टोरंटो (कनाडा) / नई दिल्ली। कनाडा के टोरंटो में आयोजित भव्य हिंदू समुदाय समागम ‘हिंदू विश्व बंधु: एम्ब्रेस द वर्ल्ड विद फ्रेंडशिप’ (Hindu Vishwa Bandhu: Embrace the World with Friendship) ने वैश्विक स्तर पर मानवीय सौहार्द और सांस्कृतिक अपनत्व की एक अनूठी मिसाल कायम की है. 30 अगस्त 2026 को आयोजित इस विशेष समारोह में पूरे कनाडा से 175 से अधिक संस्थाओं के सहयोग से 2,000 से अधिक प्रतिनिधि और नागरिक सम्मिलित हुए. इस ऐतिहासिक सम्मेलन के मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी रहे, जिनका मुख्य उद्बोधन मित्रता, विविधता में एकता, सामाजिक समरसता, चरित्र निर्माण, सेवा और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के विराट भाव पर केंद्रित था.
इस सम्मेलन की सबसे भावुक और प्रेरक झलक तब सामने आई जब पूरी तरह से भिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाले एक ईरानी नागरिक हसन बी. (Hasan B.) ने इस कार्यक्रम में भाग लिया और अपने अनुभवों को दुनिया के सामने साझा किया. हिंदू समुदाय से कोई पूर्व परिचय न होने के बावजूद, अपने मित्र संतोष के आमंत्रण पर केवल कौतूहलवश पहुंचे हसन ने जो महसूस किया, वह आज की दुनिया में रूढ़ियों और पूर्वाग्रहों को तोड़ने वाला है.
“विभिन्न संस्कृतियां, अलग परंपराएं, लेकिन एक मानव परिवार”- हसन की आपबीती
हसन ने किसी व्याख्या के बिना अपने वास्तविक अनुभवों को ठीक उसी रूप में साझा किया जैसा उन्होंने प्रत्यक्ष देखा और महसूस किया-
“मैं 30 अगस्त के टोरंटो कार्यक्रम में एक अतिथि और कई मायनों में एक बाहरी (Outsider) व्यक्ति के रूप में शामिल हुआ था। एक ईरानी के रूप में, जो पूरी तरह भिन्न संस्कृति में पला-बढ़ा, मैं सिर्फ जिज्ञासा से गया था। लेकिन जिस क्षण मैं पहुँचा, वहाँ के वातावरण ने मुझे अपनी ओर खींच लिया। जो बात मेरे दिल को छू गई, वह थी यहाँ का खुला स्वीकार भाव। एक अलग पृष्ठभूमि से आने के बावजूद मुझे एक पल के लिए भी यह नहीं लगा कि मैं कोई बाहरी हूँ। लोगों का व्यवहार बेहद आत्मीय, सत्कारपूर्ण और स्वागत करने वाला था।” – हसन बी., सम्मेलन में पहुंचे ईरानी अतिथि
हसन ने बताया कि एक ऐसे समुदाय को देखना बेहद अद्भुत था, जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं पर इतना गहरा गर्व करता है, और साथ ही दूसरी पृष्ठभूमि से आए व्यक्ति को भी उतनी ही सहजता से गले लगाता है.
एक नजर में समझें टोरंटो ‘हिंदू विश्व बंधु’ सम्मेलन केमुख्य बिंदु
| पहलू / विषय | कार्यक्रम एवं अनुभव का मुख्य ब्योरा |
|---|---|
| आयोजन का नाम | ‘हिंदू विश्व बंधु: एम्ब्रेस द वर्ल्ड विद फ्रेंडशिप’ (टोरंटो, कनाडा). |
| मुख्य वक्ता | सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी. |
| भागीदारी | पूरे कनाडा से 175 से अधिक संगठनों का समर्थन, 2000+ प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित. |
| विशेष परिप्रेक्ष्य | ईरानी मूल के अतिथि हसन बी. द्वारा हिंदू समाज के आतिथ्य और एकता के संदेश की सराहना. |
| मूल संदेश | सांस्कृतिक आत्मविश्वास और वैश्विक खुलापन; विविधता कभी दूरी नहीं, बल्कि एकता का सेतु है. |
सरसंघचालक जी के संबोधन ने जगाया एकता का शाश्वत भाव
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी के विचारों का उल्लेख करते हुए हसन ने कहा कि उनके संबोधन में जो बात सबसे अधिक दिल में उतर गई, वह थी मानवता की एकता का संदेश.
हसन के शब्दों में उद्बोधन का प्रभाव:
- मानव मात्र की एकता: सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने एक बेहद सरल लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण बात याद दिलाई—चाहे हमारी पृष्ठभूमि, संस्कृति, भाषा, मजहब या परंपराएं कितनी भी भिन्न क्यों न हों, एक इंसान के नाते हम सब मूल रूप से एक ही हैं.
- दूरियां नहीं बनाती विविधता: हम अक्सर उन बातों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर देते हैं जो हमें अलग करती हैं और यह भूल जाते हैं कि क्या हमें आपस में जोड़ता है. स्वीकार्यता और परस्पर सम्मान के साथ विविधता लोगों के बीच की दूरियां मिटा देती है.
- संस्कृति का गौरवशाली प्रदर्शन: पारंपरिक संगीत, नृत्य, रंगों और ऊर्जा से भरपूर प्रस्तुतियों ने यह दिखा दिया कि कोई समुदाय अपने इतिहास और पहचान को कितने स्वाभिमान और उल्लास के साथ व्यक्त कर सकता है.
“मैं उस शाम को केवल एक पंक्ति में समेट सकता हूँ—’अलग-अलग संस्कृतियां, भिन्न-भिन्न परंपराएं, लेकिन एक अखंड मानव परिवार’। मैं जिज्ञासा लेकर आया था और हिंदू संस्कृति, समाज तथा इस एकात्म दृष्टि के प्रति गहरा आदर लेकर लौटा हूँ।” – हसन बी.
पूर्वाग्रहों के दौर में प्रत्यक्ष संवाद की शक्ति
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जब समुदायों को अक्सर मीडिया की सुर्खियों, संकीर्ण धारणाओं या दूर से गढ़े गए नैरेटिव के माध्यम से परखा जाता है, तब पहली बार का यह मानवीय अनुभव अत्यंत मूल्यवान बन जाता है. एक गैर-हिंदू और ईरानी नागरिक का सरसंघचालक जी के कार्यक्रम में शामिल होना, खुले दिल से स्वीकार किया जाना और परस्पर आदर का भाव लेकर लौटना यह सिद्ध करता है कि अपनी पहचान में दृढ़ रहने का अर्थ दूसरों से दूरी बनाना नहीं है.
सांस्कृतिक आत्मविश्वास और वैश्विक खुलापन एक साथ अस्तित्व में रह सकते हैं. वास्तविक संबंध तब बनते हैं जब हम अपने दरवाजे खोलते हैं, दूसरों की सुनते हैं और एक-दूसरे को मानवीय स्तर पर अनुभव करते हैं.
Courtesy – https://medium.com/@canadianhinduvolunteers/i-came-as-an-outsider-but-never-felt-like-one-288070dbaf4e











