सन् 1937 के पूर्व ‘वंदे मातरम्’ समस्त भारतीयों की आत्मा का गान और कंठहार था। यह हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक था, जिसने 1905 के बंगाल विभाजन को रद्द कराने में प्रमुख भूमिका निभाकर ब्रिटिश ‘बांटो और राज करो’ की नीति को ध्वस्त कर दिया था। इसलिए अलगाववादी मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना ने ‘वंदे मातरम्’ को भारत के विभाजन में प्रमुख रोड़ा माना और इसमें बुतपरस्ती को लेकर घोर आपत्ति दर्ज करते हुए 15 अक्तूबर 1937 को अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के लखनऊ अधिवेशन में खुलकर विरोध किया।
इस अधिवेशन में जिन्ना ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना, तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान दिलाना और ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत बनाकर सभी पर थोपना चाहती है। पूर्व सरकार्यवाह हो.वे. शेषाद्रि ‘और देश बंट गया’ पुस्तक में लिखते हैं, ‘’लखनऊ समझौते के कारण अंग्रेजों और कांग्रेस में इस बात की होड़ लग गई कि मुसलमानों को अपने पक्ष में कौन कर सकता है। अतः बिना सोचे-समझे कांग्रेस ने राजनैतिक तुष्टीकरण के चलते ‘वंदे मातरम्’ को गले से काट दिया।”
तुष्टीकरण में नेहरू दो कदम आगे
तुष्टीकरण को लेकर पंडित जवाहरलाल नेहरू तो एक कदम और आगे निकल गए। उन्होंने जिन्ना को 6 अप्रैल 1938 को लिखे पत्र में आत्मसमर्पण करते हुए लिखा कि अब कांग्रेस केवल दो छंद गाती है, पूरा गीत नहीं गाती, और मुस्लिम लीग के ध्वज को तिरंगे के समकक्ष मानती है। यहीं से केवल ‘वंदे मातरम्’ का विभाजन नहीं हुआ, वरन् देश का विभाजन भी तय हो गया था।
मजहब के आधार पर भारत के विभाजन के उपरांत ‘वंदे मातरम्’ पूरा गाया जाना चाहिए था, परंतु कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति जारी रही। कहीं ऐसा तो नहीं है कि स्वाधीनता के उपरांत कांग्रेस ने अंग्रेजों की ‘बांटो और राज करो’ की नीति का अनुसरण किया है? यह वर्तमान परिप्रेक्ष्य में 19 अगस्त 2026 को कांग्रेस ने प्रमाणित कर दिया। जब कांग्रेस कार्यसमिति ने उसी 1937 के कुटिल प्रस्ताव को दोहराते हुए पार्टी कार्यक्रमों में इसके गायन को केवल पहले दो पदों तक सीमित रखने के अपने रुख को फिर से आधिकारिक तौर पर पुष्ट किया है।
अब जब सरकार और जनमत संपूर्ण ‘वंदे मातरम्’ की प्रतिबद्धता को स्वीकार कर चुकी है, तब भी कांग्रेस और उनके सहयोगी विभाजित ‘वंदे मातरम्’ गीत को स्वीकारने की पैरवी कर रहे हैं। क्या यह किसी विभाजन की पृष्ठभूमि है? इसलिए समस्त भारतीयों को गंभीरता से समझना होगा और इसका विरोध करना होगा, अन्यथा भविष्य में गंभीर परिणाम हो सकते हैं, क्योंकि इतिहास का अत्यंत प्राचीन सिद्धांत है कि ‘इतिहास इतिहास को दोहराता है।’
परंतु सर्वाधिक महत्वपूर्ण और गंभीर प्रश्न यह है कि जिस ‘वंदे मातरम्’ में बुतपरस्ती (मूर्तिपूजा) को लेकर इतना भयावह प्रपंच रचा गया, तो क्या उसमें बुतपरस्ती की बात की गई है? उत्तर है, नहीं। क्योंकि ‘वंदे मातरम्’ गीत में राष्ट्र को मातृभूमि के रूप में विविध उपमाएं देकर चित्रित और रेखांकित किया गया है, इसलिए बुतपरस्ती का आरोप लगाना वितंडावाद अतिरिक्त कुछ नहीं है।
मौलाना रेजाउल करीम ने भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ का पुरजोर समर्थन किया था और इसे अत्यंत निर्दोष और सुंदर रचना बताया था। उन्होंने 4 दिसंबर 1938 को अपने प्रसिद्ध लेख ‘बंकिमचंद्र निकट मुसलमानेर ऋण’ में लिखा था, “वंदे मातरम् जैसे निर्दोष और सर्वांग सुंदर गीत को भी साम्प्रदायिक कहते हैं, पर जिनके पास उदार दृष्टि है, उन्हें ‘वंदे मातरम्’ गीत को समग्र दृष्टि से देखना चाहिए। वे देखेंगे कि उसमें बुतपरस्ती का दोष कहीं नहीं है। हमें यह देखना है कि इस्लाम किसको बुतपरस्ती कहता है और उसकी सीमा कहां है।”
उनका मानना था कि इस गीत को संकीर्ण या साम्प्रदायिक सोच से अलग हटकर एक बड़े और खुले नजरिए से देखा जाना चाहिए। बुतपरस्ती का खंडन करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि इस गीत को गाने या इसका सम्मान करने में इस्लाम के खिलाफ कोई बात नहीं है। मौलाना रेजाउल करीम के अनुसार, अपनी मातृभूमि या देश को माँ कहकर पुकारना और उसका आदर करना किसी भी तरह से गैर-इस्लामी नहीं है।
अब यह प्रश्न उठता है-बुतपरस्ती क्या है? क्या देश को मां कहकर संबोधन किया जा सकता या नहीं? जिस प्रकार जन्नत से अवतरित काबा का पवित्र पत्थर हज्र-ए-अस्वद इस्लाम में आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व रखता है, परंतु बुतपरस्ती का प्रतीक नहीं है, उसी प्रकार ‘वंदे मातरम्’ भी बुतपरस्ती का प्रतीक नहीं है। कुरान में अल्लाह का फरमान है, जिसमें मक्का शहर को ‘उम्मुल कुरा’ कहा गया है, जिसका अर्थ ‘शहरों/बस्तियों की मां’ होता है। कुरान में ‘उम्मुल मोमिनीन’ अर्थात् ‘मोमिनों की मां’, ‘उम्मुल मसाकीन’ अर्थात् ‘गरीबों की मां’। इस तरह से पैगंबर हजरत मोहम्मद की सभी पत्नियों को नवाजा गया है। ठीक इसी प्रकार से ‘वंदे मातरम्’ का अर्थ है, जिसे प्रकारांतर से दूषित करने का प्रयास किया जाता है।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नायक अजीमुल्लाह खान ने ही सबसे पहले ‘मादरे-वतन जिंदाबाद’ का नारा दिया था। देश को मां कहकर संबोधन करने की प्रथा अरबी-फारसी के अनेक कवि तथा लेखकों की रचनाओं में प्राप्त है। मौलाना अकरम खां ने अपने काव्य ग्रंथ ‘मोस्तफ़ा चरित’ में लिखा है, “हे अरब, मानवेर आदि भूमि।” इन पंक्तियों में कवि ने अरब की भूमि को ‘माता’ कहकर संबोधित किया है। काजी नजरुल इस्लाम बंगाल में ‘विद्रोही कवि’ के नाम से प्रसिद्ध थे और ‘वंदे मातरम्’ गीत के पक्के समर्थक थे। उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ को अपनी पत्रिका ‘धूमकेतु’ में शीर्ष स्थान दिया और एक नाटक में ‘वंदे मातरम्’ शब्द का खुलकर प्रयोग किया। वे ‘वंदे मातरम्’ गीत और नारे को देशभक्ति और आजादी का प्रतीक मानते थे।
मौलाना रेजाउल करीम बंगाल के प्रसिद्ध राष्ट्रवादी मुस्लिम लेखक, विचारक और विद्वान थे, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारत के विभाजन का कड़ा विरोध किया था। वे ‘वंदे मातरम्’ गीत के प्रबल समर्थक थे और इसके सांप्रदायिक होने के दावों को पूरी तरह खारिज किया था। 1930 के दशक में जब मुस्लिम लीग ने ‘वंदे मातरम्’ को इस्लाम-विरोधी बताकर इसका विरोध प्रारम्भ किया, तब मौलाना रेजाउल करीम ने इसके पक्ष में खुलकर अपनी बात रखी। उनका मानना था कि इस गीत का मुख्य उद्देश्य मूर्तिपूजा को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि देश (मातृभूमि) को किसी भी अन्य मूर्ति या देवी-देवता से बड़ा और सर्वोच्च स्थान देना है।
उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ की तारीफ करते हुए कहा था कि यह एक ऐसा गीत है जिसने “गूंगे को आवाज दी और कमजोर दिल वालों को साहस दिया।” उनका यह भी मानना था कि ब्रिटिश सरकार ने जानबूझकर इस विवाद को हवा दी है, ताकि मुसलमानों को आजादी की लड़ाई से दूर रखा जा सके। मौलाना रेजाउल करीम का जन्म 1902 में बंगाल के बीरभूम में हुआ था। उन्होंने कलकत्ता मदरसा और कलकत्ता विश्वविद्यालय से पढ़ाई की थी। वे अरबी, फारसी और बंगाली संस्कृति के अच्छे जानकार थे, भारत के विभाजन के सख्त खिलाफ थे और हमेशा हिंदू-मुस्लिम एकता की वकालत करते थे।
मौलाना रेजाउल का मानना था कि हिंदू देश-माता को दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती से ऊंचे सिंहासन पर बैठाकर उसकी वंदना करते हैं। यह बात आनंदमठ के नायक महेंद्र के आचरण से समझ आ जाती है। महेंद्र के सामने जब इस मां का वर्णन किया गया, तब वह चकित रह गया। बोला, ‘यह तो देश है, मां नहीं।’ हिंदुओं के ज्ञान, विश्वास, संस्कार और धार्मिक मतानुसार महेंद्र ने ठीक प्रश्न किया था। उत्तर में भवानंद ने कहा, ‘हां, यह मेरी मां है, जन्मभूमि ही मेरी मां है। अन्य देव-देवी, अन्य मां को हम नहीं मानते। हम लोगों का अन्य धर्म नहीं है, जाति नहीं है, एकमात्र जननी जन्मभूमि ही हम लोगों के लिए सब कुछ है।’ अतः ‘वंदे मातरम्’ का मूल उद्देश्य बुतपरस्ती की जय कहना नहीं, वरन् देश-धर्म की श्रेष्ठता को स्थापित करने के लिए ही उसकी रचना हुई थी।
मौलाना रेजाउल ‘वंदे मातरम्’ के विरोधियों को नसीहत देते हुए कहते हैं कि बुतपरस्ती समझ कर जो ‘वंदे मातरम्’ जैसे सर्वांग सुंदर संगीत को नापसंद करते हैं, मेरे विचार से उनका उद्देश्य पवित्र नहीं है। ‘वंदे मातरम्’ की भाषा तो बहाना मात्र है, असली कारण राजनीतिक है। प्रकृतिस्थ होकर किसी ने भी इस मामले पर गौर नहीं किया है, क्योंकि इसके लिए उदार दृष्टि, संस्कार-मुक्त हृदय और अन्य के प्रभाव से मुक्त स्वाधीन चिंतन की आवश्यकता है। इस्लाम के किसी आदर्श की दुहाई देकर वे कहते हैं कि ‘वंदे मातरम्’ बुतपरस्ती के अभाव से परिपूर्ण है। प्रचलित अर्थ स्वीकार करने पर ‘वंदे मातरम्’ गीत किसी भी एकेश्वरवादी की दृष्टि में आपत्तिजनक नहीं हो सकता। तो क्या कांग्रेस और उनके सहयोगी संपूर्ण ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रगीत का वास्तविक अर्थ समझकर, अपनी भूल सुधारकर, तुष्टीकरण की नीति को छोड़कर, राष्ट्रगीत की संपूर्णता को सहर्ष स्वीकार नहीं करेंगे?

















