गणेश जी का नाम आते ही मन में सबसे पहले उनकी सुंदर, शांत और प्रसन्न मुद्रा की छवि उभरती है। उनके एक हाथ में आशीर्वाद, दूसरे में मोदक और चेहरे पर मुस्कान भक्तों का मन मोह लेती है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और बुद्धि-विवेक का देवता माना जाता है। यही वजह है कि किसी भी शुभ काम की शुरुआत सबसे पहले गणेश जी की पूजा से की जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान गणेश को मोदक ही इतना प्रिय क्यों माना जाता है?
गणेश जी की पूजा में दूर्वा, सिंदूर और फूलों के साथ मोदक का विशेष महत्व है। गणेश चतुर्थी हो या कोई अन्य शुभ अवसर, भक्त उन्हें श्रद्धा से मोदक का भोग लगाते हैं। धार्मिक मान्यताओं में मोदक को केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि ज्ञान, आनंद, संतोष और आध्यात्मिक उपलब्धि का प्रतीक माना गया है। मोदक से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं, जो बताती हैं कि आखिर गणपति बप्पा को मोदक इतना प्रिय कैसे हुआ।
मोदक का अर्थ क्या है?
‘मोदक’ शब्द संस्कृत के ‘मोद’ शब्द से बना माना जाता है। ‘मोद’ का अर्थ होता है खुशी या आनंद। इस लिहाज से मोदक का अर्थ हुआ ऐसा पदार्थ जो मन को आनंद और प्रसन्नता प्रदान करे। मोदक का बाहरी आकार भले ही साधारण दिखाई देता हो, लेकिन इसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा माना जाता है। इसका बाहरी आवरण तप, साधना और कठिन परिश्रम का प्रतीक माना जाता है, जबकि अंदर मौजूद मीठी भरावन उस आनंद और ज्ञान को दर्शाती है, जो कठिन प्रयास के बाद प्राप्त होता है।
गणेश जी और मोदक से जुड़ी पौराणिक कथा
गणेश जी को मोदक प्रिय होने के पीछे कई कथाएं सुनाई जाती हैं। इनमें से एक कथा के अनुसार, एक बार माता पार्वती ने भगवान गणेश और उनके भाई कार्तिकेय के लिए एक विशेष दिव्य मोदक बनवाया। यह साधारण मिठाई नहीं थी, बल्कि इसे ज्ञान और बुद्धि का प्रतीक माना गया। कहा जाता है कि माता पार्वती ने दोनों पुत्रों से कहा कि जो इस मोदक को प्राप्त करना चाहता है, उसे अपनी योग्यता सिद्ध करनी होगी। एक कथा में दोनों भाइयों के बीच संसार की परिक्रमा करने की शर्त रखी गई। कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर संसार की परिक्रमा के लिए निकल पड़े। वहीं गणेश जी ने अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती की परिक्रमा की और कहा कि मेरे लिए माता-पिता ही पूरा संसार हैं। गणेश जी की बुद्धिमत्ता और माता-पिता के प्रति उनके सम्मान से प्रसन्न होकर उन्हें मोदक प्रदान किया गया। इसी वजह से मोदक को गणेश जी की बुद्धि, विवेक और ज्ञान से भी जोड़कर देखा जाता है।
मोदक क्यों बन गया गणेश जी का प्रिय भोग?
गणेश जी को मोदक प्रिय होने की एक वजह यह भी मानी जाती है कि वे सरल और सहज भाव से की गई पूजा को स्वीकार करने वाले देवता हैं। मोदक भी एक ऐसी मिठाई है, जिसे घर में आसानी से बनाया जा सकता है। महाराष्ट्र समेत देश के कई हिस्सों में गणेश चतुर्थी के दौरान विशेष रूप से उकडीचे मोदक बनाए जाते हैं। चावल के आटे से बने इस मोदक के अंदर नारियल और गुड़ की भरावन होती है। इसे भाप में पकाया जाता है और गणपति को इसका भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि भगवान गणेश को गुड़ और नारियल से बने मोदक विशेष रूप से प्रिय हैं। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में मोदक बनाने की विधि और स्वाद अलग हो सकता है, लेकिन श्रद्धा और भावना एक ही रहती है।
21 मोदक चढ़ाने की परंपरा क्यों है?
गणेश पूजा में कई जगह भगवान को 21 मोदक चढ़ाने की परंपरा है। इसके पीछे भी अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। कुछ मान्यताओं के अनुसार, भगवान गणेश को 21 प्रकार के पत्र और 21 मोदक अर्पित करने का विधान बताया गया है। 21 की संख्या को शरीर, मन और इंद्रियों से जुड़े विभिन्न तत्वों का प्रतीक भी माना जाता है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में इसकी व्याख्या अलग मिलती है, लेकिन भक्तों के लिए इसका मूल भाव भगवान गणेश के प्रति श्रद्धा और समर्पण ही है।
गणेश चतुर्थी पर क्यों खास हो जाता है मोदक?
गणेश चतुर्थी के दौरान घर-घर में गणपति की स्थापना की जाती है। दस दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में भगवान गणेश को अलग-अलग प्रकार के भोग लगाए जाते हैं, लेकिन मोदक का स्थान सबसे खास माना जाता है। महाराष्ट्र में गणेश उत्सव के दौरान उकडीचे मोदक विशेष रूप से बनाए जाते हैं। इसके अलावा देश के अलग-अलग हिस्सों में तले हुए मोदक, सूखे मेवे वाले मोदक, चॉकलेट मोदक और कई अन्य प्रकार के मोदक भी बनाए जाने लगे हैं। समय के साथ मोदक के स्वाद और रूप में बदलाव जरूर आया है, लेकिन गणेश जी के प्रति इसकी धार्मिक आस्था आज भी कायम है।















