हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी का दुर्लभ महासंयोग : जब श्रीकृष्ण ने राधा को बताया शिव-शक्ति का अटूट प्रेम
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हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी का दुर्लभ महासंयोग : जब श्रीकृष्ण ने राधा को बताया शिव-शक्ति का अटूट प्रेम

हरतालिका तीज महाव्रत: अनादि काल से प्रेम और दाम्पत्य जीवन का मूलाधार, हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी का 12 वर्ष बाद महासंयोग

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Sep 14, 2026, 09:09 pm IST
inधर्म-संस्कृति
भगवान शिव और माता पार्वती (फोटो- एआई द्वारा निर्मित)

भगवान शिव और माता पार्वती (फोटो- एआई द्वारा निर्मित)

सनातन धर्म में हरतालिका महाव्रत, प्रेम, समर्पण, पवित्रता, पति की प्राप्ति और दीर्घायु, पारिवारिक समरसता और शक्ति के अपूर्व सामर्थ्य का महापर्व है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कुटुम्ब प्रबोधन और सामाजिक समरसता की दृष्टि से इस व्रत की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। हरतालिका व्रत, हिन्दुओं के महान् व्रतों में से एक व्रत है,जो सर्वाधिक कठिन लक्ष्य प्राप्त करने की प्रेरणा देता है, फलस्वरूप आखिरकार सौभाग्यशाली गौरी जी, महादेव को प्राप्त कर ही लेती हैं।

हरतालिका तीज एक पावन और भावनात्मक पर्व है, जो भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक माना जाता है। आज के समय में अनेक पुरुष भी अपनी पत्नियों के साथ यह व्रत रखकर इस पर्व की भावना को और सशक्त बना रहे हैं। यही कारण है कि यह व्रत स्त्री-शक्ति, श्रद्धा और अटूट प्रेम का प्रतीक बन गया है।

हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी का महासंयोग इस वर्ष का सबसे बड़ा और दुर्लभ मणि-कांचन योग है। 12 वर्ष बाद ऐसा महासंयोग बना है। एक ओर सुहागिन महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए निर्जला व्रत रख रही हैं,वहीं दूसरी ओर इसी दिन घर-घर में गणपति विराजित हुए।

वर्ष 2026 में हरतालिका तीज (तीजा) के दिन सोमवार का वार होने के साथ-साथ रवि योग, शुक्ल योग, ब्रह्म योग और इंद्र योग का दुर्लभ और अत्यंत शुभ संयोग है। यह एक अत्यंत दुर्लभ ज्योतिषीय घटना है। गुरु, अपनी उच्च राशि कर्क में मौजूद हैं। बुध,अपनी स्वराशि कन्या में स्थित हैं। सूर्य,अपनी स्वराशि सिंह में विराजमान हैं। शुक्र,अपनी स्वराशि तुला में हैं। चार बड़े ग्रहों का इस तरह अपनी उच्च या स्वराशि में होना जातकों के व्यवसाय,आर्थिक स्थिति और दाम्पत्य जीवन में सुख-समृद्धि लेकर आता है।

हरतालिका व्रत पूजन कथा के पूर्व इसकी पूर्वपीठिका अवश्य जान लेनी चाहिए,ताकि इस व्रत के प्रयोजन का स्पष्टीकरण हो सके। शिव-शक्ति ही अखिल ब्रम्हांड में प्रेम की शाश्वतता का प्रतीक हैं। सती और शिव का अमर प्रेम अर्धनारीश्वर होकर प्रेम की पराकाष्ठा का द्योतक है।भावी पीढ़ी के लिए शिव – शक्ति का आदर्श प्रेम मार्गदर्शी है।

जब श्री कृष्ण ने सुनाई राधा जी को यह कथा

कृष्ण चतुर्दशी की शिवरात्रि का यह वृतांत है, जब भगवान् श्रीकृष्ण से राधा जी ने प्रेम के वशीभूत होकर कहा कि विश्व में आपसे बड़ा प्रेमी कोई नहीं हो सकता है! तब श्री कृष्ण ने कहा नहीं राधा! इस अखिल ब्रम्हांड में महादेव से बड़ा कोई प्रेमी नहीं हो सकता और ऐसा कहने के साथ श्रीकृष्ण के आंसू निकलने लगे और उन्होंने राधा को बताना प्रारंभ किया, श्री कृष्ण ने कहा कि राधा, सब रूप बदल- बदल कर नये रूप लेते रहे अलग- अलग रुप लेकर रास लीला करते रहे परंतु महादेव ने कभी अपनी सती (उमा) को नहीं छोड़ा। प्रिय राधा, दक्ष के यहां सती जब अग्नि प्रविष्ट हुईं तब महादेव ने उनके उसी शरीर को लिपटाये सदियों विचरण किया और प्रथम एक वर्ष लगातार विलाप किया वही अश्रु रुद्राक्ष बन गये तब महादेव ने वो रुद्राक्ष की माला पहनी और पूरे शरीर में भी रुद्राक्ष धारण कर लिए।

महादेव ने “राख” तक नहीं छोड़ी पूरे शरीर में राख लपेट ली, वहीं सती के वाहन बाघ (सिंह) ने भी अपने प्राण त्याग दिए थे, तब महादेव ने सती के वाहन का चर्म पहन लिया जिसे हम बाघाम्बर के नाम से जानते हैं। आज भी महाकाल ने सती की राख को अपने शरीर में लपेट कर रखा है। महादेव प्रेम की अतल गहराइयों में थे, तब सभी देवताओं ने चिंतित होकर मुझसे प्रार्थना की तब मैंने (भगवान् विष्णु) सुदर्शन चक्र से सती के पार्थिव शरीर के 52 टुकड़े कर दिए, जो महान् शक्तिपीठ बने।

महादेव ने उन टुकड़ों से भी सती की हड्डियाँ निकाल लीं और उनको गले में धारण कर लिया और आज भी धारण किए हुए हैं, उसके उपरांत महादेव योगी हो गये। प्रयोजन हेतु पार्वती के रूप में सती ने महादेव को पाने के लिए पुन:अवतार लिया महादेव ने उन्हें तभी स्वीकार किया जब मैंने विश्वास दिलाया।

हरतालिका तीज व्रत कथा

उक्त उपाख्यान के तारतम्य में हरतालिका तीज व्रत कथा इस प्रकार है कि, एक बार कैलाश पर्वत पर माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा कि उन्हें ऐसा कौन-सा पुण्य मिला, जिससे वे शिव को पति रूप में प्राप्त कर सकीं। इस पर भगवान शिव ने उन्हें उनकी ही तपस्या की स्मृति दिलाई। माता पार्वती बाल्य काल से ही शिव जी को अपने मन में पति के रुप में शिरोधार्य कर चुकी थीं और इसी संकल्प के साथ उन्होंने 12 वर्षों तक कठोर तप किया। उन्होंने जंगल में रहकर पेड़ों के पत्ते खाए, अन्न का त्याग किया और हर मौसम की कठिनाइयों को सहा। उनके इस तप को देखकर उनके पिता, हिमालय राज चिंतित हो उठे। उसी समय नारद ऋषि भगवान विष्णु का रिश्ता लेकर आए, जिसे हिमवान (हिमालय राज ) ने स्वीकार कर लिया। जब पार्वती जी को यह बताया गया, तो वे अत्यंत दुखी हुईं और अपने मन की बात सखियों से साझा की। उन्होंने कहा कि वे तो पहले ही भगवान शिव को पति के रुप में स्वीकार कर चुकी हैं इसलिए किसी और से विवाह नहीं करेंगी। यह सुनकर सखियों ने उनको चुपचाप ले जाकर एक गुफा में छुपा दिया। वहीं पार्वती जी ने भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र में मिट्टी से शिवलिंग बनाकर शिव जी की आराधना की और रात भर जागरण किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव जी प्रकट हुए और उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। तब से यह व्रत सनातन में प्रचलित हुआ और महिलाओं का कंठहार बना।

पूजा सामग्री

पूजा सामग्री के रुप में फल, फूल, कपूर, घी, दीपक, मिठाई, सुपारी, पान, बताशा, घी, कुमकुम, पूजा-कलश, सूखा नारियल, शमी का पत्ता, धतूरा, शहद, गुलाल, पंचामृत, कलावा, इत्र, चंदन, मंजरी, अक्षत, गंगाजल, दूर्वा, जनेऊ, बेलपत्र, वस्त्र और केले का पत्ते का प्रावधान है।

तीज में रंगों का महत्व

हरतालिका तीज में रंगों का भी विशेष महत्व है। इस दिन महिलाएं पारंपरिक श्रृंगार करती हैं और शुभ रंगों के वस्त्र धारण करती हैं। लाल रंग देवी पार्वती का प्रिय है, जो प्रेम और शक्ति का प्रतीक है। हरा रंग हरियाली और समृद्धि का संकेत देता है, जबकि गुलाबी रंग सौम्यता और आपसी समझ का प्रतीक माना जाता है, इसके विपरीत, काला, नीला, सफेद और क्रीम रंग वर्जित माने जाते हैं।

ज्योतिषियों के अनुसार, हरतालिका तीज में पूजा करते समय फुलेरा का बड़ा महत्व है। पूजा के दौरान भगवान शिव के ऊपर जलधारा की जगह फुलेरा बांधा जाता है। फुलेरा को पांच तरह के फूलों से बनाया जाता है। फुलेरा में बांधी जाने वाली 5 फूलों की मालाएं भगवान शंकर की पांच पुत्रियों (जया, विषहरा, शामिलबारी, देव और दोतली) का प्रतीक है।

शिव-शक्ति ही अखिल ब्रह्मांड में प्रेम की शाश्वतता के प्रतीक

कल्चरल मार्क्सिज्म के शिकार, लैला-मंजनू, शीरी – फरहाद और रोमियो – जूलियट की असफल प्रेम कहानियों में भटकते हुए न केवल भारत वरन् विश्व के स्त्री- पुरुषों को सनातन दृष्टि से प्रेम और विवाह को समझना होगा तभी प्रेम सफलीभूत होगा। प्रेम यदि दैहिक है तो निश्चित ही असफल होगा परंतु आध्यात्मिक भी है तो अमर रहेगा, सती और शिव का प्रेम इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

शिव-शक्ति ही अखिल ब्रम्हांड में प्रेम की शाश्वतता का प्रतीक हैं। सती और शिव का अमर प्रेम अर्धनारीश्वर होकर विवाह संस्कार के रुप में सफलीभूत होता है।भावी पीढ़ी के लिए शिव-शक्ति का आदर्श प्रेम और विवाह मार्गदर्शी है और हरतालिका व्रत उसका साक्षी है।

 

Topics: hartalika teej 2026Ganesh Chaturthi 2026Shri Krishna Radha KathaShiv Parvati Prem KathaHartalika Teej Vrat Vidhiहरतालिका तीज व्रत कथा
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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