गत दिनों (22 सितंबर 2026) सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक ट्रेंड चर्चा में रहा। यह पाकिस्तान के बेअदबी कानून से जुड़ा हुआ था। यह मुस्लिम प्रोफेसर जुनैद हफीज की कहानी है, जो पिछले 13 साल से जेल में हैं। उन्हें मौत की सजा सुनाई गई है।
कौन हैं जुनैद हफीज?
जुनैद हफीज पहले मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे और फिर उन्हें साहित्य से प्यार हुआ। उन्होंने किंग एडवर्ड मेडिकल यूनिवर्सिटी से मेडिकल की पढ़ाई छोड़ी और मुल्तान में बहाउद्दीन जकारिया यूनिवर्सिटी (BZU) के अंग्रेजी साहित्य विभाग में प्रवेश लिया। स्कॉलरशिप मिलने पर वे पढ़ाई के लिए अमेरिका गए। वहां से वापस मुल्तान आए और अपने कॉलेज में पढ़ाने लगे। यहीं से सारी कहानी शुरू हुई।
उदारवादी प्रोफेसर होने के नाते जुनैद कॉलेज कैंपस में ऐसे लोगों को बुलाते थे, जिनसे कट्टरपंथी असहज होते थे। वे कैंपस में महिलाओं के अधिकारों और जम्हूरियत अर्थात लोकतंत्र की बातें करते थे। विवाद तब और बढ़ा जब उन्होंने एक प्रसिद्ध ब्रिटिश पाकिस्तानी उपन्यासकार, पटकथा लेखक और महिला अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली कैसरा शाहराज (Qaisra Shahraz) को आमंत्रित किया। इस पर कट्टरपंथी छात्र उबल पड़े। उन्होंने आरोप लगाया कि जुनैद ऐसी चर्चाओं के बहाने बेअदबी (ब्लेसफेमी) करते हैं। कैसरा शाहराज के आयोजन में इस्लाम के खिलाफ काफी आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं।
यह कहा गया कि जुनैद, कैसरा शाहराज के उन उपन्यासों का समर्थन करते हैं, जो ब्रिटिश मूल्यों के हिसाब से हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि शाहराज का विरोध करने वालों ने शायद ही उनके कोई उपन्यास पढ़े हों। उनके विरोधियों ने यह आरोप लगाया कि वे एक गुप्त फेसबुक ग्रुप चला रहे हैं और उस समूह में पैगंबर को अपशब्द कहे जाते हैं। इसके बाद मार्च 2013 में मुल्तान पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था।
जुनैद का मामला हाथ में लेने पर वकीलों को धमकियां मिलीं। उनके एक वकील राशिद रहमान की वर्ष 2014 में हत्या कर दी गई थी। लोगों का कहना है कि यह सब इसलिए किया गया कि वकील डर जाएं और जज भी निर्णय देते समय इस अंजाम को ध्यान रखें। इसके बाद कोर्ट ने यह कहते हुए कि यह मामला संवेदनशील है और इसमें अतिरिक्त सुरक्षा की आवश्यकता है, जुनैद को अंधेरे बैरक में बंद कर दिया। तभी से उनकी अकेले की सजा जारी है।
2014 से 2019 तक उनके मुकदमे की सुनवाई बाधित रही। जज भी बदलते गए। यह ऐसा मामला था, जिसे कोई हाथ लगाने के लिए तैयार नहीं था। इस मुकदमे की सुनवाइयां बंद कमरे के भीतर हुई थीं।
2019 में मौत की सजा
जुनैद को वर्ष 2019 में मौत की सजा सुनाई गई। मीडिया के अनुसार उनके वकील ने कहा था कि आरोप लगाने वाले और गवाह एक भी आरोप को सही साबित नहीं कर पाए थे। वे इस परिणाम से पहले जुनैद से मिले थे और लग रहा था कि उन्हें छोड़ दिया जाएगा। जज को परिणाम सुनाने से पहले जुनैद पर आरोप लगाने वालों ने यह याद दिलाया कि यह मामला कितना संवेदनशील है और जुनैद ने इस्लाम का अपमान किया था।
अभी क्यों चर्चा में है यह मामला?
सजा के खिलाफ जुनैद ने अपील दायर की। इस अपील पर कई कारणों से कार्यवाही नहीं हो सकी, जैसे कि सुरक्षा, कोविड आदि। छह वर्ष के बाद लाहौर हाई कोर्ट में इस मामले की नियमित सुनवाई 22 सितंबर 2026 से एक बार फिर आरंभ हुई है।
परिजनों को विश्वास है कि जुनैद को आजादी मिलेगी
जुनैद के परिजनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को इस बात का पूरा विश्वास है कि जुनैद को रिहाई मिलेगी क्योंकि उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है। पहली ही सुनवाई में कोर्ट ने डिजिटल सबूतों को लेकर फटकार लगाई है।
सोशल मीडिया पर समर्थन की कतारें
सोशल मीडिया पर जुनैद के पक्ष में अभियान चल रहा है। पाकिस्तान के मानवाधिकार कार्यकर्ता और शिक्षक और विद्यार्थी जुनैद के इस मामले को लेकर मुखर हैं और वे लोग खुलकर कह रहे हैं कि उन्हें रिहा होना चाहिए। Justice for Junaid Hafeez का ट्रेंड भी चला। लोग कह रहे हैं कि जुनैद की तर्कशीलता से कट्टरपंथी डर गए हैं और इसलिए उनके खिलाफ बेअदबी का झूठा मामला दर्ज कराया गया था।
पाकिस्तान की मानवाधिकार कार्यकर्ता शीमा केरमानी ने वीडियो जारी करके पाकिस्तान की अदालत और सरकार से यह अपील की कि जुनैद की सुनवाई कानूनों के अनुसार हो।
लोग निष्पक्ष सुनवाई के लिए ऑनलाइन पिटीशन भी साझा कर रहे हैं। जुनैद का मामला इसलिए भी हैरान करने वाला है, क्योंकि इस्लाम की बेअदबी का आरोप किसी अल्पसंख्यक पर नहीं बल्कि मुसलमान पर लगाया गया है।

















