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“राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता के अधिष्ठाता भगवान श्री गणेश”

भगवान श्रीगणेश की प्रेरणा से ही स्व के आलोक में, लोकमान्य तिलक जी का नारा "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है" उद्भूत हुआ था। इसलिए श्रीगणेश,स्वतंत्रता संग्राम के अमर महानायक, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता के प्रतीक हैं।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा — edited by Mahak Singh
Sep 14, 2026, 04:27 pm IST
inभारत

भारतवर्ष और सनातनियों पर जब – जब संकटों के कृष्ण मेघ छाए,तब – तब भगवान् किसी न किसी रुप में संकटमोचक के रुप में आए। मध्य काल में मुस्लिम आक्राताओं के विरुद्ध श्रीराम और श्रीकृष्ण आध्यात्मिक शक्ति के रुप में संकटमोचक बने,तो हर हर महादेव का स्वर विजय घोष बना।वहीं आधुनिक युग में जब बरतानिया सरकार के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम छिड़ा,तब उसकी सफलता और स्व की रक्षा के लिए श्रीगणेश आध्यात्मिक ऊर्जा के केन्द्र बिन्दु बने।

गणपति: मंगल और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक

भगवान श्रीगणेश की प्रेरणा से ही स्व के आलोक में, लोकमान्य तिलक जी का नारा “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” उद्भूत हुआ था। इसलिए श्रीगणेश,स्वतंत्रता संग्राम के अमर महानायक, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता के प्रतीक हैं। सत्य सनातन धर्म में भगवान् श्रीगणेश का आध्यात्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक महत्व अद्भुत एवं अद्वितीय है। सनातन धर्म में मांगलिक कार्यों प्रारंभ ही श्रीगणेश का पर्याय है। हिन्दू धर्म शास्त्रों अनुसार भगवान गणेश जी का प्राकट्य सतयुग में भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि, स्वाति नक्षत्र, अभिजीत मुहूर्त और सिंह लग्न में दोपहर के प्रहर में हुआ था।

गणेश चतुर्थी पर बन रहे शुभ संयोग

हिंदू धर्म में भाद्रपद माह भगवान गणेश के अवतरण से जुड़ा है। हर वर्ष शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को एक महोत्सव की तरह मनाया जाता है, जो 10 दिनों तक लगातार चलता है।ऐंसे में गणेश चतुर्थी के शुभ मुहूर्त के बारे में भी जान लेना आवश्यक हो जाता है। वैदिक हिंदू पंचांग केअनुसार,भाद्रपद शुक्ल पक्ष,चतुर्थी तिथि का प्रारंभ 14 सितंबर 2026 को प्रातः 07:06 बजे से और समापन 15 सितंबर 2026 को प्रातः 07:44 बजे होगा।स्थापना का मुख्य मुहूर्त,प्रातः 11:02 बजे से दोपहर 01:31 बजे तक तक रहेगा,जिसमें अभिजीत मुहूर्त,प्रातः 11:52 बजे से दोपहर 12:41 बजे के मध्य सर्वाधिक शुभ है। इस वर्ष गणेश चतुर्थी पर  अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोग बन रहे हैं, जो पूजा के महत्व को दोगुना कर रहे हैं।14 सितंबर को दोपहर 12:47 बजे तक ब्रह्म योग रहेगा। इस योग में की गई पूजा और स्थापना से कार्यों में सफलता और बौद्धिक विकास होता है। रवि योग का संयोग है,सभी प्रकार के दोषों को दूर करने और शुभ फलों में वृद्धि करने वाला माना जाता है। इस दिन दोपहर 01:55 बजे तक चित्रा नक्षत्र रहेगा, जिसके बाद स्वाति नक्षत्र प्रारम्भ होगा। चंद्रमा और शुक्र दोनों तुला राशि में मौजूद रहेंगे, जिससे ज्योतिषीय दृष्टिकोण से एक सुखद और धन-समृद्धि देने वाला राजयोग बन रहा है।

गणेश पूजा की प्राचीन परंपरा

सतयुग में विनायक, त्रेतायुग में मयूरेश्वर, द्वापर में गजानन और कलयुग में भगवान् कल्कि के साथ श्रीगणेश का प्राकट्य धूम्रवर्ण और शूर्पकर्ण के रुप में होगा। जबलपुर में स्थित सुप्तेश्वर गणेश मंदिर इसका प्रमाण है।श्रीगणेश बुद्धि के देवता और विघ्नहर्ता के रुप में सनातन धर्म में शिरोधार्य हैं। यद्यपि अनादि काल भगवान् गणेश की पूजा अर्चना होती आ रही है परंतु सातवाहनों, राष्ट्रकूटों, चालुक्यों के काल से सार्वजनिक रुप से गणेशोत्सव मनाने के प्रमाण मिलते हैं, परन्तु छत्रपति शिवाजी महाराज की माताश्री जीजाबाई ने पुणे में कस्बा गणपति की स्थापना कर लोकव्यापीकण की नींव रखी। पेशवा युग में गणेशोत्सव धूमधाम से मनाया जाने लगा परंतु भद्र परिवारों तक सीमित रहा।

आगे चलकर जब बरतानिया सरकार ने हिन्दुओं के पर्वों को सार्वजनिक मनाए जाने पर रोक लगा दी,तब लोकमान्य तिलक महोदय ने स्वतंत्रता संग्राम को व्यापक रुप देने, राष्ट्रीय एकता स्थापित करने तथा सामाजिक समरसता के परिप्रेक्ष्य में जात-पांत और छुआछूत को समाप्त करने के लिए गणेशोत्सव का वृहत स्तर पर लोकव्यापीकण किया। भारत के स्वाधीनता संग्राम में गणपति महोत्सव का अद्भुत एवं अद्वितीय योगदान रहा है। रौलेट एक्ट समिति ने गणेशोत्सव के प्रति गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए, इस पर कड़ी निगरानी रखने की समझाईश दी थी। इसके बाद से ही बरतानिया सरकार ने गणेशोत्सव पर सख्त निगरानी रखी, बावजूद इसके गणेशोत्सव के समय स्वाधीनता संग्राम की अलख जगाई जाती थी।इसलिए स्वाधीनता के अमृत काल में गणेशोत्सव के योगदान को रेखांकित किए बिना स्वाधीनता संग्राम का इतिहास अधूरा ही रह जाएगा। स्वराज के संघर्ष के लिए लोकमान्य तिलक अपनी बात को जन-जन तक पहुंचाना चाहते थे।एतदर्थ  उन्हें एक सार्वजनिक मंच की आवश्यकता थी, अतः उन्होंने गणपति उत्सव को चुना और आगे बढ़ाया। तिलक जी ने गणेश उत्सव के बाद शिवाजी के नाम पर भी लोगों को आपस में जोड़ा तिलक द्वारा प्रारंभ, गणेश उत्सव से गजानन राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बन गए। तिलक जी निर्देशन में सन् 1893 से तमाम विरोधों के बाद भी गणपति महोत्सव सार्वजनिक रुप से मनाया गया। लोकमान्य तिलक के कर कमलों से श्रीमंत दगडूशेठ हलवाई गणपति की स्थापना हुई। स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने हेतु अनेक मल्लों को संगठित किया गया। क्रांतिकारियों को संरक्षण दिया गया। अविलंब ही इसका व्यापक विस्तार हुआ। संपूर्ण भारत में सभी जातियों के लोग।गणेशोत्सव मनाने लगे। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में कवि गोविंद ने गणेशोत्सव के समय राष्ट्रीयता से ओतप्रोत गीतों का प्रचलन आरंभ किया जिन्हें “पोवाडे” कहा गया।

गणेशोत्सव से जागी राष्ट्रभक्ति

गणेशोत्सव के समय लोकमान्य तिलक जी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, पं मदनमोहन मालवीय, विनायक दामोदर वीर सावरकर  जी सदैव सहभागिता करते और अपने भाषणों से स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय एकता की अलख जगाते थे। यद्यपि संस्कारधानी में भी 1893 से गणेशोत्सव आरंभ हो गया था, परन्तु लोकमान्य तिलक जी 1916 में प्रथम बार और उसके बाद 1917 से संस्कारधानी  में भी सार्वजनिक रुप से भालदारपुरा में मराठी समाज के साथ सभी ने मिलकर गणपति रखे जाने की परंपरा प्रारंभ की। जो अब महाराष्ट्र विद्यालय में परंपरा चल रही है।  पुणे के ग्राम देवता अर्थात कसबा पेठ गणपति, स्वाधीनता पूर्व कालावधि में जनमानस में देशभक्ति की भावना जागृत करने के उद्देश्य से मेलों और सभाओं का आयोजन किया जाता था।

गणेशोत्सव बना क्रांतिकारियों का मंच

सन् 1901 में स्थापित तुलसी बाग़ गणपति, गणेशोत्सव मंडल के कार्यकर्ता पुणे के क्रांतिकारियों की गुप्त सभाओं में सहभागी होते थे। सन् 1928 में  गणेश गल्ली, लालबाग सार्वजनिक उत्सव मंडल की स्थापना हुई। सन् 1945 में अद्भुत एवं अद्वितीय झांकी प्रस्तुत की गई, जिसमें नेताजी सुभाषचंद्र बोस स्वाधीनता के सूर्योदय का रथ चला रहे हैं और रथ में श्रीगणेश विराजमान हैं। यह झांकी इतनी लोकप्रिय हुई कि 10 दिनों की जगह 45 दिनों बाद गणेश विसर्जन किया गया था। लालबागचा राजा सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल द्वारा सन् 1934 से सन् 1947 तक विविध राष्ट्रीय विचारधारा के नेताओं के भाषण आयोजित किये गए। देशभक्ति की भावनाओं को बढ़ा देने वाली झाकियां, सजावट तैयार की जाती थी।

वहीं सन् 1920 में स्थापित ठाणे के श्री गणेशोत्सव लोकमान्य आली मंडल ने सन् 1931 में अस्पृश्यों के मेले का आयोजन किया था। बाल गंगाधर तिलक जी के विचारों का अनुसरण करते हुए, खामगाँव बुलढाणा के तानाजी गणेशोत्सव मंडल के कार्यकर्ताओं ने स्वाधीनता संग्राम सहित गोवा मुक्ति आन्दोलन में सहभागिता की तथा कारावास में भी समय काटा था। सिंहावलोकन यह है कि श्रीगणेश,भारतीय स्वाधीनता संग्राम में स्व के प्रतीक ही नहीं वरन् राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक समरसता के आध्यात्मिक पिता बने।वर्तमान में भारत में ही नहीं,अपितु संपूर्ण विश्व में गणेशोत्सव पर्व सनातनियों द्वारा धूमधाम से मनाया जाता है। विश्व के सुख और समृद्धि की कामना करते हुए,सनातनियों का यह गणेशोत्सव पर्व,हर युग में प्रासंगिक रहेगा। इस वर्ष हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी का महासंयोग इस वर्ष का सबसे बड़ा और दुर्लभ मणि-कांचन योग है। 12 वर्ष बाद ऐसा महासंयोग बना है, जहां एक ओर सुहागिन महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए निर्जला व्रत रखेंगी,वहीं दूसरी ओर उसी दिन घर-घर में गणपति विराजित होंगे।

” एकदंताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि,
 तन्नो दंती प्रचोदयात् । गजाननाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, 
तन्नो दंती प्रचोदयात्।” 

Topics: Ganesh Sthapana MuhurtaGaneshotsav and freedom struggleHistory of GaneshotsavLokmanya TilakGaneshotsavLord GaneshaGanesh PujaGanesh Chaturthi 2026
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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