रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) 5 से 7 अक्टूबर 2026 तक बैठक कर रही है। ज्यादातर अर्थशास्त्री और बैंकर मान रहे हैं कि रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत यानी 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी हो सकती है। इससे रेट 5.25 प्रतिशत से बढ़कर 5.50 प्रतिशत हो जाएगा। यह फरवरी 2023 के बाद पहली बढ़ोतरी होगी। 2025 में आरबीआई ने कुल 1.25 प्रतिशत रेट कम किए थे और उसके बाद चार बैठकों में रेट को यथावत रखा था।
महंगाई का हाल क्या है
रिपोर्टों के अनुसार, अगस्त 2026 में खुदरा महंगाई (सीपीआई) 4.82 प्रतिशत रही। जुलाई में यह 4.45 प्रतिशत थी। आरबीआई का मध्यम अवधि का लक्ष्य 4 प्रतिशत है, जिसमें 2 से 6 प्रतिशत की सीमा है। महंगाई तीन महीने से लक्ष्य से ऊपर चल रही है। खाने-पीने की चीजों की महंगाई भी बढ़ी है। कई अनुमानों में सितंबर में यह 5.5 प्रतिशत के आसपास और अक्टूबर-नवंबर में 6 प्रतिशत या उससे ऊपर जा सकती है।
कुछ रिपोर्ट्स में तीसरी तिमाही में यह 6 से 6.5 प्रतिशत तक पहुंचने की बात कही गई है। आरबीआई ने पहले पूरे साल (वित्त वर्ष 2026-27) की महंगाई का अनुमान करीब 5 प्रतिशत रखा था। अब कई विशेषज्ञ मानते हैं कि तेल की ऊंची कीमतों और खाद्य पदार्थों के दबाव के चलते यह अनुमान ऊपर की तरफ संशोधित हो सकता है।
कच्चा तेल क्यों महत्वपूर्ण है
भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेश से आयात करता है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई है। कुछ दिनों में यह 107 डॉलर के आसपास भी रही। जुलाई में कीमतें 80 डॉलर के नीचे थीं। भारत के कच्चे तेल के बास्केट की कीमत भी काफी बढ़ गई है। ऊंचे तेल से ट्रांसपोर्ट, डीजल-पेट्रोल और कई सामान बनाने की लागत बढ़ती है। यह दबाव धीरे-धीरे आम सामानों की कीमतों में भी फैल सकता है। मौसम की अनिश्चितता और कमजोर मानसून के कारण खाद्य पदार्थों पर भी दबाव बना हुआ है।
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दुनिया के ब्याज दरों का असर
अमेरिका के फेडरल रिजर्व ने हाल ही में अपना रेट 0.25 प्रतिशत बढ़ाकर 3.75-4 प्रतिशत कर दिया। यह 2023 के बाद पहली बढ़ोतरी थी। अमेरिका के बॉन्ड यील्ड भी ऊपर चले गए हैं। जब अमेरिका में रेट बढ़ते हैं तो भारत और अमेरिका के बीच ब्याज दर का अंतर कम हो जाता है। इससे विदेशी निवेशक पैसे निकालने की सोच सकते हैं और रुपये पर दबाव बन सकता है। रुपये में कमजोरी आयातित सामान और तेल को और महंगा बनाती है।
यूरोप और जापान जैसे कुछ अन्य देशों के केंद्रीय बैंक भी रेट बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़े हैं। ये तीनों चीजें—महंगाई का बढ़ना, तेल की ऊंची कीमत और दुनिया में रेट का रुख—आरबीआई के फैसले को प्रभावित कर रही हैं। बैठक में लिक्विडिटी और आगे की नीति पर भी बात हो सकती है।












