
विपक्ष और कॉकरोच जनता पार्टी का मिथ्या प्रलाप
कांग्रेस, कॉकरोच जनता पार्टी और विपक्षी दलों का इंडी गठबंधन मतदाता सूची में गड़बड़ी का झूठा आरोप लगाकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के विरोध में प्रदर्शन कर रहा है। विपक्ष का आरोप है कि एसआईआर के तहत लाखों वैध मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, जो लोकतंत्र को कमजोर करने का प्रयास है। विपक्ष चुनावी प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहा है।
चुनाव आयोग और भाजपा का जवाब
मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के विपक्ष के दावों पर चुनाव आयोग और सत्ता पक्ष ने स्पष्ट किया है कि विपक्ष किसी भी ऐसे वैध मतदाता को सामने नहीं ला सका है जिसका नाम गलत तरीके से मतदाता सूची से हटाया गया है। विपक्ष द्वारा यह मुद्दा देश भर में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के बाद शुरू हुआ है, जिसे विपक्ष ने “वोट चोरी” करार दिया था।
विपक्ष के आरोपों का तथ्यवार जवाब
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने आरोप लगाया था कि चुनाव आयोग ने मतदाता सूची से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए हैं। निर्वाचन आयोग ने इस मुद्दे पर आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा कि ये नाम मनमाने ढंग से नहीं हटाए गए हैं बल्कि इन्हें अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत, या दोहरे नाम वाले श्रेणी के तहत चिह्नित किया गया है।
स्थानांतरित श्रेणी में 6.30 करोड़ मतदाता स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके हैं। 3.01 करोड़ मतदाता अनुपस्थित या लापता हैं और सत्यापन के दौरान उनका पता नहीं चल सका हैं। 2.80 करोड़ मृत मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। इसके अलावा 1.02 करोड़ दोहरे नाम वाले मतदाताओं को हटाया गया है।
कांग्रेस सरकार द्वारा ईवीएम की शुरुआत
भारत में पहली बार ईवीएम का प्रयोग कांग्रेस पार्टी की सरकार के समय हुआ था जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थी। ईवीएम का भारत में सबसे पहले केरल में मई 1982में पारवूर विधानसभा उपचुनाव में 50 मतदान केंद्रों पर किया गया था। पारवूर विधानसभा सीट का भी इतिहास रहा है । इस सीट पर कांग्रेस 1960 से लगातार पांच बार चुनाव जीतती है मगर 1982 में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के इस्तेमाल के बाद इस सीट पर हार गई थी। पारवूर विधानसभा सीट पर कांग्रेस की हार ने उसे यह समझा दिया कि ईवीएम का प्रयोग उसके लिए हार का कारण बन सकता है, इसलिए बाद में कांग्रेस सरकार के समय ही उससे दूरी बनाई गई। अटल जी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने ईवीएम को पूरी तरह से प्रचलित और इस्तेमाल करवाया था।
ईवीएम के प्रयोग से चुनावी प्रक्रिया आसान होने के साथ ही परिणाम तुरंत आता है। मतदान कर्मियों को काम करने में आसानी होती है।
चुनाव आयोग की पारदर्शी प्रक्रिया
चुनाव आयोग के अनुसार मतदाता सूची 10 लाख से अधिक बूथ स्तर के अधिकारियों (BLOs) द्वारा तैयार की गई और इसे राजनीतिक दलों के 22 लाख से अधिक बूथ स्तर के एजेंटों (BLAs) के साथ साझा किया गया था। दावों और आपत्तियों के लिए जनता को एक महीने का समय भी दिया गया था।
एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार चुनाव आयोग द्वारा किया गया एसआईआर पूरी तरह संवैधानिक है। मतदाता सूची को स्वच्छ और त्रुटिहीन रखना आयोग का संवैधानिक कर्तव्य है।
बीएलओ की महत्वपूर्ण भूमिका
निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची के एसआईआर की मानक और पारदर्शी प्रक्रिया रही है। इसमें लगभग 10 लाख से अधिक बीएलओ द्वारा हर एक पोलिंग बूथ पर जाकर घर-घर सर्वे करने के बाद मतदाता सूची तय की गई है। बीएलओ का काम नए मतदाताओं के नाम जोड़ना, मृत या स्थानांतरित हो चुके लोगों के नाम हटाना और विवरणों में सुधार करना होता है।
बूथ स्तर के एजेंट
पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए, चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त 22 लाख से अधिक बीएलए के साथ यह प्रारंभिक मतदाता सूची साझा की है। इससे राजनीतिक दलों को सूची की जांच करने और किसी भी विसंगति पर सवाल उठाने का मौका मिला है।
इसके बाद जनता को एक महीने का समय दिया गया ताकि कोई भी नागरिक यह जांच सके कि उसका नाम मतदाता सूची में है या नहीं। यदि नाम छूट गया है तो वे फॉर्म 6 भरकर नाम जुड़वाने के लिए दावा पेश कर सकते हैं।














