श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर का पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (IFFJK-2026), केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं है, बल्कि पुराने और गहरे जख्मों के भरने और जम्मू-कश्मीर के शांति और विकास की ओर कदम बढ़ाने का संकेत है। यह व्यापक खून-खराबे के लम्बे दौर के बाद घाटी में सहज-सामान्य जीवन की क्रमिक वापसी का घोषणा-पत्र भी है।
इस फिल्म महोत्सव के अंतर्गत श्रीनगर स्थित डल झील के निकटवर्ती शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस सेंटर में 41 देशों की 135 फिल्में प्रदर्शित की गयीं, जिनमें 60 विदेशी फिल्में हैं। 7 से 10 सितंबर तक आयोजित हुए इस पहले संस्करण के लिए 92 देशों से 1100 से अधिक प्रविष्टियां आईं। नौ श्रेणियों में कुल 96 लाख रुपये के नकद पुरस्कार दिए गए हैं, जिसमें सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फिल्म ‘व्हिस्पर माय नेम’ (ईरान) के लिए 25 लाख और जम्मू-कश्मीर से जुड़ी सर्वश्रेष्ठ फिल्म ‘तस्रुफदार–द जिन्स ऑफ कश्मीर’ (निर्देशक – कपिल मट्टू) के लिए 10 लाख का विशेष पुरस्कार शामिल है। यह कमाल उसी कश्मीर में हुआ है, जहाँ कभी सिनेमाघरों में आग लगा दी जाती थी।
कश्मीर में सिनेमा की वापसी का नया अध्याय
जम्मू-कश्मीर में हो रहे सकारात्मक बदलावों की निरन्तरता में अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (IFFJK-2026) जैसे बड़े सांस्कृतिक आयोजन को देखा-समझा जाना चाहिए। सिनेमा समाज का प्रतिबिम्बन और दिशा-निर्देशन करता है। डल झील पर फ्लोटिंग सिनेमा, मास्टरक्लास और स्थानीय प्रतिभाओं को वैश्विक मंच देना, सुखद और सकारात्मक बदलाव का परिणाम और प्रमाण है।
कश्मीर एकबार फिर सिनेमा के केंद्र में है, लेकिन इस बार केवल लोकेशन के रूप में नहीं, बल्कि अपना फिल्म इकोसिस्टम बनाने की कोशिश के रूप में भी आगे बढ़ रहा है। जम्मू-कश्मीर प्रशासन अब फिल्म पर्यटन को बढ़ावा देने और स्थानीय प्रतिभाओं को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय फिल्म उद्योग से जोड़ने की दिशा में काम कर रहा है।
इस प्रकार कभी सिनेमाघरों में आग लगाने के फरमान से लेकर अभी अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के आयोजन तक की यह यात्रा असाधारण उपलब्धि है।
भारतीय सिनेमा और कश्मीर का पुराना रिश्ता
पृथ्वी का स्वर्ग माने वाले कश्मीर और भारतीय सिनेमा का रिश्ता बहुत पुराना है। 1961 में शम्मी कपूर की फिल्म ‘जंगली’ ने कश्मीर को हिंदी सिनेमा का स्विट्जरलैंड बना दिया था। उसके बाद ‘कश्मीर की कली’ से लेकर 1983 में सनी देओल की ‘बेताब’ तक, पहलगाम की घाटी का नाम ही बेताब वैली पड़ गया था।
उस दौर में केवल श्रीनगर शहर में नौ सिनेमाघर थे, अनंतनाग, बारामुला और सोपोर में भी सिनेमा हॉल थे। कश्मीर केवल पसंदीदा शूटिंग लोकेशन मात्र नहीं, बल्कि फिल्म देखने और दिखाने का भी केंद्र था।
आतंकी हिंसा के दौर में बंद हो गया सिनेमाघरों का सिलसिला
यह संस्कृति 1989 में शुरू हुई आतंकी हिंसा के साथ नष्ट-भ्रष्ट हो गई। 31 दिसंबर, 1990 को आतंकी संगठनों- अल्लाह टाइगर्स और अल-उमर-मुजाहिदीन आदि ने सिनेमाघरों को गैर-इस्लामिक करार देकर बंद करने का फरमान जारी किया गया। इस फरमान को न मानने वाले सिनेमाघरों में आग लगा दी गयी।
बंद सिनेमाघर आतंकवादियों से लड़ने वाले सुरक्षा बलों के कैंप, पूछताछ केंद्र और अस्पतालों में बदल गये। 1996 में जब सरकार ने तीन सिनेमाघरों को फिर से खोलने की कोशिश की, तो 1999 में रीगल सिनेमा में ‘प्यार कोई खेल नहीं’ की स्क्रीनिंग के पहले दिन ही ग्रेनेड हमला हुआ, जिसमें एक दर्जन लोग घायल हुए। 2005 में नीलम सिनेमा के बंद होने के साथ ही घाटी पूरी तरह से परदा-विहीन हो गई।
कश्मीर की सिनेमाई छवि भी बदली
हिंसा के इस दौर ने पर्दे पर कश्मीर की छवि भी बदल दी। जहां कभी कैमरा झील और पहाड़ों की खूबसूरती दिखाता था, वह अब आतंकवाद, हिंसा और विस्थापन पर केंद्रित हो गया। रोजा, मिशन कश्मीर, फिजा और हैदर जैसी फिल्मों में कश्मीर को एक मनोरम पर्यटन-स्थल नहीं, बल्कि एक जटिल सामाजिक-राजनीतिक समस्या के रूप में प्रस्तुत किया गया।
इस आतंकी और अंधेरे दौर में मुठ्ठी भर स्थानीय कलाकार टेलीफिल्मों, म्यूजिक एल्बम और छोटे प्रोडक्शन के जरिए अपनी रचनात्मकता से जुड़े रहे।
2019 के बाद कश्मीर में सिनेमा के लिए बदली परिस्थितियां
कश्मीर और सिनेमा के बिगड़े हुए रिश्ते को फिर से पटरी पर लाने की समतल जमीन 5 अगस्त, 2019 के बाद तैयार हुई। अनुच्छेद 370 और 35 ए की समाप्ति के साथ जम्मू-कश्मीर में 890 केंद्रीय कानून लागू हुए, जो पहले लागू नहीं थे।
वाल्मीकि समाज, पाकिस्तान से आए शरणार्थियों, गोरखाओं और सफाई कर्मचारियों को पहली बार नागरिकता, मतदान और आरक्षण जैसे अधिकार मिले। पीओजेके विस्थापितों, घाटी से विस्थापित कश्मीरी पंडितों और सिखों के साथ भी न्याय हुआ है। महिलाओं को गैर-कश्मीरी से विवाह करने पर पैतृक संपत्ति से वंचित करने वाला विभेदक प्रावधान समाप्त हुआ। सरकारी जमीन पर धर्म विशेष के लोगों के कब्जे को शह देने वाले रोशनी एक्ट जैसे सांप्रदायिक और अनुचित कानून की समाप्ति हुई।
इसके अलावा जमीनी लोकतंत्र की भी बहाली हुई। तीन दशक बाद 2020 में जिला विकास परिषद के चुनाव हुए। परिसीमन के बाद विधानसभा की 90 सीटों का नया भौगोलिक और जनसांख्यिकीय संतुलन निर्मित हुआ। चिर उपेक्षित जम्मू संभाग मुख्यधारा में शामिल हुआ है। विकास और बदलाव में उसकी भी भूमिका और भागीदारी है।
2024 के विधानसभा चुनाव में मतदान का उल्लेख
2024 में हुए विधानसभा चुनाव में पिछले 35 साल में सर्वाधिक 64 प्रतिशत मतदान हुआ। यह लोकतांत्रिक भागीदारी ही सुरक्षा की सबसे बड़ी गारंटी बनी। प्रायोजित पत्थरबाजी की घटनाएं जो 2019 में दो हजार से अधिक थीं, 2024 में शून्य पर आ गईं। इस सुरक्षा और संवैधानिक स्थिरता ने ही विकास के पहियों को गति दी।
नई फिल्म नीति से बढ़ी शूटिंग गतिविधियां
फिल्म के क्षेत्र में 2021 में नई फिल्म नीति आई और 2022 में तीस साल बाद श्रीनगर में INOX द्वारा पहला मल्टीप्लेक्स और शोपियां तथा पुलवामा में सिनेमा हॉल खुले। नयी फिल्म नीति आने के बाद घाटी में 300 से अधिक फिल्मों और वेब सीरीज की शूटिंग हुई है।
इनमें से कश्मीर फाइल्स, उरी- द सर्जिकल स्ट्राइक, आर्टिकल 370, शेरशाह जैसी फ़िल्में और फॅमिली मैन, रियल कश्मीर फुटबॉल क्लब और सफ़ेद सागर जैसी वेब सीरीज खूब लोकप्रिय हुईं।
पर्यटन में भी हुई वृद्धि
पर्यटन में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। विधानसभा में प्रस्तुत किए गए सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2016-18 के बीच पूरे जम्मू-कश्मीर में 4.76 करोड़ पर्यटक आए थे, जबकि 2023-25 के बीच यह संख्या बढ़कर 7.85 करोड़ हो गई।
केवल कश्मीर घाटी में यह संख्या 59.56 लाख से बढ़कर 2.42 करोड़ हो गई और 2024 में कश्मीर ने 98.19 लाख पर्यटकों के साथ अपना सार्वकालिक रिकॉर्ड बनाया। पहलगाम हमले के कारण 2025 में इसमें अस्थायी गिरावट आकर 47.78 लाख रह गई, फिर भी यह 2018 के सालाना औसत से दोगुनी से अधिक है।
पर्यटन का प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 6.98 प्रतिशत का योगदान है। यह शिकारा वालों, होटल कर्मियों, पश्मीना कारीगरों, टैक्सी वालों आदि असंख्य लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार अवसर देता है।
कनेक्टिविटी ने पर्यटन और सिनेमा को दिया सहारा
पर्यटन और सिनेमा को सर्वाधिक सहारा और गति कनेक्टिविटी ने प्रदान की है। जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर 9.2 किलोमीटर लंबी श्यामाप्रसाद मुखर्जी टनल और 8.5 किलोमीटर लंबी बनिहाल-काजीगुंड टनल ने यात्रा को बारह घंटे से घटाकर छह घंटे कर दिया है। अब बर्फबारी के दौरान भी मार्ग खुला रहता है, जिससे सेब समय पर मंडी पहुंच रहा है।
उधमपुर-श्रीनगर-बारामुला रेल लिंक में चिनाब नदी पर दुनिया का सबसे ऊंचा रेल आर्च ब्रिज, जिसकी ऊंचाई 359 मीटर है, और अंजी खड्ड पर भारत का पहला केबल-स्टेड रेल ब्रिज जून 2025 में पूरा होकर प्रारम्भ हो चुका है। परिणामस्वरूप कश्मीर अब सीधे भारतीय रेल नेटवर्क से जुड़ गया है।
श्रीनगर हवाई अड्डे की यात्री क्षमता भी 25 लाख से बढ़कर 65 लाख हो गई है। बुनियादी ढांचे में अभूतपूर्व वृद्धि और सुधार हुआ है।
शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी विस्तार
सात नए मेडिकल कॉलेज, दो एम्स, दो केन्द्रीय विश्वविद्यालय, आईआईटी जम्मू और आईआईएम जम्मू के खुलने से शिक्षा और कौशल विकास की दिशा में उल्लेखनीय कार्य हुआ है।
नयी अधिवास नीति और सुगम औद्योगिक नीति लागू होने से 28,400 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों को मंजूरी मिली है।
अभी कई चुनौतियों पर काम की जरूरत
हालांकि, अभी जम्मू–कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने, घाटी से विस्थापित हिंदुओं और सिखों की घर–वापसी और पुनर्वास, जम्मू संभाग के भद्रवाह जैसे मनोरम पर्यटन–स्थलों को खोजने और पहचान दिलाने की आवश्यकता है।
इसके पाक अधिक्रांत जम्मू–कश्मीर (गुलाम कश्मीर) वासियों के दुख–दर्द को सुनने और उन्हें इस उत्पीड़न, अन्याय और अमानवीय जीवन–स्थितियों से मुक्ति दिलाने की दिशा में भी काम करने की जरूरत है।
तीन दीवारों के गिरने की कहानी
5 अगस्त 2019 ने एक संवैधानिक अड़चन की दीवार गिराई, 2022 में खुले मल्टीप्लेक्स ने एक मनोवैज्ञानिक दीवार गिराई और 2026 का यह फिल्मोत्सव एक सांस्कृतिक दीवार गिरा रहा है।
अब पंचायत से लेकर संसद तक एक ही संविधान के तहत चुनाव होते हैं, अब पर्यटक और उद्यमी निडर होकर आते हैं और कश्मीरियों से मेलजोल करते हैं, अब स्थानीय युवा पत्थर, बम-गोला या राइफल की जगह कलम, कैमरा, बल्ला उठाता है, अब सेब, केसर, बादाम-अखरोट का ट्रक बिना व्यवधान के निकलता है।
यह संकेत है कि कश्मीर अब आतंक और अलगाव नहीं, बल्कि भागीदारी और विकास चाहता है। अब कश्मीर को एक समस्या के रूप में नहीं, बल्कि संभावना के रूप में देखना होगा।
इस संभावनाशील भविष्य के लिए शांति और सद्भाव की निरन्तरता आवश्यक है। यही समृद्धि का द्वार भी है। मस्तक की शांति और स्थिरता भारतमाता की जययात्रा की अचूक औषधि है।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में प्रोफेसर हैं।)

















