प्रयागराज में त्रिवेणी संगम का पावन तट। अर्धकुंभ मेले के विशाल प्रांगण में उत्तर भारत की ढलती सर्दियों की एक शीतल संध्या में लाखों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ा हुआ था। वातावरण शंखध्वनि, वैदिक मंत्रोच्चार और साधु-संतों के भक्तिमय भजनों से गुंजायमान था। देश के कोने-कोने से आए साधारण नागरिक आध्यात्मिक शुद्धि और मोक्ष की परम लालसा लिए पैदल चलकर संगम स्नान हेतु एकत्र हुए थे। परंतु उस भव्य जनसमुद्र के बीच, किसी भी प्रकार के आडंबर और विशिष्ट सुविधाओं से दूर, धूलधूसरित खादी का कुर्ता-धोती पहने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक साधारण प्रचारक सेवा शिविर में चुपचाप सेवाकार्यों में लीन थे। वे थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय।
जब पवित्र स्नान की सबसे शुभ घड़ी निकट आने लगी, तब सेवा शिविर का एक युवा आयोजक अत्यंत चिंतित भाव से दीनदयालजी के पास आया। “पंडितजी,” उसने अत्यंत अनुनय-विनय करते हुए कहा, “शाही स्नान का पावन मुहूर्त निकला जा रहा है। आप तड़के से ही धूल से सराबोर होकर यहाम हज़ारों साधारण श्रद्धालुओं के भोजन, चिकित्सा और आश्रय की व्यवस्था संभाल रहे हैं। क्या आज आप संगम की पवित्र धारा में डुबकी नहीं लगाएंगे?”
दीनदयालजी के चेहरे पर एक शांत और मृदुल मुस्कान तैर गई। उन्होंने अत्यंत सहज स्वर में उत्तर दिया: “साधारण जनमानस के लिए संगम के जल में गोता लगाना ही आध्यात्मिक शुद्धि है। परंतु ज़रा इन लाखों गरीब, असहाय और वंचित भारतीयों के चेहरों को देखो जो दूर-दराज़ के गांवों से चलकर यहां आए हैं। मेरे परमात्मा इन्हीं के भीतर निवास करते हैं। इनकी सेवा करना, तथा भीड़ की अंतिम पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति तक सुरक्षित आश्रय और भोजन पहुंचाना ही मेरी वास्तविक पूजा है। मानव मात्र की यह सेवा ही मेरा सच्चा कुंभ स्नान है और यही मेरे जीवन का अंत्योदय दर्शन है।”
एकात्म मानवदर्शन: एक स्वदेशी वाम-विरोधी वैचारिक घोषणापत्र
अप्रैल 1965 में बंबई (अब मुंबई) की ज्ञान मंडल व्याख्यानमाला में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने चार ऐतिहासिक भाषण दिए। इन व्याख्यानों को बाद में ‘एकात्म मानवदर्शन’ के नाम से संकलित किया गया और उसी वर्ष भारतीय जनसंघ ने इसे अपनी आधिकारिक नीति-मार्गदर्शक विचारधारा के रूप में स्वीकार किया। भारतीय दर्शन और सांस्कृतिक चेतना में गहराई से रची-बसी यह विचारधारा पश्चिमी समाजवाद और मार्क्सवादी चिंतन को सीधी चुनौती देने वाला एक सशक्त स्वदेशी वैचारिक घोषणापत्र सिद्ध हुई।
दीनदयाल उपाध्याय के राजनीतिक दर्शन का मुख्य प्रहार मार्क्सवादी द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत पर था। मार्क्सवाद मनुष्य को केवल एक ‘आर्थिक प्राणी’ या उत्पादन की प्रणाली का एक नगण्य पुर्जा मानता है। दीनदयालजी ने तर्क दिया कि मनुष्य न तो कोई यांत्रिक यंत्र है और न ही किसी कारखाने का अलग-थलग पुर्जा; बल्कि मानव अस्तित्व शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का एक एकीकृत और अविभाज्य समुच्चय है। मानव जीवन का वास्तविक कल्याण भारतीय संस्कृति के चार पुरुषार्थों-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-के संतुलित और सामंजस्यपूर्ण संवर्धन से ही संभव है।
पूंजीवाद बनाम साम्यवाद: रामाश्रय रॉय के समाजशास्त्रीय निष्कर्ष
प्रसिद्ध समाजशास्त्री रामाश्रय रॉय ने अपने शोध-पत्र “एकात्म मानवदर्शन: एक विश्लेषण” (इण्डियन जर्नल ऑफ पॉलिटिकल साइंस, खंड 40, संख्या 2, 1979) में रेखांकित किया कि दीनदयाल उपाध्याय ने यह अत्यंत सूक्ष्मता से सिद्ध किया कि पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों ही केवल भौतिक आवश्यकताओं और धन-संचय पर अत्यधिक बल देकर मनुष्य के आध्यात्मिक और मानसिक अस्तित्व को नकारते हैं। पूंजीवाद के अंतर्गत धन और सत्ता का संकेंद्रण गिने-चुने उद्योगपतियों के हाथों में हो जाता है, जबकि साम्यवाद में वही सर्वाधिकार राज्य की सर्वव्यापी नौकरशाही के पास केंद्रित हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप, साम्यवादी शासन में व्यक्तिगत स्वतंत्रता पूरी तरह समाप्त हो जाती है और नागरिक राज्य-रूपी विशाल मशीनरी का दास बनकर रह जाता है।
समकालीन समाजशास्त्रीय और अकादमिक मूल्यांकन
विख्यात समाजशास्त्री और इतिहासकार क्रिस्टोफ जाफ्रलो ने अपनी शोध पुस्तक ‘द हिंदू नेशनलिस्ट मूवमेंट इन इंडिया’ (कोलंबिया यूनिवर्सिटी प्रेस, 1996) और अपने संपादित ग्रंथ ‘हिंदू नेशनलिज्म: ए रीडर’ (प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस, 2007) में विश्लेषण किया कि कैसे दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानवदर्शन के माध्यम से पश्चिमी मार्क्सवाद और नेहरूवादी समाजवाद का एक ठोस स्वदेशी विकल्प खड़ा किया। जाफ्रलो के अनुसार, वामपंथी बुद्धिजीवी इस दर्शन की दार्शनिक गहराई से इतने भयभीत हो गए थे कि गंभीर वैचारिक बहस करने के बजाय उन्होंने इसे “सांप्रदायिक राजनीति का दार्शनिक आवरण” कहकर खारिज करने की कूटनीतिक रणनीति अपनाई।
इसी प्रकार, विद्वान चेतन भट्ट ने अपनी पुस्तक ‘हिंदू नेशनलिज्म: ओरिजिन, आइडियोलॉजीज़ एंड मॉडर्न मिथ्स’ (बर्ग पब्लिशर्स, 2001) में लिखा कि उपाध्याय द्वारा चार पुरुषार्थों और सावयव समाज (ऑर्गेनिक सोसाइटी) की अवधारणा ने कम्युनिस्टों के वर्ग-संघर्ष के मूल सिद्धांत की जड़ें हिला दीं। जहां कम्युनिस्ट समाज को शोषक और शोषित के बीच स्थायी युद्धक्षेत्र मानते थे, वहीं दीनदयालजी ने समाज को एक जीवंत सावयव इकाई माना, जिसकी अपनी एक परम चेतना होती है, जिसे उन्होंने ‘चिति’ कहा और उस चेतना को बनाए रखने वाली प्राणशक्ति को ‘प्राण’ का नाम दिया।
कम्युनिस्ट दुष्प्रचार, मीडिया वर्चस्व और बौद्धिक युद्ध
आधिकारिक कुप्रचार अभियान: भाकपा का 1969 का पर्चा : जनवरी 1969 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के आधिकारिक प्रकाशन गृह ‘न्यू एज प्रिंटिंग प्रेस’ (रानी झांसी रोड, नई दिल्ली) ने के. व्यास द्वारा लिखित एक दुष्प्रचार पुस्तिका प्रकाशित की, जिसका शीर्षक था ‘इंसेंडिएरी हैंड ऑफ द आरएसएस एंड जनसंघ बिहाइंड कम्युनल रॉयट्स’ (कम्युनिस्ट पार्टी पब्लिकेशन नंबर 3, जनवरी 1969)। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की रहस्यमय मृत्यु के कुछ ही सप्ताह बाद प्रकाशित इस आधिकारिक दस्तावेज का मुख्य उद्देश्य दीनदयालजी के असामयिक निधन से उत्पन्न राजनीतिक शून्यता का लाभ उठाना और जनसंघ की सर्वसमावेशी विचारधारा को कलंकित करना था।
मीडिया वर्चस्व और प्रचार तंत्र की रणनीतियां : स्वतंत्रता के बाद के भारत में वामपंथी विचारधारा ने मुख्यधारा की अंग्रेजी और क्षेत्रीय पत्रकारिता, साहित्यिक पत्रिकाओं और मीडिया पारिस्थितिकी तंत्र पर व्यापक वर्चस्व स्थापित कर लिया था। ‘सेमिनार’ (1959 में स्थापित), ‘मेनस्ट्रीम वीकली’, ‘योजना’ और ‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ (ईपीडब्ल्यू) जैसी प्रभावकारी पत्रिकाओं ने, जिन पर वामपंथी समाजशास्त्रियों का नियंत्रण था, दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को विकृत करने वाले लेखों का शृंखलाबद्ध प्रकाशन किया।
उदाहरणस्वरूप, ‘सेमिनार’ के कई अंकों में एकात्म मानवदर्शन को “दार्शनिक आवरण में छिपा कट्टरपंथ” करार दिया गया। वहीं ‘ईपीडब्ल्यू’ में दीनदयालजी के आर्थिक विकेंद्रीकरण और अंत्योदय के सिद्धांतों को “आधुनिक औद्योगिकीकरण विरोधी मध्यकालीन रूढ़िवादिता” कहकर दुष्प्रचारित किया गया।
दुष्प्रचार का प्रतिवाद: वैकल्पिक मीडिया तंत्र का निर्माण : इस संगठित दुष्प्रचार का मुकाबला करने के लिए दीनदयाल उपाध्याय ने स्वयं एक वैकल्पिक मीडिया अवसंरचना के निर्माण की पहल की। उन्होंने लखनऊ से प्रकाशित होने वाली कई प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं के संस्थापक और संपादक के रूप में कार्य किया, जिनमें मासिक पत्रिका ‘राष्ट्रधर्म’, साप्ताहिक ‘पाञ्चजन्य’ और दैनिक समाचार पत्र ‘स्वदेश’ शामिल हैं। प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. महेश चंद्र शर्मा द्वारा संपादित ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय संपूर्ण वाङ्मय’ के 15 खंडों के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि दीनदयालजी ने अपनी धारदार लेखनी से वामपंथी मिथकों को ध्वस्त किया और राष्ट्रविरोधी तत्वों को बेनकाब किया।
प्रसिद्ध राजनीतिक नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी आत्मकथा ‘माइ कंट्री माइ लाइफ’ (रूपा एंड कंपनी, 2008) में स्मरण किया कि ‘ऑर्गनाइजर’ साप्ताहिक में दीनदयाल उपाध्याय का नियमित स्तंभ ‘पॉलिटिकल डायरी’ तत्कालीन वामपंथी दुष्प्रचार के विरुद्ध सबसे प्रभावी बौद्धिक अस्त्र था। विशेष रूप से 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान, जब भाकपा के एक बड़े धड़े ने चीनी आक्रमण का समर्थन करते हुए राष्ट्रविरोधी रुख अपनाया, तब दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी लेखनी से कम्युनिस्टों के देशद्रोही षड्यंत्र का भंडाफोड़ किया और राष्ट्रीय सुरक्षा के पक्ष में हुंकार भरी।
अकादमिक वर्चस्व और विश्वविद्यालयों में इतिहासबोध का संकट
उच्च शिक्षा में औपनिवेशिक और मार्क्सवादी आधिपत्य : भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली-विशेष रूप से इतिहास, राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र जैसे विषयों में वामपंथी इतिहासकारों और विचारकों ने लगभग एकाधिकार स्थापित कर लिया था। प्रख्यात शोधकर्ता और पत्रकार अरुण शौरी ने अपनी तथ्यात्मक पुस्तक ‘एमिनेंट हिस्टोरियंस: देयर टेक्नोलॉजी, देयर लाइन, देयर फ्रॉड’ (एएसए पब्लिशिंग्स, 1998) में प्रचुर प्रमाण प्रस्तुत किए कि कैसे इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस (आईएचसी), प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन और वामपंथी शोध संस्थानों ने राष्ट्रवादी और स्वतंत्र विचारकों को अकादमिक जगत से व्यवस्थित रूप से बेदखल कर दिया।
ढाका विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसरों और प्रख्यात इतिहासकारों के विवरणों के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद एनसीईआरटी और विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों को तैयार करने वाले मार्क्सवादी विद्वानों ने दीनदयाल उपाध्याय, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे स्वतंत्र राष्ट्रवादी विचारकों के दर्शन को जानबूझकर उपेक्षित किया। उनका मुख्य उद्देश्य छात्रों में यह धारणा बैठाना था कि भारत के पास पश्चिमी मार्क्सवाद से अलग अपना कोई स्वदेशी शासन-मॉडल या सामाजिक-आर्थिक दर्शन नहीं है।
‘मंथन’ और बौद्धिक प्रतिरोध का सूत्रपात: इस अकादमिक बहिष्कार और वामपंथी वर्चस्व के उत्तर में नानाजी देशमुख ने 1972 में ‘दीनदयाल शोध संस्थान’ (डीआरआई) की स्थापना की। संस्थान की प्रमुख अकादमिक पत्रिका ‘मंथन’ (1979 से दत्तोपंत ठेंगड़ी के संपादन में प्रकाशित) ने विश्वविद्यालयों और अकादमिक संस्थानों में एकात्म मानवदर्शन को पुनर्स्थापित करने की दिशा में ऐतिहासिक शुरुआत की। ‘मंथन’ में प्रकाशित शोध-पत्रों ने यह सिद्ध किया कि मार्क्सवादी वर्ग-संघर्ष सिद्धांत ने भारतीय सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न किया, जबकि दीनदयाल उपाध्याय का अंत्योदय केवल एक आर्थिक मॉडल नहीं, बल्कि हर व्यक्ति को सामाजिक गरिमा लौटाने की एक क्रांतिकारी व्यवस्था है।
केरल से नक्सलबाड़ी तक: राजनीतिक हिंसा का खूनी आयाम
खूनी शुरुआत: केरल में कम्युनिस्ट हिंसा का इतिहास: कम्युनिस्टों का दीनदयाल उपाध्याय के प्रति विरोध केवल वैचारिक या अकादमिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था; धरातल पर उन्होंने जनसंघ और संघ के कार्यकर्ताओं का दमन करने के लिए खूनी हिंसा का सहारा लिया। केरल में जहां कम्युनिस्ट आंदोलन ने अपनी सबसे मजबूत जड़ें जमाई थीं, वहां राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं पर प्राणघातक हमले 1940 के दशक से ही प्रारंभ हो गए थे।
पत्रकार एन.पी. उल्लेख ने अपनी खोजी पुस्तक ‘कन्नूर: इनसाइड इंडियाज़ ब्लीडिएस्ट रिवेंज पॉलिटिक्स’ (पेंग्विन रैंडम हाउस, 2018) में वरिष्ठ प्रचारकों रंगा हरि और पी. परमेश्वरन के लेखों का हवाला देते हुए लिखा कि दिसंबर 1947 और जनवरी 1948 में तिरुवनंतपुरम के ताइकाड स्टेडियम और कलिकट में जब संघ प्रमुख माधव सदाशिव ‘गुरुजी’ गोलवलकर जनसभाओं को संबोधित कर रहे थे, तब सशस्त्र कम्युनिस्ट कैडरों ने हिंसक बाधाएं उत्पन्न की थीं।
प्रोफेसर ए.के.एम. दास ने अपनी पुस्तक ‘आरएसएस इन केरल: ए सागा ऑफ स्ट्रगल’ (केशरी प्रकाशन, 2020) में दर्ज किया कि 1960 के दशक में जब दीनदयाल उपाध्याय के महामंत्री रहते हुए केरल में जनसंघ का जनाधार बढ़ा, तो वामपंथी यूनियनों ने जनसंघ कार्यकर्ताओं के सामाजिक बहिष्कार, मकान न देने और शारीरिक हिंसा की राह पकड़ी। दिसंबर 1967 में जनसंघ का ऐतिहासिक अखिल भारतीय महाधिवेशन कलिकट (केरल) में आयोजित हुआ, जहां दीनदयाल उपाध्याय को सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुना गया। कम्युनिस्ट गढ़ में जनसंघ की इस अभूतपूर्व सफलता से वामपंथी खेमा बौखला गया। इसके ठीक कुछ माह बाद, 28 अप्रैल 1969 को थलास्सेरी में कम्युनिस्ट कैडरों ने 34 वर्षीय संघ शिक्षक वडिक्कल रामकृष्णन की कुल्हाड़ी से काटकर बेरहमी से हत्या कर दी। यह घटना केरल में वाम-संघ हिंसा के इतिहास की पहली लक्षित राजनीतिक हत्या मानी जाती है।
नक्सलबाड़ी और ‘खत्म लाइन’ : मई 1967 में उत्तर बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी में चारू मजूमदार और कानू सान्याल के नेतृत्व में सशस्त्र नक्सली आंदोलन भड़क उठा। 1967 से 1969 के बीच चारू मजूमदार ने अपने बहुचर्चित ‘आठ दस्तावेज’ लिखे, जो नक्सली पत्रिका ‘देशव्रती’ और ‘लिबरेशन’ (1968) में प्रकाशित हुए। इन दस्तावेज़ों में भारतीय जनसंघ और आरएसएस को “पूंजीवादी-सामंती राज्य का भगवाधारी वर्ग-शत्रु” घोषित किया गया।
चारू मजूमदार की कुख्यात ‘खत्म लाइन’ यानी राजनीतिक विरोधियों की शारीरिक हत्या की नीति के तहत जनसंघ और संघ कार्यकर्ताओं को विशेष रूप से निशाना बनाया गया। कानू सान्याल ने अपने संस्मरण ‘द हिस्ट्री ऑफ सीपीआई(एमएल)’ (1972) में स्वीकार किया कि नक्सलियों की दृष्टि में मार्क्सवादी वर्ग-संघर्ष का विरोध करने वाले और स्वदेशी सुधारों की बात करने वाले लोग ही क्रांति के सबसे बड़े बाधक थे। इसके फलस्वरूप पश्चिम बंगाल, बिहार और आंध्र प्रदेश में अनेक जनसंघ कार्यकर्ताओं की नक्सलियों द्वारा निर्मम हत्याएं की गईं।
मुग़लसराय की अभिशप्त रात्रि: षड्यंत्र, साक्ष्यों की लीपापोती और अनुत्तरित प्रश्न
रहस्य का गहराता जाल : दिसंबर 1967 में कलिकट अधिवेशन में अध्यक्ष चुने जाने के मात्र दो महीने बाद, 11 फरवरी 1968 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। 10 फरवरी की संध्या को वे लखनऊ से पटना जाने वाली सियालदह एक्सप्रेस के फर्स्ट क्लास कूपे नंबर 1 में सवार हुए थे। सह-यात्रियों और रेलवे कर्मचारियों ने उन्हें जौनपुर जंक्शन के पास अंतिम बार रात लगभग 12:30 बजे जीवित देखा था।
रात 1:40 बजे ट्रेन वाराणसी से रवाना हुई और रात 2:10 बजे मुगलसराय जंक्शन (अब पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन) पहुंची। परंतु दीनदयालजी अपने कूपे में नहीं थे। इसके ठीक दस मिनट बाद, रात 2:20 बजे मुगलसराय स्टेशन के प्लेटफॉर्म के अंतिम छोर से 748 फीट दूर, हाई-टेंशन खंभा संख्या 1276 के पास उनका रक्तांश्रित शव लावारिस पड़ा मिला।
अत्यंत रहस्यमय बात यह थी कि उनके दाहिने हाथ की उंगलियों में पांच रुपये का एक नोट कसकर दबा हुआ था। उनके वस्त्र, कलाई घड़ी, चश्मा और बैग पूरी तरह सुरक्षित थे, लेकिन उनकी जेब में रखे अत्यंत महत्त्वपूर्ण राजनीतिक दस्तावेज गायब थे। इसके अलावा, उनके शरीर पर चोटों के निशान ऐसे नहीं थे जो किसी तेज रफ्तार ट्रेन से गिरने वाले व्यक्ति के शरीर पर होते हैं।
सीबीआई जांच और वाराणसी सत्र न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला
देशव्यापी जनआक्रोश के दबाव में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपी, जिसका नेतृत्व डीआईजी जॉन लोबो कर रहे थे। सीबीआई ने अत्यंत जल्दबाजी में यह थ्योरी प्रस्तुत की कि भारत लाल और राम अवध नामक दो मामूली चोर चोरी की नीयत से ट्रेन में चढ़े थे; और जब दीनदयाल उपाध्याय ने उन्हें पकड़ लिया और पुलिस कार्रवाई की चेतावनी दी, तो उन्होंने उन्हें चलती ट्रेन से धक्का दे दिया।
परंतु जब सीबीआई ने वाराणसी के विशेष सत्र न्यायालय में अपना मामला प्रस्तुत किया, तो विद्वान न्यायाधीश ने सभी साक्ष्यों की गहन समीक्षा के बाद सीबीआई की चोरी वाली थ्योरी को सिरे से खारिज कर दिया। 9 जून 1969 को न्यायाधीश ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए अभियुक्तों को हत्या के आरोपों से बरी कर दिया और टिप्पणी की: “अभियोजन पक्ष अभियुक्तों के विरुद्ध हत्या का आरोप सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा है। परिणामस्वरूप, इस हत्या के पीछे का वास्तविक सत्य अभी उजागर होना बाकी है।”
न्यायमूर्ति वाई.वी. चंद्रचूड़ जांच आयोग और साक्ष्यों का विलोपन
अदालत में सीबीआई की मनगढ़ंत कहानी के ध्वस्त होने के बाद संसद में जोरदार बहस हुई। 70 से अधिक सांसदों के लिखित ज्ञापन पर केंद्र सरकार ने 1969 में बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति वाई.वी. चंद्रचूड़ (जो बाद में भारत के मुख्य न्यायाधीश बने) की अध्यक्षता में एक-सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया।
‘जस्टिस चंद्रचूड़ कमीशन रिपोर्ट’ (उत्तर प्रदेश सरकार, 1969) का अध्ययन किसी के भी रोंगटे खड़े कर देने वाला है। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने स्वयं अपनी रिपोर्ट में लिखा: “मुगलसराय में जो कुछ हुआ, वह किसी काल्पनिक कहानी से भी अधिक विचित्र है। अनेक व्यक्तियों ने अत्यंत असामान्य व्यवहार किया, जो गहरा संदेह उत्पन्न करता है… यह संपूर्ण घटना रहस्य के घने बादलों में लिपटी हुई है।”
आयोग की कार्यवाही में यह स्थापित हुआ कि मामले के प्राथमिक दस्तावेज जैसे मूल प्राथमिकी (एफआईआर) और केस डायरी उत्तर प्रदेश पुलिस के रिकॉर्ड से रहस्यमय तरीके से गायब हो चुके थे। सीबीआई यात्रा के दौरान दीनदयाल उपाध्याय के कूपे में हुए बदलाव तथा उनके सह-यात्री मेजर एस.एल. शर्मा के संदिग्ध आचरण व परस्पर विरोधी बयानों का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे सकी। जिस अवस्था में शव पड़ा था, वह चलती ट्रेन से गिरने के बाद होने वाली स्वाभाविक शारीरिक उथल-पुथल से मेल नहीं खाती थी।
बलराज मधोक का विस्फोटक खुलासा और तत्कालीन राजनीतिक अनिवार्यता : जनसंघ के सह-संस्थापक और दीनदयालजी से पूर्व अध्यक्ष रहे बलराज मधोक ने अपनी आत्मकथा ‘जिंदगी का सफर’ (खंड 3, बी.आर. पब्लिशिंग कॉर्पोरेशन, दिल्ली, 1986) में स्पष्ट रूप से लिखा कि दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु एक अत्यंत सुनियोजित राजनीतिक हत्या थी।
बलराज मधोक ने लिखा: “दीनदयाल उपाध्याय की हत्या न तो कोई साधारण दुर्घटना थी और न ही दो मामूली चोरों का काम। यह भारतीय जनसंघ की बढ़ती शक्ति को कुचलने के लिए रचा गया एक गहरा राजनीतिक षड्यंत्र था।”
तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य अत्यंत संवेदनशील था: 1967 के आम चुनावों में कांग्रेस कई राज्यों में सरकार बनाने में विफल रही थी और जनसंघ एक शक्तिशाली विकल्प बनकर उभर रहा था। दीनदयाल उपाध्याय द्वारा गैर-कांग्रेसवाद के मंच पर विपक्षी दलों को एकजुट करने की रणनीति ने इंदिरा गांधी सरकार और उनके वामपंथी सहयोगियों के लिए बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया था। संसद में अपनी सरकार बचाने के लिए इंदिरा गांधी भाकपा (सीपीआई) के समर्थन पर निर्भर थीं। इसीलिए शोधकर्ताओं का मानना है कि तत्कालीन सत्ता ने सीबीआई की सतही रिपोर्ट के पीछे राजनीतिक षड्यंत्र की सच्चाई को दबाने का प्रयास किया।
मरणोपरांत वामपंथी दुष्प्रचार बनाम ‘अंत्योदय’ की हृदयस्पर्शी वास्तविकता
दुष्प्रचार का निरंतर दौर: जन्मशती पर वामपंथी प्रहार : दीनदयाल उपाध्याय के निधन के बाद भी वामपंथी विचारकों द्वारा उनके विचारों पर हमले बंद नहीं हुए। उनके जन्मशती वर्ष (2016-2017) के दौरान ‘द वायर’, ‘स्क्रॉल.इन’, ‘कारवा’ और ‘फ्रंटलाइन’ जैसे पोर्टलों ने अनेक लेख प्रकाशित कर उन्हें विवादित रूप में चित्रित करने का प्रयास किया।
इन आलेखों में उनके बयानों को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया गया और दावा किया गया कि एकात्म मानवदर्शन “उच्च वर्गीय वर्चस्व को बनाए रखने की रणनीति मात्र है।” परंतु प्रसिद्ध राजनीतिक वैज्ञानिक डॉ. सुदेश वर्मा ने अपनी पुस्तक ‘दीनदयाल उपाध्याय: ए प्रोफाइल’ (प्रभात प्रकाशन, 2016) में इन तर्कों को ध्वस्त करते हुए यह दर्शाया कि दीनदयालजी ने अपने संपूर्ण जीवन में जाति-प्रथा, छुआछूत और आर्थिक विषमता के विरुद्ध पुरज़ोर आवाज़ उठाई थी।
अपमान और कटुता के बीच अंत्योदय साधक की अनूठी मिसाल: 1960 के दशक के उत्तरार्ध में जब उत्तर बंगाल का नक्सलबाड़ी आंदोलन तेज़ी से फैल रहा था, तब हिंदी पट्टी के गांवों में भी वामपंथी और नक्सली कैडर सक्रिय थे। भीषण ठंड के एक अपराह्न में पंडित दीनदयाल उपाध्याय बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित एक अति पिछड़े गांव में पार्टी कार्य से पहुंचे। वह गांव भीषण गरीबी का शिकार था, जहां स्थानीय कम्युनिस्ट और नक्सली कैडर ग्रामीणों में वर्ग-संघर्ष का ज़हर घोल रहे थे।
जैसे ही दीनदयालजी वहां पहुंचे, कम्युनिस्ट यूनियन के नेताओं और नक्सली समर्थकों ने उन्हें घेर लिया। उन्होंने अपनी मुट्ठियां भींचकर हिंसक नारेबाज़ी शुरू कर दी: “पूंजीपतियों का दलाल, होशियार!”, “सामंतों का एजेंट दीनदयाल, मुर्दाबाद!” वे केवल नारेबाजी तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने उन पर कीचड़ और धूल फेंकी तथा उनका चरित्र-हनन किया। जब स्थानीय जनसंघ कार्यकर्ता आक्रोशित होने लगे, तो दीनदयालजी ने शांत भाव से हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया। उनके चेहरे पर न तो कोई क्रोध था और न ही कोई प्रतिशोध की भावना।
वहां से थोड़ी दूरी पर, एक जीर्ण-शीर्ण झोपड़ी के बाहर एक वृद्ध, भूमिहीन और शोषित मजदूर बैठा था। कड़कड़ाती ठंड में कांपते उस वृद्ध की आंखों में गहरी भुखमरी और लाचारी साफ झलक रही थी। अपने प्रति की जा रही गाली-गलौज और अपमान की परवाह न करते हुए दीनदयालजी सीधे उस वृद्ध मज़दूर के पास पहुँचे। वे धूलभरी ज़मीन पर उसी के पास बैठ गए। उन्होंने बिना किसी राजनीतिक दिखावे के अत्यंत प्रेम से अपनी मोटी ऊनी शॉल निकाली और उस कांपते हुए वृद्ध के कंधों पर लपेट दी।
अपने थैले से अपनी सूखी रोटी और गुड़ निकालकर उन्होंने उस वृद्ध के साथ बाँटकर खाई और अत्यंत आत्मीय स्वर में कहा: “बाबा, खूनी क्रांति या घृणा फैलाने वाले नारे कभी तुम्हारी थाली में रोटी नहीं परोस सकते। कम्युनिस्टों का वर्ग-संघर्ष तुम्हें अपने ही भाई से लड़ना सिखाता है, जबकि मेरा अंत्योदय तुम जैसे पंक्ति के अंतिम व्यक्ति के आँसू पोंछकर चेहरे पर मुस्कान लाना चाहता है। तुम न शोषक हो और न शोषित; तुम भारत माता की संतान हो।”
यह दृश्य देखकर नारेबाज़ी कर रहे कम्युनिस्ट कैडर स्तब्ध रह गए। जिस व्यक्ति को वे “वर्ग-शत्रु” कहकर कोस रहे थे, उसने करुणा, निश्छल प्रेम और अंत्योदय का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत कर दिया था। इस अगाध मानवता को देखकर ग्रामीणों और प्रदर्शनकारियों की आँखें नम हो गईं। वामपंथी उकसावे और दुष्प्रचार की ज़हरीली दीवार एक ही क्षण में ढह गई।
आधुनिक सुशासन में ‘अंत्योदय’ का मूर्तरूप
जिस विचार को वामपंथी समाजशास्त्रियों ने “अव्यावहारिक कल्पना” कहकर खारिज किया था, वही नीति स्वतंत्र भारत के कल्याणकारी राज्य का सबसे सफल और ऐतिहासिक मॉडल सिद्ध हुई:
अंत्योदय अन्न योजना (एएवाई): वर्ष 2000 में भारत सरकार द्वारा शुरू की गई इस योजना ने देश के सबसे गरीब और वंचित परिवारों को अत्यंत रियायती दरों पर खाद्यान्न सुरक्षा प्रदान की, जिससे दीनदयालजी के “अंतिम व्यक्ति के पेट भरने” के सपने को साकार किया गया।
दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डे-एनआरएलएम): नीति आयोग की मूल्यांकन रिपोर्टों के अनुसार, इस पहल ने स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के माध्यम से देश भर के 10 करोड़ से अधिक ग्रामीण गरीब परिवारों को सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है।
निष्कर्ष: इतिहास का अंतिम और अकाट्य निर्णय
विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि 20वीं सदी के मध्य में कम्युनिस्ट और नक्सली पारिस्थितिकी तंत्र ने मीडिया, अकादमिक जगत और प्रशासनिक तंत्र पर अपने एकाधिकार का लाभ उठाते हुए दीनदयाल उपाध्याय के प्रभाव को दबाने के लिए चार-स्तरीय रणनीति अपनाई थी:
परंतु समय के साथ इतिहास ने अपना अंतिम और अकाट्य निर्णय सुना दिया है। हिंसा, वर्ग-संघर्ष और दुष्प्रचार पर आधारित जिस विचारधारा का कभी भारत के बौद्धिक परिदृश्य पर वर्चस्व था, वह आज राजनीतिक, प्रशासनिक और वैचारिक रूप से अप्रासंगिक हो चुकी है। इसके विपरीत, कम्युनिस्ट अपमान और हिंसा के समक्ष अडिग खड़े पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानवदर्शन और अंत्योदय का विचार आज करोड़ों वंचित भारतीयों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर रहा है और भारत की राष्ट्रीय लोक-नीतियों का मूल आधार बना हुआ है।

















