यह सुभाषित संस्कृत भाषा के देशभक्ति एवं राष्ट्र-चिंतन से संबंधित आधुनिक सुभाषित साहित्य (राष्ट्रीय विचार-धारा एवं संस्कृत भारती के सुभाषित संग्रहों) से उद्धृत है।
श्लोक :
अप्यल्पशक्तेरल्पर्द्धस्तथाऽपविषयस्य च।
सुसंहतस्य राष्ट्रस्य नियता विश्वमान्यता ॥
भावार्थ-
अल्प शक्ति वाले, अल्प समृद्धि वाले तथा अल्प साधनों वाले सुसंगठित राष्ट्र को विश्व में मान्यता निश्चित मिलती है।
आज के युग में प्रासंगिकता-
आकार या संसाधन नहीं, ‘एकजुटता’ ही असली ताकत है: वैश्विक मंच पर केवल क्षेत्रफल या जनसंख्या किसी देश को महान नहीं बनाती। इज़राइल (Israel) या सिंगापुर (Singapore) जैसे देश इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं—आकार और जनसंख्या में छोटे होने के बावजूद अपनी आंतरिक एकजुटता, राष्ट्रीय अनुशासन और दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण दुनिया में अपना लोहा मनवाते हैं।
राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता: किसी भी देश के भीतर यदि आंतरिक फूट, गृहकलह या विविधता के नाम पर बिखराव होगा, तो विपुल संसाधनों के बावजूद वह राष्ट्र कमजोर रहेगा। इसके विपरीत, एकजुट समाज (Social Cohesion) कठिन से कठिन संकटों का मुकाबला कर लेता है।
उभरती अर्थव्यवस्थाओं और छोटे राष्ट्रों के लिए मार्गदर्शक: यह श्लोक यह संदेश देता है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में सफलता संसाधनों के ढेर से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र, नीतिगत स्पष्टता और नागरिकों की राष्ट्र-प्रथम भावना से मिलती है।

















