यूरोप में मुसलमानों को लेकर 'द इकोनॉमिस्ट' के लेख पर हंगामा क्यों है?
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यूरोप में मुसलमानों को लेकर ‘द इकोनॉमिस्ट’ के लेख पर हंगामा क्यों है?

'द इकॉनामिस्ट' में हाल ही में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि यूरोप में इस्लामिक कट्टरपंथ नहीं है।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Sep 11, 2026, 07:08 pm IST
inविश्व
फ्रांस में सड़क पर नमाज पढ़ते मुस्लिम समाज के लोग।

फ्रांस में सड़क पर नमाज पढ़ते मुस्लिम समाज के लोग।

यूरोप के कई देश इन दिनों इस्लामिक कट्टरपंथ का सामना कर रहे हैं। आए दिन वहां जो घटनाएं हो रही हैं, उसके चलते लोगों में गुस्सा है। उनका कहना है कि वे किसी भी मजहब के खिलाफ नहीं हैं, मगर उन्हें अपनी सुरक्षा और अपनी संस्कृति से प्यार है। वे अपनी संस्कृति पर जबरन कब्जे के खिलाफ हैं। अपनी बेटियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं।

‘द इकॉनामिस्ट’ में हाल ही में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि यूरोप में इस्लामिक कट्टरपंथ नहीं है। इसमें लिखा है मुसलमानों के डर के कारण ही जहां जर्मनी की दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी को एक प्रांत में जीत हासिल हुई है, तो वहीं फ्रांस की मरीन ले पेन भी यह घोषणा कर चुकी हैं कि वह सार्वजनिक स्थानों से बुर्के और नकाब पर प्रतिबंध लगाएंगी और इस घोषणा पर लगभग 60% जनता ने अपनी मोहर लगाई है। ब्रिटेन में भी नाव से आने वाले शरणार्थियों को रोका जा रहा है, उन्हें वापस भेजा जा रहा है और इसके अनुसार सैकड़ों “बालाक्लावा (चेहरा ढकने वाली टोपी/नकाब) पहने गुंडों ने डोवर पर कब्जा कर लिया। ‘नावों को रोको’ और ‘क्राइस्ट ही राजा है’ के नारे लगाए। इसके अनुसार यह सब संबंधों को खराब कर रहा है। यह अखबार यह भी कहता है कि यूरोप के सामने कोई भी इस्लामिक टेकओवर का डर नहीं है। न ही भारी संख्या में मुसलमान युवकों को कट्टरपंथी बनाया जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार कोई भी ‘नो-गो जोन्स नहीं हैं और शरिया किसी भी तरह से देश के कानून के रास्ते में नहीं है और कभी भी डेमोग्राफिक परिवर्तन नहीं है।

इसने दक्षिणपंथ की कल्पना को सबसे बड़ा खतरा बताते हुए लिखा कि यह डर लोगों के दिमाग में इन्हीं लोगों ने भर दिया है कि एक दिन उन पर मुसलमानों का कब्जा हो जाएगा। इसका यह भी कहना है कि वामपंथ ने हल्की ही सही, मगर इस्लामिज़्म की असली धमकी को अनदेखा करके इसे और खराब कर दिया है। रिपोर्ट में कुछ मजेदार और विरोधाभासी बातें हैं। दक्षिण अफ्रीका में एक समलैंगिक इमाम की हत्या के विषय में लोगों से पूछा गया, तो इसी में लिखा है कि 52% मुसलमानों ने कहा कि समलैंगिकता गलत है और 41% मुसलमान युवा यह मानते हैं कि अगर किसी ने उनके पैगंबर की बेअदबी की है, तो हिंसा ठीक है, और यह प्रतिशत उनसे पहले की पीढ़ी में मात्र 25% था। पुराने विचार रखने का मतलब धमकी नहीं होता । यह रोचक बात कही है कि अगर किसी के कन्जर्वेटिव विचार हैं, तो उसे खतरे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

इस्लाम नहीं, इस्लामिज़्म खतरा है

यह और भी रोचक बात कही है कि इस्लाम यूरोप के लिए खतरा नहीं है, बल्कि इस्लामिज़्म (Islamism या राजनीतिक इस्लाम) है जो पूरी तरह से एक राजनीतिक विचारधारा है। इसमें लिखा है कि 9/11 के जिहादियों जैसे आम लोग नहीं हैं। अधिकतर इस्लामिस्ट हिंसा की बात नहीं करते हैं, मगर कई “entryism” की बात करते हैं। entryism का अर्थ यह होता है कि वे लोग अपना गैरप्रगतिवादी एजेंडा चलाने के लिए लोकतान्त्रिक संस्थानों में घुसपैठ करते हैं। हेट-स्पीच के कानूनों को हटाने के लिए लॉबी कर सकते हैं। सबसे बड़ा खतरा यह है कि ऐसे लोग किसी स्कूल, मस्जिद या काउंसिल या फिर चैरिटी पर कब्जा करके उसे अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। इसमें कहा गया है कि कट्टरपंथी मुसलमान ताकतों का असली शिकार वे मुसलमान होते हैं, जो इनके एजेंडे के हिसाब से चलते नहीं हैं। द इकोनॉमिस्ट ने इस्लामिस्टों की बुराई की है कि वे एंटी सेमेटिक (यहूदी विरोधी) होते हैं और साथ ही वे राजनेताओं, कॉमेडियन, शिक्षाविदों और पत्रकारों को धमकाते हैं। स्कूल, छात्र यूनियनों और चैरिटी सहित काउन्सिल्स पर भी दबाव डालते हैं।

सोशल मीडिया पर लोग कर रहे सवाल

इस रिपोर्ट के आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग प्रश्न कर रहे हैं कि अगर यह सब हो रहा है कि स्कूल, चैरिटी, काउन्सिल पर इस्लामिस्ट दबाव डाल रहे हैं, तो भी यह कैसे लिखा जा रहा है कि यूरोप में मुसलमान कट्टर नहीं हो रहे हैं? लोग पूछ रहे हैं कि आखिर सच्चाई से परे यह रिपोर्ट क्यों बनाई गई? जब आधे मुसलमान यह कह रहे हैं कि समलैंगिकता गैर कानूनी होनी चाहिए, तो फिर भी इसमें यह क्यों कहा जा रहा है कि यूरोप में मुसलमान कट्टर नहीं हो रहे हैं? एक यूजर ने लिखा कि बिना कट्टर हुए इस सीमा तक मुसलमान यूरोप में अपराध कर सकते हैं, ग्रूमिंग गैंग बनाकर लड़कियों के साथ अपराध कर सकते हैं, और उसके बाद खुले भी घूम सकते हैं, तो फिर अगर कट्टर होंगे तो क्या होगा? लोग कह रहे हैं कि आखिर ईकानमिस्ट ने ऐसा क्यों किया?

Yes! No danger whatsoever. Only bigots and Islamophobes would believe their lying eyes. Imagine @TheEconomist coming out with such a story in light of all of the realities that have transpired in Europe over the past few decades. It is truly criminal. The murder of truth… https://t.co/78TyNaMJmX

— Gad Saad (@GadSaad) September 10, 2026

लोगों का कहना है कि लिबरल मीडिया आखिर खतरे को देख क्यों नहीं रहा है? द इकोनॉमिस्ट यह लिख रहा है कि स्थानीय चुनौतियां एक खतरे में बदल जाती हैं, जिसके चलते इस्लामिस्ट्स ये दावा करते हैं कि उनके राजनीतिक प्रोजेक्ट की कोई भी आलोचना इस्लाम पर हमला है। लेफ्ट के लोग माइग्रेशन, अपराध या इस्लामिज़्म के विषय में प्रश्नों को नस्लवादी कहते हैं। इसका कहना है कि इस्लामिस्ट दरअसल इस्लाम को नुकसान पहुंचा रहे हैं, तो सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि अगर ऐसा है तो विरोध के स्वर मुसलमानों के बीच से क्यों नहीं आ रहे हैं?

 

 

Topics: Islamism vs IslamLeft Wing MediaEuropean Politicsमरीन ले पेनएएफडी पार्टीIslamic extremism in Europeडेमोग्राफिक चेंजराजनीतिक इस्लामThe Economist Report
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