अर्थ का अनर्थ
जलाई 1783 में एक युवा अंग्रेज ब्रिटेन से भारत के लिए जहाज पर सवार होता है। भारत में जा कर क्या करना है? इस पर ये अग्रेज समुद्री यात्रा के दौरान अपनी डायरी में कूल सोलह बिंदु तय कर लिखता है, जिसमे से एक बिंदु था “बाइबिल की व्याख्याओं को भारतीय साहित्य और परम्पराओं में ढूंढना”। डायरी में दर्ज ये बिंदु बाद में “Object of enquiry during my residence in India” नाम से एक रिपोर्ट में प्रकाशित होते है। ये अग्रेज कोई मामूली शख्स नहीं, बल्कि विलियम्स जोन्स नाम का एक नामचीन भाषाविद् और कानूनविद् था जिसे न केवल अग्रेजी बल्कि ग्रीक, लेटीन, और अरबी के अलावा फारसी में भी महारत हासिल थी। भारत में आकर उसने कलकत्ता के मुख्य न्यायधीश की कुर्सी संभाली। क्योकि भाषा विज्ञान में उसकी गहरी रूचि थी, अतः संस्कृत ने उसका ध्यान आकर्षित किया। उसने प्राच्य ग्रंथों के अध्ययन और उसके ईसाईकरण के उद्देश्य से 1784 में “एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल” की स्थापना की।
करीब तीन वर्षों तक संस्कृत साहित्य में गोते लगाते हुई विलियम्स जोन्स उस निष्कर्ष तक पहुंचे, जिससे सम्पूर्ण यूरोप में भूचाल आने वाला था और वह निष्कर्ष कुछ इस प्रकार का था – “संस्कृत, लेटीन, ग्रीक और जर्मन भाषा में आश्चर्यजनक रूप से समानता है, संभवतः उनकी जननी कोई एक ही रही हो”
1802 में एक ओर संस्कृत प्रेमी जर्मन युवा फ्रेडरिक श्लेगेल संस्कृत भाषा का अध्ययन करने पेरिस पहुंचा। भाषाविज्ञान सम्बन्धी विलियम जोन्स के निष्कर्षों का विस्तार करते हुए 1808 में फ्रेडरिक ने “On the language and wisdom of the Indian“ नाम से पर्चा प्रकाशित किया, जिसमें उसने संस्कृत, फारसी और अन्य यूरोपीय भाषाओं का गहराई से विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए यह तर्क दिया कि इन सभी भाषाओं में संस्कृत प्राचीनतम एवं उत्कृष्ट है। श्लेगेल के सिद्धांत का यूरोप पर, विशेषकर जर्मनी में गहरा प्रभाव पड़ा।
कहानी में अब आगे प्रवेश होता है उस पश्चिमी विद्वान का, जिसकी भारत के बौद्धिक जगत में सर्वाधिक चर्चा होती है, नाम है प्रोफेसर मैक्स मूलर। विलियम्स जोन्स एवं फ्रेडरिक श्लेगेल से प्रभावित मूलर को संस्कृत सीखने की बड़ी लालसा थी। भाषाविज्ञान में गहरी रूचि के चलते मैक्स मूलर 1846 में इंग्लैंड के ईस्ट इंडिया हाउस में रखी हुई कुछ दुर्लभ संस्कृत पांडुलिपियों को देखने गए थे। मूलर के जीवन का यह एक निर्णायक मोड़ था। पश्चिम जगत में भारतीय दर्शन एवं साहित्य के उभरते हुए विद्वान के रूप में स्थापित होने के पश्चात उन्होंने ईस्ट इण्डिया कंपनी की ऋग्वेद के अग्रेजी अनुवाद की महत्वकांक्षी परीयोजना को पूरा किया।
मैक्स मूलर की मृत्यु के पश्चात 1902 में “The Life and Letters of the Right Honorable Friedrich Max Müller” नाम से प्रकाशित उनकी जीवनी में, मूलर अपने मित्र बून्सन को लिखे एक पत्र में अपनी मूल मंशा ज़ाहिर करते हुए लिखते है “भारत में जो भी विचार जन्म लेता है ,शीघ्र ही पुरे एशिया में फ़ैल जाता है। मै चाहता हूँ कि भारतीय दकियानूसी पौराणिक साहित्य को बदलकर ईसायत की सीधी-साधी एवं आसन शिक्षाओं का द्वार खोल पाऊँ“।
1851 में उन्होंने फ्रान्ज़ बोप की तुलनात्मक व्याकरण के अंग्रेजी अनुवाद की समीक्षा करते हुए एक लेख लिखा जिसमे उन्होंने “the great Arian family” और “the Arian stock” जैसे शब्दों का प्रयोग किया। यहाँ पर Arian/Aryan से उसका तात्पर्य एक विशेष भाषा को बोलने वाले लोगों से था। मूलर ने तुलनात्मक भाषाविज्ञान के आधार पर निष्कर्ष दिया की संस्कृत, यूनानी, लैटिन, जर्मन तथा अन्य संबंधित भाषाएँ एक अविभाजित मूल भाषा के रूप में विद्यमान थी। जब मूलर संस्कृत भाषा को आर्यों से जोड़ रहे थे, उसी समय एक ओर भाषाविद फ़्रांस एलिस ने दक्षिणी भारत की भाषाओं को संस्कृत से पृथक मानने की वकालत की, जिसे बाद में “द्रविड़ भाषा समूह” के रूप में प्रचारित किया गया। इसी कड़ी में एक फ्रांसीसी राजनयिक, लेखक और राजनीतिक विचारक जोसेफ गोबिनाऊ ने 1853 में एक चार-खंडीय पुस्तक प्रकाशित की, जिसका शीर्षक था “An Essay on the Inequality of the Human Races”। उनका तर्क था कि विभिन्न नस्लों में बौद्धिक, नैतिक और शारीरिक क्षमताओं में जन्मजात अंतर होता है। उनकी दृष्टि में वाइट रेस सबसे श्रेष्ठ थी जिसका सम्बन्ध उन्होंने आर्यों के साथ जोड़ा। विज्ञान की दुनिया में मानव जाति में विभेद का वास्तविक बीजारोपण यही से आरम्भ हुआ था।
रही सही कसर चार्ल्स डार्विन की 1859 में प्रकाशित पुस्तक “On the Origin of Species” ने पूरी कर दी, जिसके एक करिश्माई वाक्य “Survival of the Fittest” को उपनिवेशवाद के दौर में एक हथियार की तरह प्रयोग में लाकर निष्कर्ष दिया गया कि “सभ्य जातियाँ, असभ्य जातियों को हटाकर आगे बढ़ेंगी, क्योकि यही प्रकृति का नियम है”। डार्विन के मूल सिद्धांत का जब अर्थ से अनर्थ हो रहा था, उसी समय डार्विन के ही चचेरे भाई फ्रांसिस गॉल्टन ने जले पर ओर नमक छिड़क दिया। उन्होंने एक नया शब्द दिया “Eugenics”, एक ऐसा विचार जो कहता था- “कमजोर, रोगग्रस्त या ‘हीन’ लोग समाज के लिए बोझ हैं, इन्हें प्रजनन से रोका जाए, या समाज से हटा दिया जाए”।
अर्थ का अनर्थ करते हुए कब भाषासूचक आर्यन शब्द परवर्ती व्याख्याओं में “Aryan race” में बदल गया, ठीक से बता पाना मुश्किल है, किन्तु जर्मन नस्लवादी और राष्ट्रवादी विचारकों ने “Aryan” को भाषायी अवधारणा से हटाकर एक जैविक और नस्लीय श्रेष्ठता की अवधारणा के रूप में ग्रहण किया, जिसकी अंतिम परिणीति लाखों यहूदियों के नरसंहार के रूप में हुई।
1944 से 47 तक भारतीय पुतात्विक सर्वेक्षण के निदेशक रहे मोर्टीमर व्हीलर ने मोहनजोदारों एवं हड़प्पा के अवशेषों का अध्ययन करते हुए आर्यकथा को एक नया मोड़ दे दिया। उन्होंने निष्कर्ष दिया की हड़प्पा सभ्यता के लोग गैर-आर्य और स्थानीय थे, आर्य बाहर से आए और उन्होंने स्थानीय सभ्यता को बर्बरतापूर्वक नष्ट कर दिया। व्हीलर की इस आधारहीन परिकल्पना के पश्चात कड़ी से कड़ी मिलाते हुए पश्चिमी विद्वानों ने आर्यआक्रमण सिद्धांत को गढ़ा। आर्य आक्रमण सिद्धांत के अनुसार लगभग 1500 ईसा पूर्व मध्य एशिया/यूरेशिया से आर्य भारत आए, उन्होंने यहाँ की पूर्ववर्ती आबादी से संघर्ष किया और धीरे-धीरे उत्तर भारत में वैदिक संस्कृति, संस्कृत भाषा, घोड़े-रथ तथा वैदिक धार्मिक परंपराओं का प्रसार किया। इस सिद्धांत में सिंधु सभ्यता के पतन के बाद आर्यों के आगमन की कल्पना की गई और ऋग्वेद में वर्णित आर्य–दस्यु संघर्ष को स्थानीय लोगों और आर्यों के संघर्ष से जोड़ा गया।
इस आलेख में हम आर्य आक्रमण सिद्धांत, जो वर्तमान में आर्य प्रवासन सिद्धांत में बदल चूका है, की अद्यतन आनुवांशिक एवं पुरातात्विक प्रमाणों के आलोक में चर्चा करेंगें, जिसने इस परिकल्पना को पूर्ण रूप से ध्वस्त कर दिया है।
आर्य और आनुवांशिकी
स्कुल में हम सभी ने आनुवांशिकी का अध्याय पढ़ा है। एक पुरुष को y गुणसूत्र केवल अपने पिता से प्राप्त होता है जबकि महिलाओं को अपना माँइटोकोंड्रीयल गुणसूत्र केवल अपनी माता से प्राप्त होता है। ये दोनों ही प्रकार के गुणसूत्र पीढ़ी दर पीढ़ी हुबहूँ बने रहते है, लेकिन लाखों वर्षों की विकास यात्रा में इनमे कुछ परिवर्तन भी हुआ है, जिसे विज्ञान की भाषा में उत्परिवर्तन कहा जाता है। गुणसूत्र या डीएनए में होने वाले इन्ही छोटे बदलावों को ट्रेक कर वैज्ञानिको ने मानव की वंशावली तैयार की है। किसी आबादी के भीतर लोगों का वह समूह है जो एक उभय पैतृक (Y गुणसूत्र के आधार पर) या मातृक पूर्वज (माँइटोकोंड्रियल गुणसूत्र के आधार पर) को साँझा करते है, उन्हें हेप्लोग्रुप कहा जाता है। आसान भाषा में इसे पूर्वजों की एक शाखा कहा जा सकता है। इन हेप्लोग्रुप्स को A, B, C.. कुछ तरह से अग्रेजी अल्फाबेट नाम दीए गए है।
इन्ही हेप्लोग्रुप में से एक है R1a1, जो स्केंडेनेविया, मध्य यूरोप, मध्य एशिया से लेकर साइबेरिया तक की पुरुष आबादी में पाया जाता है। क्योंकि इन भौगोलीक क्षेत्रो का सम्बन्ध इंडो युरोपियन भाषी जनसँख्या से है, अतः R1a1 हेप्लोग्रुप को आर्य नस्ल से जोड़कर इसे स्टेपी जीन (यूरेशियन घास के मैदानों को स्टेपी कहा जाता है ) अथवा “आर्यन जीन” के रूप में प्रचारित किया गया। भारतीय पुरुषों में भी यह हेप्लोग्रुप बहुतायत रूप से पाया जाता है, जिसके आधार पर पश्चिमी विद्वानों द्वारा भारतीयों की मध्य एशियाई वंशावली पर मुहर लगाने के साथ भारत में आर्यों के आगमन सिद्धांत को वैज्ञानिक मान्यता देने का प्रयास किया गया।
इस सन्दर्भ में पिछले दो दशक में हुए कुछ महत्वपूर्ण आनुवांशिक अध्ययनों से आर्यन जीन तथा भारत में इसके बाहरी उद्गम की अवधारण धुंधली होती जा रही है। 2006 में विज्ञान के एक प्रतिष्ठित जर्नल (The American Journal of Human Genetics, Sengupta et al.) के अनुसार भारतीय Y- गुणसूत्रों की विविधता बहुत ही व्यापक एवं प्राचीन है जिसमे यूरेशियाई चरवाहों के स्टेपी जीन का योगदान अपेक्षाकृत सीमित है। शोधकर्ताओं द्वारा भारत के विभिन्न भौगोलिक, जातीय और भाषाई समूहों का अध्ययन करने पर यह पाया गया कि Y- गुणसूत्र और R1a1 जीन की जटिलता एवं विवधता इस जीन के बाहरी होने के सिद्धांत को खारिज़ करने के साथ इसी भूभाग पर इस जीन की उत्पत्ति के संकेत देती है। इस अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह था कि भारतीय Y गुणसूत्र हेप्लोग्रुप में पायी जाने वाली आनुवांशिक विविधता बहुत ही प्राचीन है, जिसकी उत्पत्ति की अनुमानित आयु लगभग 10,000–15,000 वर्ष है।
इसी क्रम में 2019 में सेल नामक प्रतिष्ठित जर्नल में वसन्त शिंदे एवं उनकी टीम द्वारा राखीगढ़ी से प्राप्त एक महिला के कंकाल के डीएनए के विश्लेषण के आधार पर महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन हुआ। An Ancient Harappan Genome Lacks Ancestry from Steppe Pastoralists or Iranian Farmers” नामक शोधपत्र के अनुसार लगभग 4,500 वर्ष पुराने कंकाल के DNA में स्टेपी चरवाहों के वंशावली के जीन पुर्णतः अनुपस्थित पाए गए।
हाल ही में (2025) में American journal of Biological Anthropology में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार गुजरात में मातृक वंशावली के अध्ययन हेतु 168 माइटोकोंड्रियल जीनोम (डीएनए) का विश्लेषण करने पर पाया गया कि 76 प्रतिशत मातृक वंशावली दक्षिण एशिया विशिष्ट थी, जबकि बहुत ही कम मात्रा में उपस्थित यूरेशियन वंशावली, 5000 वर्ष से भी अधिक पुरानी थी। स्पष्ट है कि डीएनए विश्लेषण पर आधारित आधुनिक एवं प्रमाणिक शोध पत्र इस निष्कर्ष को ख़ारिज करते है कि भारतीय महाद्वीप में पाए जाने वाले R1a1 हेप्लोग्रुप का मूल स्त्रोत यूरेशियाई आबादी है।
घोड़ों का घालमेल
आर्य आक्रमण सिद्धांत के अनुसार आर्य यूरेशिया के मैदानों से घोड़ों पर सवार होकर भारत में आए और उन्होंने यहाँ के मूलनिवासियों को दक्षिण की तरफ खदेड़ दिया। इस थ्योरी के अनुसार भारत में 1500 BC से पहले घोड़े थे ही नहीं। इस सम्बन्ध में एक ओर तथ्य महत्वपूर्ण है कि भारतीय महाद्वीप में घोड़ों की उपस्थित का सबसे आधुनिक जीवाश्म अफगानिस्तान की स्वात घाटी से मिला है, जिसकी आयु 1600 ईसा पूर्व आंकी गई है। पश्चिमी विद्वान इस क्षेत्र के जीवाश्मों को करीब 1500 वर्षों पूर्व आर्यों के साथ घोड़ों के भारत में आगमन के पक्ष में सबसे प्रबल तर्क मानते है। पश्चिमी विद्वानों का कहना है कि सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में आर्यों से पूर्व आधुनिक घोड़ों के कही भी जीवाश्म नहीं मिले है। चलिए, अब इस तथ्य की पड़ताल की जाए।
भारत के पुराणों में घोड़े का अश्व के रूप में सन्दर्भ कई जगह मिलता है, जिसमे से अश्वमेघ यज्ञ की परंपरा से आम जनमानस भी भली भांति परिचित है, किन्तु पश्चिमी विद्वान पुराणों को मिथकीय मानकर भारत में आर्यों के आगमन से पूर्व घोड़े की उपस्थिति को सिरे से नकारते है, अतः इस धारणा के खंडन हेतु हमें जीवाश्म विज्ञान का आधार लेना होगा। भारत के शिवालिक हिल्स से घोड़ों के प्लिस्टोसीन काल (करीब 25 लाख वर्ष से 60 हज़ार वर्ष पूर्व का काल) के जीवाश्मीय अवशेष मिले है जिसे विज्ञान की भाषा में इक्वस शिवालेंसिस नाम दिया गया है। इस जीवाश्म की उपस्थित से प्रमाणित होता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में घोड़ों के वंश इक्वस का अस्तित्व था। पश्चिमी विद्वान इस प्रमाण को ये तर्क देकर ख़ारिज करते है कि ये जीवाश्म घोड़ों की आधुनिक प्रजाति से सम्बंधित नहीं है। उनका तर्क है कि संभवत ये घोड़ों की लाखों वर्ष पूर्व विलुप्त हो चुकी कोई प्रजाति रही होगी।
हमें इस शंका का समाधान मिला भीमबेटका की गुफाओं में बने शैलचित्रों से। भीमबेटका की गुफा संख्या सात में एक घुड़सवार का चित्र बना हुआ है। विद्वानों के अनुसार ये शैलचित्र करीब तीस हज़ार वर्ष पुराना है, जो लाखों वर्ष पूर्व घोड़ों की भारतीय उपमहाद्वीप से विलुप्ति के सिद्धांत को खुली चुनौती देता है।

1500 BC से पूर्व भारत में घोड़ों की उपस्थिति का सबसे पुख्ता प्रमाण मोहनजोदारो एवं हड़प्पा से मिले घोड़ों की हड्डियों एवं दाँतों के अवशेष है। इसका एक ओर रोचक प्रमाण इन्ही स्थलों से मिले मिट्टी से बने घोड़े के मोडल है, जिन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है।
सिन्धु और सरस्वती
वर्तमान हड़प्पाकालीन सभ्यताओं को सिन्धु घाटी सभ्यता के नाम से जाना जाता है, क्योकि इनका उद्गम क्षेत्र सिन्धु नदी घाटी से सम्बंधित है। आर्य आक्रमण सिद्धांत के अनुसार आर्यों ने हड़प्पाकालीन नगरीय सभ्यता को नष्ट कर वैदिक संस्कृति की नीव रखी। उपरोक्त सिद्धांत के आलोक में प्राचीन एवं लुप्त सरस्वती नदी की चर्चा करना समीचीन होगा जिसका उल्लेख वेदों सहित अन्य पुराणों में भी मिलता है।
प्रश्न यह है कि यदि 1500 ईसा पूर्व भारत में आकर बसने वाले आर्यों ने वेदों की रचना की तो वेदों में सरस्वती नदी का उल्लेख कैसे हो सकता है? पश्चिमी विद्वानों का मानना है की इस नदी के अस्तित्व के कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। इसे भी वे एक प्रकार का मिथक मानते है। पुराणों में सरस्वती नदी को वैदिक काल (लगभग 8000–5000 वर्ष पूर्व) की सबसे पवित्र नदियों में से एक माना गया है। इसके तटों के साथ हड़प्पा सभ्यता के अनेक स्थलों की खोज, प्राचीन काल में इस नदी के महत्व को सभ्यताओं की जननी के रूप में उजागर करती है।
प्राचीन सरस्वती का अस्तित्व आज भी घग्घर के रूप में बना हुआ है। घग्घर हरियाणा और राजस्थान में बहने वाली एक मौसमी नदी है, जिसे पाकिस्तान में हकरा के नाम से पहचाना जाता है। इस सूखे हुए नदी-मार्ग के दोनों ओर बड़ी संख्या में हड़प्पाकालीन पुरास्थल मिलने से पुरातत्वविदों का ध्यान इस क्षेत्र की ओर गया। 2021 के एक पुरातात्विक अध्ययन ने भी घग्घर घाटी में बड़ी संख्या में हड़प्पा स्थलों की उपस्थिति को इस नदी-तंत्र से जोड़कर इसके प्राचीन अस्तित्व की पुष्टि की।
वैज्ञानिको के अनुसार जलवायु तथा विवर्तनिक (tectonic) परिवर्तनों के कारण लगभग 5000 वर्ष पूर्व सरस्वती नदी का प्रवाह समाप्त हो गया और यह नदी लुप्त हो गई। यह भी एक मत है कि सरस्वती नदी आज भी थार मरुस्थल के नीचे भूमिगत रूप से प्रवाहित हो रही है तथा हिमालय के साथ इसकी प्राचीन जल-सम्बद्धता किसी सीमा तक बनी हुई है। हवाई सर्वेक्षणों पर आधारित इन निष्कर्षों को विज्ञान जगत में अपर्याप्त माना गया, लेकिन 2019 में हुए एक अध्ययन से वैदिक सरस्वती नदी की उपस्थिति एवं इसके हिमालयी उद्गम के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण साक्ष्य मिले।

चटर्जी एवं सहयोगियों द्वारा 2019 में Scientific Reports नामक जर्नल में “On the existence of a perennial river in the Harappan heartland” नाम से शोधपत्र प्रकाशित किया। वैज्ञानिकों ने घग्घर क्षेत्र के लगभग 300 किमी. के पुराचैनलों से प्राप्त बालू, चिकनी मिट्टी और अन्य नदीय अवसादों के नमूने लेकर रेडियो समस्थानिक तकनीकियों के आधार पर उनका अध्ययन किया। परिणामों से संकेत मिला कि लगभग 9,000 से 4,500 वर्ष पूर्व इस नदी में स्थायी जलप्रवाह था। इस नदी तंत्र के अवसादों से हिमालयी उद्गम के पदार्थ भी मिले जो कि इसके मूल स्त्रोत का एक पुख्ता प्रमाण है।
रथ का रण
आर्य प्रवासन सिद्धांत के अनुसार भारत में रथ जैसी कोई भी रचना अस्तित्व में नहीं थी, जबकि महाभारत के सम्पूर्ण समर में रथधारी योद्धाओं का वर्णन मिलता है। क्योकि पश्चिमी विद्वान महाभारत को प्रमाणिक नहीं मानते, अतः पौराणिक सन्दर्भों की बजाय पुरातात्विक प्रमाण देना उचित होगा। सन 2018 में उत्तर प्रदेश के सिनौली गाँव में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के एक दल के नेतृत्व में हुए उत्खनन के दौरान चार हज़ार वर्ष पुरानी कब्र से लकड़ी से बना एक रथ मिला, जिसके पहियों पर तांबे की परत चढ़ी हुई है । इस खोज की चर्चा पश्चिम जगत में भी खूब हुई, जिनका मानना था कि आर्यों के आगमन से पूर्व (1500 BC) भारत में रथ थे ही नहीं ।

इसी स्थान पर रथ के अलावा तीन ताबूत भी मिले है जिनमे शवों को विशेष प्रकार के कपडे में लपेटा गया है। ताबें की तलवारे, खुदाली, ढालें एवं हेलमेट के अलावा यहाँ से मिटटी के बर्तन एवं कांच के टुकड़े भी प्राप्त हुए है । इन सारी वस्तुओं के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ की सभ्यता हड़प्पा से पृथक कोई विकसित सभ्यता रही होगी जो धातुकर्म एवं युद्ध कला में निपुण रही होगी।
सबुत कहा ?
यदि आर्यों ने भारत पर आक्रमण कर स्थानीय सभ्यता को नष्ट कर अपनी सभ्यता बसाई तो इसका कोई प्रमाण तो होना चाहिए। इतिहास की किसी भी प्राचीन पुस्तक में किसी ऐसे आक्रमण अथवा युद्ध का उल्लेख नहीं मिलता। युद्ध हुआ होता तो ज़ाहिर है भारी मात्रा में नरसंहार भी हुआ होगा, किन्तु किसी भी पुरातात्विक उत्खनन में मिले कंकालों के अध्ययन से ऐसा कोई भी साक्ष्य नहीं मिला।
बिना सबूतों के जब आर्य आक्रमण सिद्धांत कमजोर हुआ तो पश्चिमी विद्वानों ने आर्य आक्रमण सिद्धांत को आर्य प्रवासन सिद्धांत में बदल दिया, लेकिन इस तर्क के पक्ष में भी कोई साक्ष्य नहीं मिले। यदि किसी एक सभ्यता का दूसरी सभ्यता द्वारा प्रतिस्थापन होता है तो निसंदेह तत्कालीन समय में हुए सांस्कृतिक बदलाव के कही न कही प्रमाण अवश्य मिलते। कुछ पश्चिमी इतिहासकार और वामपंथी विद्वान अब “आर्यों के क्रमिक प्रवास” की नयी गाथा गढ़ रहे है। ज़ाहिर है अब अग्रेजों की आर्यकथा पूर्ण रूप से अपना दम तोड़ चुकी है। आर्य आक्रमण से प्रवास, प्रवास से क्रमिक प्रवास, हो सकता है भविष्य में कोई नयी थ्योरी बना ली जाए, लेकिन इतना तो तय है पश्चिम जगत का ये एजेंडा अब अपनी अंतिम श्वास ले रहा है।

















