संघ नहीं होता तो हिन्दू जीवन-पद्धति का वर्तमान स्वरूप बचाना मुश्किल होता: संजय गुप्त
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संघ नहीं होता तो हिन्दू जीवन-पद्धति का वर्तमान स्वरूप बचाना मुश्किल होता: संजय गुप्त

“स्वतंत्र भारत के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अथवा उसके मूल्यों से प्रेरित संगठन नहीं होते, तो वर्तमान स्वरूप वाली हिन्दू जीवन-पद्धति को जाति के आधार पर संविधान में अलग-अलग परिभाषित किया जाता और हिन्दू समाज एक बार फिर विभाजित हो जाता, ऐसा दिन दूर नहीं था।”

Written byPanchjanyaPanchjanya — edited by Mahak Singh
Oct 20, 2026, 03:58 pm IST
inसंघ @100
संजय गुप्त जी (प्रधान संपादक, दैनिक जागरण)

संजय गुप्त जी (प्रधान संपादक, दैनिक जागरण)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा उसके विचारों से प्रेरित संगठनों पर हिन्दू कट्टरवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगातार लगाए जाते हैं। लेकिन यदि संघ नहीं होता, तो आज हिन्दू संस्कार और हिन्दू जीवन-पद्धति शायद कब की लुप्त हो गई होती। यह आशंका कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि एवं ‘दैनिक जागरण’ के प्रधान सम्पादक संजय गुप्त ने व्यक्त की।

संघ की सामाजिक प्रासंगिकता और योगदान

उन्होंने संघ के कार्यों की सराहना करते हुए कहा, “लगभग छह सौ वर्षों की पराधीनता के बाद भी आज भारतीयता और हिन्दुत्व का प्रभाव पूरी दुनिया में दिखाई देता है। इसका मुख्य श्रेय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दिया जाना चाहिए।” गुप्त ने कहा कि समय के साथ समाज में जड़ें जमानेवाली सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए संघ और संघ प्रेरित संगठनों की हमेशा आवश्यकता रहती है, क्योंकि संघ निष्काम भाव से अपना कार्य करता है। उन्होंने कहा, “सामाजिक सुधारों की जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की भी है। लेकिन वोटों की राजनीति के कारण राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं एक अलग ही प्रकार की सामाजिक विकृति को जन्म देती हैं। कुछ राजनीतिक नेताओं को अपवाद मान लें, तो अधिकांश नेताओं के प्रति जनता का अपनी समस्याओं के समाधान और विकास के सन्दर्भ में पर्याप्त विश्वास दिखाई नहीं देता। ऐसी स्थिति में संघ और संघ से प्रेरित संगठनों की आवश्यकता एवं प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।”

चरित्र-निर्माण से स्वर्णिम भारत का लक्ष्य

गुप्त ने कहा, “आज भी देश के कुछ राजनीतिक दल और अनेक सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महत्त्व को समझने के लिए तैयार नहीं हैं। भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद देश में सनातन भारतीय मूल्यों का प्रचार-प्रसार करने और जनमानस को उन मूल्यों का महत्त्व समझाने वाला कोई दूसरा बड़ा संगठन नहीं था। “स्वतंत्र भारत के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अथवा उसके मूल्यों से प्रेरित संगठन नहीं होते, तो वर्तमान स्वरूप वाली हिन्दू जीवन-पद्धति को जाति के आधार पर संविधान में अलग-अलग परिभाषित किया जाता और हिन्दू समाज एक बार फिर विभाजित हो जाता, ऐसा दिन दूर नहीं था।” उन्होंने अंत में कहा, “पिछली शताब्दी में तुष्टीकरण के कारण हिन्दू समाज के सामने उत्पन्न हुई विभिन्न चुनौतियों को दूर करने पर संघ का जोर रहा है। अब आगामी शताब्दी के लिए संघ ने जिन चुनौतियों को स्वीकार किया है, उनमें देशवासियों का चरित्र-निर्माण सर्वोच्च प्राथमिकता है। यदि भारत को एक बार फिर उसका स्वर्णिम युग प्राप्त कराना है, तो चरित्र-निर्माण के बिना यह सम्भव नहीं होगा।”

Topics: HinduRashtriya Swayamsevak SanghRSSvijayadashami utsav rssराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
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