पश्चिम बंगाल में देश विरोधी गतिविधियों के खिलाफ कड़ी और निर्णायक कार्रवाई का आग़ाज़ हो चुका हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने जादवपुर विश्वविद्यालय में लगाए गए देशविरोधी नारों ‘कश्मीर मांगे आजादी’, ‘लाल सलाम’ सहित अन्य नारों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इसके अलावा मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने गेरुआ रंग के खिलाफ किसी भी तरह के अपमान को बर्दाश्त नहीं करने का भी संकल्प लिया है।
मुख्यमंत्री ने 9 सितम्बर को दक्षिण कोलकाता के गोलपार्क से जादवपुर विश्वविद्यालय समीप 8वीं बस स्टैंड तक लगभग तीन किलोमीटर लंबी ‘गेरुआ सम्मान यात्रा’ निकाला, जिसमें बड़ी संख्या में नागा साधु, संत शामिल होकर ‘जय श्रीराम’ के नारों, शंखध्वनि और उलूध्वनि से पूरा क्षेत्र गुंजायमान हो गया।
भगवा रंग का अपमान बर्दाश्त नहीं
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह भगवा रंग का अपमान किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि भगवा संस्कृति और देश का अपमान करने वालों को सबक सिखाया जाएगा। उन्होंने जादवपुर विश्वविद्यालय परिसर में हाल ही में लगे कथित ‘कश्मीर मांगे आजादी’ और वामपंथी समूहों द्वारा दिए गए ‘रेड सैल्यूट (लाल सलाम)’ जैसे नारों पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने संकल्प लिया कि ऐसी देश विरोधी ताकतों को बंगाल से जड़ से उखाड़ फेंका जाएगा।
मुख्यमंत्री ने जादवपुर विश्वविद्यालय और बंगाल की ऐतिहासिक विरासत का उल्लेख करते हुए इसे श्री अरविंद की कर्मभूमि और उत्कृष्टता का केंद्र बताया, जहाँ ऐसी अवांछित गतिविधियों की कोई जगह नहीं है। उन्होंने घोषणा की कि वे आने वाले दिनों में फिर से जादवपुर आएंगे और वहां श्रीमद्भगवद्गीता तथा हनुमान चालीसा का पाठ आयोजित करेंगे। इसके साथ ही विश्वविद्यालय में तीन दिवसीय वैदिक पाठ कार्यक्रम आयोजित करने की भी योजना है।
पिछले माह भी हुई थी एबीवीपी के साथ हिंसक झड़प
पिछले महीने जादवपुर विश्वविद्यालय परिसर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और वामपंथी छात्र संगठन) के बीच हिंसक झड़प और नारेबाजी हुई थी। जादवपुर विश्वविद्यालय की दीवारों पर ‘फ्री फलस्तीन’, ‘आजाद कश्मीर’ और अन्य राजनीतिक मुद्दों से जुड़े नारे व पेंटिंग (ग्राफीटी) बनाए गए थे, जिस पर राजनीतिक हलकों और सत्ता पक्ष ने कड़ा विरोध जताया। मुख्यमंत्री की चेतावनी के बाद कोलकाता नगर निगम और विश्वविद्यालय प्रशासन ने पुलिस बल की मौजूदगी में विवादित ग्राफीटी को दीवारों से मिटाया था।
वामपंथी छात्र संगठनों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए ‘रीक्लेम द वॉल’ अभियान के तहत दोबारा दीवारों पर अपने नारे और चित्र पेंट करना शुरू कर दिया, जिससे वहां वैचारिक और राजनीतिक तनाव था।

















