कभी-कभी कोई फिल्म एक अविस्मरणीय घटना बन जाती है, जो मनोरंजन से आगे निकल कर समाज के भीतर छिपी गहरी संवेदना को स्पर्श करती है। हनुमान अंश एक ऐसी फिल्म है जिसमें व्यक्ति टिकट खरीद कर केवल फिल्म देखने नहीं जा रहा है, वह आस्था, स्मृति और अपने भीतर के भारत से मिलने जा रहा है।
हनुमान अंश बॉक्स ऑफिस पर चमत्कार कर रही है। इसने पहले हफ्ते ₹1.08 करोड़ , दूसरे हफ्ते ₹40 लाख, तीसरे हफ्ते ₹10.40 करोड़ , चौथे हफ्ते ₹61.00 करोड़, 29वां दिन (शुक्रवार) को ₹10.00 करोड़ और 30वां दिन (शनिवार) को ₹16.25 करोड़ कमाई की है। शुक्रवार की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक यह फिल्म भारत में बॉक्स ऑफिस पर 163 करोड़ रुपये (नेट कलेक्शन) की कमाई कर चुकी है।इसके ग्रॉस कलेक्शन की बात करें तो यह आंकड़ा 192 करोड़ पहुंच जाता है।
यह वापसी केवल बॉक्स ऑफिस की नहीं, विश्वास की है
हनुमान अंश, नीम करोली बाबा के जीवन, उनकी सेवा, प्रेम, करुणा तथा अध्यात्मिक दृष्टि से प्रेरित है। बाबा जी के प्रति आस्था वैश्विक है। यही कारण है कि इस फिल्म की सफलता को व्यापार की भाषा में समझना अधूरा होगा। आज लोग यह कहते है कि नई पीढ़ी आध्यात्मिक परंपराओं से दूर जा रही है, लेकिन थिएटर से निकलते युवाओं के हृदय में सीताराम और सोशल मीडिया पर फिल्म को लेकर उमड़ती प्रतिक्रियाएं इस धारणा पर प्रश्नचिन्ह लगाती है।
नीम करोली बाबा एक सांस्कृतिक सेतु
नीम करोली बाबा जाति, वर्ग, भाषा, देश सामाजिक स्थिति आदि उनकी करुणा के सामने छोटी हो जाती है। प्रेम, सेवा और मानवता की शिक्षाओं का यही सरल संसार है। बाबा सभी संप्रदाय, वर्ग, क्षेत्र के संत के रूप में हैं। उनकी कथा में वह भारत दिखाई देता है, जिसमे कोई भूखा है तो पहले उसे भोजन मिलता है, कोई दुखी तो पहले उसे सहारा मिलता है, कोई भटका हो तो उसे पहले राह मिलती है। यही भारत के आध्यात्मिक शक्ति है जोड़ती है, तोड़ती नहीं।
भारत की सॉफ्ट पावर की दृष्टि
आज दुनिया योग को जानती है, ध्यान को जानती है, आयुर्वेद को जानती है ,गीता को जानती है, बुद्ध को जानती है, राम-कृष्ण की कथाओं को जानती है और आज भारतीय संत परंपराएं भी वैश्विक संवाद का हिस्सा बन रही हैं। कैंची धाम की लोकप्रियता भारत से बाहर भी है, इसमें स्टीव जॉब्स, मार्क जुकरबर्ग और जूलिया रॉबर्ट्स जैसी अंतरराष्ट्रीय हस्तिया भी हैं। आवश्यकता है, ऐसी भारतीय आध्यात्मिक कथाओं को विश्व की भाषाओ में, विश्व के दर्शकों तक पहुंचाया जाए।
पर्दे के पीछे की कहानी भी कम अद्भुत नहीं
युवा निर्माता अनुप्रिया नागर, 21 वर्ष के अनुप्रिया नागर ने अर्थशास्त्र की पढ़ाई बाथ विश्वविद्यालय से की और नीम करोली बाबा की कहानी से जुड़ी वैश्विक आध्यात्मिक जिज्ञासा ने उसे इस दिशा में खींचा और उसने एक ऐसी फिल्म बनाने का निर्णय लिया। विशाल चतुर्वेदी इस फिल्म के लेखक, निर्देशक और निर्माता है उन्होंने डेढ़ वर्ष तक इसका अध्ययन किया और उन्होंने इसे एक आध्यात्मिक अनुभव के रूप में दर्शको के सामने उतारा। फिल्म मे न बड़े सितारे, न भारी भरकम प्रचार अभियान और न ही शुरुआत में फिल्म जगत का कोई बड़ा समर्थन। नीम करोली बाबा की भूमिका निभाने वाले शोभिनव सत्या की कहानी रोचक है, वह एक सहायक निर्देशक के रूप में फिल्म से जुड़े थे , लेकिन पहले दिन मूल अभिनेता के अस्वस्थ हो जाने के बाद उन्हें इसकी भूमिका मिली। फिल्म की कास्ट में शोभिनव सत्या के साथ चंदन आनंद, अनिल रस्तोगी, पूर्णिमा तिवारी, गुलशन पांडे, बाल कलाकार बिहान शेडगे सहित कई कलाकार है। इस पूरी यात्रा का महत्वपूर्ण अध्याय प्रेमानंद महाराज से जुड़ा है, फिल्म की निर्माता अनुप्रिया नगर ने फिल्म के निर्माण के संचालन से मार्गदर्शन लिया। महाराज जी ने कहा कि लोकप्रियता या मनोरंजन बढ़ाने के लिए संत के जीवन में कोई भी झूठी या मनगढ़ंत बातें नहीं जोड़ी जानी चाहिए। महाराज जी ने यह भी कहा कि ऐसे महान संतों का किरदार निभाने वाले कलाकारों और फिल्म से जुड़े लोगों को सात्विक, अनुशासनप्रिय और पूरी ईमानदारी का पालन करना चाहिए। इस फिल्म का सबसे बड़ा संदेश यह है कि जब निर्माण में श्रद्धा जुड़ जाए तो सिनेमा केवल पर्दे पर दिखाई देने वाली कहानी नहीं रहता, वह दर्शको के भीतर उतरने वाली अनुभूति बन सकता है।
भारतीय सिनेमा की नई राह
लंबे समय में धारणा रही है कि दर्शको को आकर्षित करने के लिए हिंसा, अश्लीलता, भव्यता और सनसनी आवश्यक है। हनुमान अंश ने इस धारणा को चुनौती दी है, उसने साबित कर किया कि दर्शक के भीतर संवेदना अभी जीवित है, उसे प्रेम, त्याग संघर्ष और अपने देश की कहानी चाहिए। उसे अपने आध्यात्मिक जड़ों से जुड़ने वाली कहानी चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण उसे एक ऐसी कथा चाहिए जिसे देखने के बाद वह बेहतर मनुष्य बनकर बाहर निकले। यही सिनेमा की बड़ी सफलता है।
क्या बड़े बजट से बड़ा होता है बड़ा विश्वास ?
इस फिल्म की यात्रा का सबसे अद्भुत पक्ष यह है कि दो करोड़ के आसपास के बजट बनी इस फिल्म को दर्शकों की प्रतिक्रिया ने असाधारण ऊंचाई पर पहुंचा दिया। इसका संदेश फिल्म उद्योग के लिए स्पष्ट है कि दर्शकों को महंगी फिल्म नहीं चाहिए, उसे सच्ची और भारतीयता के रंग में रंगी कहानी चाहिए, जो पारिवारिक सामाजिक सबंधो को मजबूत करे।
हनुमान अंश फिल्म के बाद की राह
हनुमान अंश की सफलता के बाद अब भारत के लिए आध्यात्मिक सिनेमा यूनिवर्स विकसित करने की आवश्यकता है, जिसमे भारत के संतों, ऋषियों, योगियों , भक्तों और लोकनायक के जीवन कथाएं आधुनिक सिनेमाई भाषा में आ सकें। कबीर हों या तुलसी या मीरा या गुरु नानक देव जी या रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद या भारत की असंख्य लोक परंपरा हो। धार्मिक-आध्यात्मिक भावना के साथ-साथ अनुसंधान, उत्कृष्ट पटकथा उच्चस्तरीय फोटोग्राफी, उच्च गुणवत्ता के संगीत, मानवीय कथा-वाचन के साथ होना चाहिए, जिससे भारतीय अध्यात्म विश्व संवाद के रूप में उभर कर सामने आए।
फूहड़ता से परे है नया दर्शक
इस फिल्म ने यह परिवर्तन किया है, कि दर्शक केवल मनोरंजन का उपभोक्ता नहीं है। वह एक सभ्यता का उत्तराधिकारी है। उसके भीतर राम ,कृष्णा , शिव, बुद्ध ,कबीर , मीरा और उसके भीतर हनुमान जी महाराज है। वह आधुनिक भी है लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ा है। वह स्मार्टफोन पर दुनिया देखा है, लेकिन मंदिर की घंटी सुनकर ठहर जाता है। वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता की युग में भी, एक संत की पंक्ति उसके भीतर तक छू जाती है।
हनुमान अंश- एक सन्देश
हनुमान अंश की सफलता एक सन्देश है कि भारतीय समाज में आध्यात्मिकता, प्रेम और समर्पण समाप्त नहीं हुई है। नई पीढ़ी, अपनी जड़ों को नए माध्यमों में खोज रही है और भारतीय संस्कृति की कहानी में वैश्विक दर्शको तक पहुंचाने की क्षमता है। नीम करोली बाबा की परंपरा का सार प्रेम, सेवा और मानवता है। इस फिल्म की बड़ी उपलब्धि यह होगी कि जब दर्शक थिएटर से बाहर निकले तो किसी भूखे को भोजन करा दे, किसी दुखी का हाथ थाम ले, किसी अपरिचित से प्रेम की बात कर ले। हनुमान अंश फिल्म शायद यही कह रही है, समाज बदल रही है, हृदय बदल रही है। यह भारतीय आध्यात्मिक चेतना की सिनेमाई वापसी है। इस फिल्म ने एक सुंदर दृश्य रचा है बुजुर्ग और युवा एक साथ खड़े हैं, दोनों के भीतर एक ही तार बज रही है, वह तार है भारतीयता की ,भक्ति की, अध्यात्म की।















