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संघ का शताब्दी वर्ष और विश्व के लिए भारत का संदेश

पूजनीय डॉ. मोहन भागवत जी का वैश्विक संवाद और भारत की सभ्यतागत चेतना

Written byप्रोफेसर गीता सिंहप्रोफेसर गीता सिंह
Sep 5, 2026, 09:30 pm IST
inसंघ @100
श्री मोहन भागवत, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

श्री मोहन भागवत, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

कुछ यात्राएं केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने का नाम नहीं होतीं। वे अपने समय से संवाद करती हैं और इतिहास, वर्तमान तथा भविष्य के बीच एक वैचारिक सेतु बन जाती हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में पूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का अमेरिका, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम के समाजों के साथ संवाद इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है। इसे किसी संगठन के प्रमुख की सामान्य विदेश यात्रा मानना अधूरी व्याख्या होगी, और इसे केवल प्रवासी भारतीयों से मिलने का अवसर कहना भी। इसे उस सभ्यतागत आत्मपरिचय के प्रयास के रूप में पढ़ा जा सकता है जिसमें भारतीय परंपरा संघर्ष के स्थान पर सह-अस्तित्व और वर्चस्व के स्थान पर सहयोग को अपना केंद्रीय स्वर मानती आई है।

आज विश्व जिन प्रश्नों से जूझ रहा है, उनके उत्तर केवल आर्थिक आंकड़ों में नहीं मिलते। तकनीक ने दूरियां घटाई हैं, पर उसी अनुपात में विश्वास भी घटा है। संचार के साधन बढ़े हैं और संवाद की क्षमता क्षीण हुई है। राष्ट्र आर्थिक रूप से एक-दूसरे पर निर्भर हैं, फिर भी राजनीतिक अविश्वास गहराता जा रहा है। विज्ञान ने मनुष्य को अभूतपूर्व सामर्थ्य दिया, किंतु उस सामर्थ्य के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए आवश्यक नैतिक चेतना उसी गति से विकसित नहीं हो सकी। यही हमारे समय का सबसे बड़ा विरोधाभास है। अंतरिक्ष तक पहुँच चुका मनुष्य आज भी पृथ्वी पर शांति का रास्ता खोज रहा है। उसने कृत्रिम बुद्धिमत्ता रच ली है, पर अपनी संवेदना को सुरक्षित रखने की चुनौती ज्यों की त्यों खड़ी है। ऐसे समय में वसुधैव कुटुम्बकम् केवल एक सांस्कृतिक उद्घोष नहीं रह जाता। वह वैश्विक भविष्य के लिए एक गंभीर प्रस्ताव बन जाता है।

वसुधैव कुटुम्बकम् : एक नारा नहीं, एक विश्वदृष्टि

इस सूत्र का अर्थ पूरी दुनिया को एक जैसा बना देना नहीं है। भारत कभी एकरूपता का पक्षधर नहीं रहा। इसी देश में कुछ सौ किलोमीटर की दूरी पर भाषा बदल जाती है, भोजन बदल जाता है, वेशभूषा और पूजा-पद्धति बदल जाती है। दर्शन की परंपराओं में गहरे मतभेद हैं और उन मतभेदों को कभी छिपाया नहीं गया। फिर भी भारत ने इस विविधता के भीतर एक सांस्कृतिक संबंध खोजा।

एक परिवार में भी सभी सदस्य एक जैसे नहीं होते। उनकी प्रकृति, क्षमताएं और भूमिकाएं भिन्न होती हैं, पर संबंध उन्हें जोड़े रखता है। एकता का अर्थ एकरूपता नहीं, संबंध की स्वीकृति है। राष्ट्र अपनी पहचान बनाए रखें, समाज अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता सुरक्षित रखें, सभ्यताएँ अपने-अपने अनुभव के साथ आगे बढ़ें, पर मानवता को एक-दूसरे के विरुद्ध स्थायी संघर्ष की भूमि न बनने दिया जाए। विश्व को आज अपनी पहचान छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता इतनी है कि पहचान घृणा का आधार न बने।

शांति की भारतीय भाषा

विश्व के अनेक हिस्सों में चल रहे युद्ध और संघर्ष मानव सभ्यता के भविष्य पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। सैन्य क्षमता बढ़ रही है, तकनीक युद्ध का स्वरूप बदल रही है और वैश्विक राजनीति में शक्ति-संतुलन के नए समीकरण बन रहे हैं। पर इतिहास का अनुभव स्पष्ट है। युद्ध विजय दे सकता है, स्थायी शांति नहीं। भारतीय परंपरा शांति की बात करती है, दुर्बलता की नहीं। यहां बुद्ध की करुणा है तो गीता का धर्मबोध भी, अहिंसा का आदर्श है तो अन्याय के प्रतिरोध का साहस भी। इसलिए भारत की शांति निष्क्रियता का दूसरा नाम नहीं है। वह कहती है कि शक्ति आवश्यक है, पर शक्ति के साथ संयम भी उतना ही आवश्यक है। सुरक्षा आवश्यक है, पर उसका उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं होना चाहिए। राष्ट्रहित आवश्यक है, पर मानवता से कटा हुआ राष्ट्रवाद अंततः स्वयं राष्ट्रों के लिए संकट बन जाता है।

शताब्दी का अर्थ : व्यक्ति से मानवता तक

संघ का सौवां वर्ष किसी संस्था की दीर्घायु का उत्सव भर नहीं है। यह एक विचार की प्रासंगिकता पर पुनर्विचार का अवसर भी माना जा सकता है। संघ की अपनी दृष्टि में उसकी मूल चिंता आरंभ से ही समाज की आंतरिक शक्ति रही है, इस समझ के साथ कि केवल राजनीतिक सत्ता किसी राष्ट्र को स्थायी रूप से मजबूत नहीं बना सकती। इस दृष्टि में समाज का चरित्र, उसकी संगठन-क्षमता, पारस्परिक विश्वास और सेवा-भाव ही राष्ट्र की वास्तविक पूँजी माने जाते हैं, और इसी आधार पर व्यक्ति-निर्माण को राष्ट्र-निर्माण से जोड़ा जाता है। व्यक्ति परिवार से जुड़ता है, परिवार समाज से, समाज राष्ट्र से और राष्ट्र अंततः मानवता से। भारतीय चिंतन में स्व का विस्तार सर्व तक इसी क्रम में होता है।

पूजनीय डॉ. मोहन भागवत जी के सार्वजनिक संवादों का एक स्थायी स्वर यह रहा है कि समाज अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रति आत्मविश्वासी हो, पर उस आत्मविश्वास को दूसरे के प्रति शत्रुता में न बदलने दे। वे मानते हैं कि अपनी आस्था पर दृढ़ रहते हुए भी दूसरे की गरिमा का सम्मान संभव है। एकात्मता का आधुनिक अर्थ यही है। यह समानता की जबरन स्थापना नहीं, संबंध की चेतना है।

मनुष्य केवल उपभोक्ता नहीं

आधुनिक विश्व की एक बड़ी कठिनाई यह है कि उसने मनुष्य को छोटे-छोटे खंडों में बाँटकर देखना आरंभ कर दिया। कहीं वह उपभोक्ता है, कहीं मतदाता, कहीं कर्मचारी, कहीं आर्थिक इकाई और अब एक डेटा प्रोफाइल भी। पर क्या मनुष्य केवल इतना ही है?

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन इसी प्रश्न को एक व्यापक भारतीय दृष्टि देता है। मनुष्य शरीर के साथ मन है, बुद्धि है, चेतना है और एक नैतिक संसार भी है। यदि विकास आर्थिक आँकड़े बढ़ाता रहे और मनुष्य भीतर से अकेला होता जाए, यदि तकनीक आगे बढ़े और समाज में विश्वास घटता जाए, यदि अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हो और पारिवारिक संबंध शिथिल पड़ते जाएँ, तो उसे पूर्ण विकास कहना कठिन है। यह दृष्टि आधुनिकता का विरोध नहीं करती। यह आधुनिकता को अधिक मानवीय बनाने का आग्रह करती है।

आचरण से बोलती सभ्यता

अमेरिका, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम और अन्य अनेक देशों में भारतीय मूल के लोगों ने विज्ञान, शिक्षा, चिकित्सा, तकनीक और सार्वजनिक जीवन में उल्लेखनीय स्थान बनाया है। पर प्रवासी समाज की भूमिका पेशेवर सफलता तक सीमित नहीं है। वे अपने देशों के उत्तरदायी नागरिक रहते हुए भी भारतीय जीवन-मूल्यों को व्यवहार में उतार सकते हैं। इस दृष्टि से देखें तो भारतीयता का सबसे प्रभावी रूप शब्दों से नहीं, आचरण से प्रकट होता है। सेवा से, ईमानदारी से, परिवार और समाज के प्रति उत्तरदायित्व से, स्थानीय समुदाय के साथ सहभागिता से और दूसरों की संस्कृति के प्रति सम्मान से। सभ्यताएँ केवल पुस्तकों से नहीं फैलतीं, वे मनुष्यों के आचरण से विश्वसनीय बनती हैं।

इसी कारण सेवा भारतीय चेतना का सबसे व्यावहारिक रूप है। सेवा का अर्थ किसी पर उपकार करना नहीं, दूसरे के दुःख को अपने जीवन से जुड़ा हुआ मानना है। भूख किसी मत की नहीं होती, पीड़ा किसी वर्ग की नहीं होती और आपदा किसी विचारधारा को देखकर नहीं आती। वसुधैव कुटुम्बकम् यदि केवल मंचों पर बोला जाए तो वह एक सुंदर वाक्य रह जाएगा। संकट के क्षण में जब एक मनुष्य दूसरे के लिए खड़ा हो जाता है, तभी वह विचार जीवन बनता है।

प्रकृति के साथ संबंध

जलवायु परिवर्तन, जल संकट, जैव विविधता का क्षरण और संसाधनों का अत्यधिक दोहन केवल वैज्ञानिक या राजनीतिक प्रश्न नहीं हैं। वे मानव चेतना के प्रश्न हैं। आधुनिक जीवन ने प्रकृति को मुख्यतः संसाधन माना, जबकि भारतीय परंपरा ने उससे संबंध बनाया। पृथ्वी माता कही गई, नदियाँ जीवनदायिनी मानी गईं, वृक्ष पूजनीय हुए और पशु-पक्षी जीवन के व्यापक परिवार का हिस्सा माने गए। इसका अर्थ विकास का विरोध नहीं, उपयोग और शोषण के बीच का अंतर पहचानना है। मनुष्य की आवश्यकता सीमित हो सकती है, उसकी लालसा असीमित। जो सभ्यता इन दोनों में भेद करना नहीं सीखती, वह अंततः अपना ही आधार क्षीण कर लेती है।

उदय के साथ उत्तरदायित्व

इक्कीसवीं सदी में भारत की भूमिका तेजी से बदल रही है। अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ है, तकनीकी क्षमता बढ़ी है और वैश्विक विमर्श में उसकी उपस्थिति अधिक महत्वपूर्ण हुई है। किंतु किसी राष्ट्र का वास्तविक वैश्विक महत्व केवल उसकी आर्थिक क्षमता से तय नहीं होता। बड़ी शक्ति होना और जिम्मेदार शक्ति होना दो भिन्न बातें हैं। भारत के सामने अवसर है कि वह शक्ति की एक नई परिभाषा प्रस्तुत करे, जिसमें विश्वास, नैतिक विश्वसनीयता और दूसरों के संकट में साथ खड़े होने की क्षमता भी शक्ति मानी जाए।
यह संदेश तभी प्रभावी होगा जब वह संवाद की भाषा में कहा जाए। विश्व को किसी नई सांस्कृतिक श्रेष्ठता की घोषणा की आवश्यकता नहीं है, उसे परस्पर समझ की आवश्यकता है।

भारत को यह दावा करने की भी आवश्यकता नहीं कि उसके पास सभी प्रश्नों के अंतिम उत्तर हैं। वह इतना कह सकता है कि मानवता के अनेक प्रश्नों पर उसके पास लंबा अनुभव है और उस अनुभव को साझा करने के लिए वह प्रस्तुत है। आत्मविश्वास चिल्लाता नहीं, संवाद करता है। संवाद का अर्थ सहमति भी नहीं होता। मतभेद रहेंगे, प्रश्न उठेंगे, आलोचनाएँ भी होंगी। महत्व इस बात का है कि मतभेद के बावजूद बातचीत बनी रहे।

अगले सौ वर्षों की चुनौती

संघ ने अपनी पहली शताब्दी में संगठन, समाज, सेवा और राष्ट्रीय चेतना के क्षेत्र में एक लंबी यात्रा पूरी की है। अगली शताब्दी के प्रश्न इनसे कहीं अधिक जटिल होंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता श्रम और जीवन दोनों का स्वरूप बदलेगी, तकनीक सामाजिक संबंधों को नए रूप देगी, परिवार की संरचनाएँ बदलेंगी, जलवायु परिवर्तन नई चुनौतियाँ खड़ी करेगा और मानव स्वतंत्रता तथा तकनीकी नियंत्रण के बीच नए तनाव सामने आएँगे। ऐसे समय में भारत की सभ्यतागत परंपरा को केवल अतीत की स्मृति बनाकर नहीं रखा जा सकता। उसे भविष्य के प्रश्नों का उत्तर देने योग्य बनाना होगा। भारत की शक्ति उसकी प्राचीनता में नहीं, उसकी निरंतर प्रासंगिकता में मानी जा सकती है।

भारत विश्व से क्या कह रहा है

यह वैश्विक संवाद अंततः कुछ बुनियादी प्रश्न सामने रखता है। क्या हम भिन्न होते हुए भी एक-दूसरे से जुड़े रह सकते हैं? क्या राष्ट्र अपने हितों की रक्षा करते हुए भी मानवता का ध्यान रख सकते हैं? क्या संस्कृतियाँ आत्मविश्वासी होते हुए भी संवादशील रह सकती हैं?

भारत की सभ्यतागत चेतना इन प्रश्नों के उत्तर में आशा रखती है। वह कहती है कि विविधता मानवता की दुर्बलता नहीं, उसकी शक्ति है। संबंध पहचान से व्यापक है और मानवता किसी भी राजनीतिक सीमा से बड़ी। शताब्दी वर्ष में पूजनीय डॉ. मोहन भागवत जी का यह संवाद इसलिए एक विदेश यात्रा भर नहीं है। इसे एक ऐसे भारत के परिचय के रूप में पढ़ा जा सकता है जो अपनी जड़ों से जुड़ा है पर विश्व से कटना नहीं चाहता, जो शक्ति चाहता है पर उसका उद्देश्य वर्चस्व नहीं संरक्षण मानता है, और जो आधुनिकता को स्वीकार करते हुए भी नैतिक चेतना को पीछे नहीं छोड़ना चाहता।

वसुधैव कुटुम्बकम् का अर्थ यह नहीं कि दुनिया भारत जैसी बन जाए। इसका अर्थ है कि दुनिया कुछ और अधिक मानवीय बन सके। एक पृथ्वी, अनेक राष्ट्र, अनेक संस्कृतियां, अनेक मार्ग, पर एक साझा मानवता और एक साझा भविष्य। संघ के शताब्दी वर्ष में विश्व को दिया जा सकने वाला भारत का सबसे बड़ा संदेश यही है।

 

Topics: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघश्री मोहन भागवतवसुधैव कुटुम्बकमसंघ के 100 वर्षभारत का संदेशमोहन भागवत विदेश प्रवाससंघ का वैश्विक संवाद
प्रोफेसर गीता सिंह
प्रोफेसर गीता सिंह
निदेशक CPDHE , UNIVERSITY OF DELHI [Read more]
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