पुरानी कहावत यह थी कि सात घर तो डायन भी छोड़ देती है। डायन किसी ने देखी है या नहीं देखी, लेकिन जो किसी के बच्चों को खा जाए अर्थात उनको मार दे अपने स्वार्थ के लिए उसके लिए ही डायन कहते थे। अब तो क्या कहें संवेदनाएं मर गईं, भावनाएं मर गईं, स्वार्थ और कामुकता में अंधा व्यक्ति स्त्री या पुरुष दोनों ही शरीर सुख के लिए या धन के लिए किसी की भी हत्या कर सकते हैं, किसी को भी लूट सकते हैं। जिन माता पिता ने जन्म दिया उनको भी मार सकते हैं केवल धन के लिए, प्रेम विवाह के लिए, मनचाहा युवक या युवती पाने के लिए। आज जो समाज में हो रहा है उसके लिए किसे दोषी कहा जाए। माता—पिता द्वारा बच्चों के पालन पोषण में संस्कार देने में कोई कमी है या शिक्षा में कोई कमी है अथवा सोशल मीडिया का प्रभाव है या टीवी के विभिन्न चैनलों पर दिखाए जाने वाले अर्धनग्न चित्रों, लूटखसूट और हत्याओं को देख देख कर नई पीढ़ी के बच्चे भी उसी रास्ते पर चल पड़ते हैं।
मां की गोद से लेकर संगरूर की घटना तक उठे सवाल
संसार में सबसे ज्यादा सुरक्षित मां की गोद ही बच्चों के लिए होती है। इसी वर्ष संगरूर में रक्षाबंधन के दिन एक मां बच्चों को मिठाई में जहर मिलाकर खिला देती है। नाटक यह करती है कि मिठाई ही विषैली मार्केट से आई। पुलिस जांच ने जो सत्य उजागर किया वह एक औरत की स्वार्थपरता कामुकता और क्रूरता की चरम सीमा दिखा गया। अपने पति के अतिरिक्त किसी और पुरुष से उसके संबंध थे, बच्चे उसे इस रास्ते में रुकावट लगे और तीनों को ही जहर देकर मार दिया। अब कौन मानेगा कि डायन सात घर छोड़ देती है। यहां तो मां ने ही नहीं छोड़े।
इसके साथ इसी सप्ताह चंडीगढ़ से जो समाचार मिला एक 18 वर्षीय युवक जिसे माता पिता ने बड़ी आशा के साथ पाल पोस कर बड़ा किया, न जाने कितनी आशाएं उससे वर्तमान और भविष्य के लिए लगाई होंगी, पर वह भी अपने पुलिस हेडकांस्टेबल पिता को गोलियों से भून देता है। केवल इसलिए क्योंकि वह अपनी मनपसंद लड़की से शादी कर सके और पिता की करोड़ों की संपत्ति अपने नाम करके ऐश आराम से भरी जिंदगी जी सके।
ये दोनों ही घटनाएं खून के रिश्तों के कत्ल की घटनाएं हैं और अब इसके बाद मेरठ की एक लड़की शादी के बाद बेटी की मां बनने के बाद अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति को मारने के बाद उसे पंद्रह टुकड़ों में काट कर नीले ड्रम में बंद करके कहीं फेंक देती है। सोचा होगा कि कानून के हाथों से बच जाएंगे। इस नीले ड्रम की घटना ने याद करवा दिया इंदौर के भयानक कांड को, जहां नवविवाहिता हनीमून मनाने के लिए मेघालय में जाती है और वहां अत्यंत ही वीभत्स ढंग से पति को मार देती है। केवल प्रेमी से रिश्ता बनाने के लिए।
ऐसी अनेक घटनाएं अपने देश में यदा कदा देखने को मिलती हैं। कहीं मां बच्चों को मारती है, कहीं पति पत्नी को मार देता है, कहीं दो परिवारों के झगड़े में हत्या कर दी जाती है और कहीं केवल जमीन पर पानी लगाने के लिए सगे भाइयों के दो परिवार इतनी कटुता से लड़ते हैं जिसमें दोनों परिवारों के कुछ लोग मार जाते हैं।
इतनी संवेदनहीनता क्यों, परिवार और शिक्षा पर सवाल
अब प्रश्न यह है कि इतनी संवेदनहीनता क्यों? काम वासनाओं में अंधे होकर अपने पति या पत्नी या अन्य रिश्तेदारों को मार देना किस कारण हो रहा है? मुझे ऐसा लगता है कि इसके लिए परिवार और शिक्षा उत्तरदायी है। कवि रहीम ने लिखा—
जो रहीम उत्तम प्रकृति
का करि सकत कुसंत
चंदन विष व्याप्त नहीं
लिपटे रहत भुजंग।।
सीधी बात रहीम जी ने कहा कि जिस प्रकार चंदन के वृक्षों पर सांप लिपटे रहें तो भी चंदन की शीतलता समाप्त नहीं होती वैसे ही जिन्हें घर से अच्छे संस्कार मिलते हैं वह बाहरी जीवन की भौतिकता अति भौतिकता से प्रभावित नहीं होते चरित्रवान बने रहते हैं।
शिक्षाविदों, कानूनविदों और सरकारों से सवाल
मेरा अपने देश के शिक्षाविदों से, कानूनविदों और सरकारों से यह प्रश्न है कि क्या उन्होंने कभी चिंता की कि देश के बच्चे किस ओर जा रहे हैं। हमारे आज के विद्यार्थी जो कल को देश की बागडोर संभालने वाले हैं, डाक्टर, वकील, इंजीनियर, व्यापारी, राजनेता और प्रशासक बनने वाले हैं अगर वही आंदोलनों में अति अभद्रता, अनुशासनहीनता और कहीं कहीं राष्ट्र विरोधी नारों का प्रयोग करेंगे तो देश का क्या बनेगा?
जंतर मंतर दिल्ली में जैसा प्रदर्शन हुआ उसके लिए यद्यपि कई तथाकथित सहानुभूति रखने वाले यह कहने लगे कि बच्चों के भविष्य की चिंता करो, उन्हें कोई दंड न दो। वैसे ही जैसे अब लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में आगजनी हुई, पत्थरबाजी की गई, वीडियो में स्पष्ट देखा गया कि कुछ विद्यार्थी यूनिवर्सिटी के भीतर दुकानों से कीमती सामान लूट लूट कर ले जा रहे हैं।
यह नहीं कह सकते कि बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं, अब भी बहुत कम जननेता ऐसे हैं जो यह कहने की हिम्मत करें कि जिन्होंने अपराध किया उनको दंड मिलना ही चाहिए। विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थी अबोध बच्चे नहीं होते। हर काम का परिणाम वह जानते हैं। इसके बाद भी लूटखसूट और यूनिवर्सिटी को तोड़ना, आग लगाना, सरकारी गाड़ियों में तोड़फोड़ कर देना यह करें तो क्या उनको इसके लिए पुरस्कार दिया जाए?
सच बोलने को वोटों के सौदागर नेता कभी तैयार नहीं होते। प्रश्न फिर वही है कि देश में कितने अपराध परिवारों में विवाद और विवाद के हत्या में बदलने के हो जाते हैं। पड़ोसी लड़ते हैं, रिश्तेदार लड़ते हैं, बेटी अगर मां बाप की इच्छा के बिना शादी करवा ले तो बेटी और दामाद को भी मार सकते हैं। ऐसा क्यों हो गया?
दौलत और मनपसंद रिश्तों के लिए माता-पिता की हत्या पर चिंता
अब तो कई घटनाएं ऐसी भी सुनने को मिलीं कि बेटियां ही मां बाप को मारने की योजना बना लेती हैं। मार भी देती हैं। कारण दौलत या किसी मनपसंद पुरुष का साथ पाने की चाह।
धर्मगुरुओं और समाज से भी आत्ममंथन की अपेक्षा
आज एक बार फिर वही कहूंगी कि हमारे धर्मगुरु भी केवल मोक्ष का रास्ता न बताएं, अपितु अपने भारत देश को इस योग्य बनाने का रास्ता बताएं जैसा राम राज्य था। भगवान श्रीराम के राज्य में कोई अपराध नहीं था, क्योंकि नर नारी सभी शिक्षित थे। निश्चित ही उनकी शिक्षा वैसी नहीं होगी जैसी आज की हो गई है। मैं तो इसे पूरा दोष शिक्षा और पारिवारिक संस्कारों को ही देती हूं, जो बच्चों को देश धर्म के लिए जीना नहीं सिखा पा रहे।
जो उन्हें केवल आफिसर बनाना चाहते हैं, आफिसर किसलिए बनना है यह नहीं सिखा पा रहे। अपने देश में रहना है या नहीं कोई चिंता नहीं, डालर पौंड कहां से कमाए जा सकते हैं यही रास्ता बताया जाता है।
शिक्षा, भ्रष्टाचार और देश छोड़ने की प्रवृत्ति पर सवाल
मैं तो अपने देश के समाजशास्त्रियों से यह भी कहूंगी कि एक बार विश्लेषण करें, रिसर्च करें और देखें कि आखिर क्या कारण है कि देश के बच्चे 18 वर्ष की आयु पार करते ही वीजा की खोज करने लगते हैं और भारत छोड़कर जाना चाहते हैं। केवल छोड़ना ही नहीं चाहते, यह भी कहते हैं कि देश का सिस्टम भ्रष्ट है, यहां रखा ही क्या है। कभी कभी लगता है कि वह सच कहते हैं, यद्यपि यह दुखद सत्य है।
हमारे देश में बहुत से संस्थानों में प्रवेश लेने के लिए ही लाखों रुपये रिश्वत देनी पड़ती है चाहे उसे नाम केपिटेशन फीस या डोनेशन का दिया जाए। पहली श्रेणी ही नहीं उससे भी पहले की शिक्षा के लिए मोटी रकम देकर ही तथाकथित बढ़िया स्कूलों में दाखिला मिलता है।
जब हर काम नोटों से ही होगा, वोट भी नोटों से ही लिए जाते हैं, राज्यसभा में अधिकतर करोड़पति, अरबपति भेजे जाते हैं तो संस्कार कौन देगा।
व्यवस्था और समाज की संवेदना पर अंतिम सवाल
हर वर्ष छठ पूजा में बिहार के लोग घर जाने के लिए कई तरह की यातना सहते हैं, पर उनकी सुनने वाला कोई नहीं होता। यह सब दुखद प्रसंग क्या सरकारों को कानूनविदों को धर्म गुरुओं को, समाजशास्त्रियों को सोचने के लिए विवश नहीं करते क्या उनकी भी संवेदना शून्य हो गई?














