यह श्लोक ‘वृद्धचाणक्य’ से लिया गया है। संस्कृत के अन्य सुभाषित-संग्रहों में भी इसे सम्मिलित किया गया है।
श्लोक :
अनुगन्तुं सतां वर्त्म कृत्स्नं यदि न शक्यते।
स्वल्पमप्यनुगन्तव्यं मार्गस्थो नावसीदति॥
भावार्थ :
यदि सज्जनों के मार्ग पर पूरा नहीं चला जा सकता तो थोड़ा ही चले। सन्मार्ग पर चलने वाला पुरूष नष्ट नहीं होता है।
श्लोक की प्रासंगिकता :
व्यावहारिक जीवन में आदर्शवाद और यथार्थवाद: बहुधा लोग सोचते हैं कि यदि वे किसी नियम, धर्म या सदाचार का पूर्ण रूप से पालन नहीं कर सकते, तो वे उसे पूरी तरह छोड़ देते हैं। यह श्लोक सिखाता है कि “सब कुछ नहीं तो कुछ भी नहीं” (All or Nothing) का दृष्टिकोण गलत है।
निरंतर सुधार और प्रयास का महत्त्व: यदि आप किसी महापुरुष, विद्वान या सज्जन के पदचिह्न पर 100% नहीं चल सकते, तो भी उनके विचारों और अच्छी आदतों का 10-20% हिस्सा अपने जीवन में उतारना भी पतन से बचाए रखता है।
दिशा का महत्त्व: सही दिशा में उठाया गया एक छोटा कदम भी आपको गलत मार्ग (पतन) पर जाने से रोकता है। व्यक्ति कभी हताश या नष्ट नहीं होता।
















