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होम संघ @100

तमाम विरोध और चुनौतियों के बीच कैसे आगे बढ़ता रहा संघ? जानिए

'वसुधैव कुटुम्बकम्' का विचार इसी व्यापक दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करता है। विविधताओं का सम्मान करना, उन्हें स्वीकार करना और सभी को साथ लेकर चलना हमारी परंपरा की विशेषता है।

Written byMahak SinghMahak Singh
Oct 20, 2026, 12:30 pm IST
inसंघ @100
संजय गुप्त जी (प्रधान संपादक, दैनिक जागरण)

संजय गुप्त जी (प्रधान संपादक, दैनिक जागरण)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विजयादशमी उत्सव में 20 अक्टूबर 2026 को मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित दैनिक जागरण के प्रधान संपादक, संजय गुप्त जी ने संघ की 101 वर्षों की यात्रा, उसकी विचारधारा और राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि किसी भी संगठन की वास्तविक पहचान केवल उसकी स्थापना के वर्षों से नहीं, बल्कि उसके विचारों, उद्देश्यों और समाज पर पड़ने वाले प्रभाव से होती है। संघ के 101वें वर्ष का यह आयोजन इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

संजय गुप्त जी ने संघ की स्थापना के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसका मूल ध्येय देश को स्वतंत्र कराने के साथ हिंदू समाज को संगठित, सशक्त और जागरूक बनाना था। संघ की मूल अवधारणा रही कि वास्तविक स्वतंत्रता केवल राजनीतिक आजादी तक सीमित नहीं हो सकती; इसके लिए समाज में स्वबोध, आत्मसम्मान और राष्ट्रीय चेतना का विकास भी आवश्यक है। स्वतंत्रता के बाद संघ ने व्यक्ति निर्माण और राष्ट्रनिष्ठा को अपने कार्यों का प्रमुख आधार बनाया। उन्होंने संघ की एक शताब्दी से अधिक की यात्रा को राष्ट्र के प्रति समर्पण, सामाजिक एकता, सांस्कृतिक चेतना और व्यक्ति निर्माण के संकल्प से जोड़ते हुए इन मूल्यों की वर्तमान समय में प्रासंगिकता को रेखांकित किया।

भारतीय परंपरा और सनातन दृष्टि

भारतीय संस्कृति की मूल भावना संपूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की रही है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का विचार इसी व्यापक दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करता है। विविधताओं का सम्मान करना, उन्हें स्वीकार करना और सभी को साथ लेकर चलना हमारी परंपरा की विशेषता है। सनातन दृष्टि हमें यह सिखाती है कि समय के साथ बदलने वाली परिस्थितियों और व्यवस्थाओं में आवश्यक परिवर्तन स्वीकार किए जाने चाहिए, लेकिन जीवन के शाश्वत मूल्यों को सदैव सुरक्षित रखा जाना चाहिए। परिवर्तन और निरंतरता के बीच यही संतुलन भारतीय संस्कृति को जीवंत बनाए रखता है।

चुनौतियों के बीच संघ की राजनीतिक यात्रा

आजादी के बाद संघ की विचारधारा को राजनीतिक वर्ग के एक हिस्से का समर्थन नहीं मिला। संघ के समर्थकों का मानना रहा है कि इसकी राष्ट्रवादी सोच तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व के एक वर्ग की तुष्टीकरण की राजनीति से मेल नहीं खाती थी। तमाम चुनौतियों के बावजूद संघ अपनी वैचारिक और संगठनात्मक यात्रा पर आगे बढ़ता रहा। देश के गणतंत्र बनने के बाद संघ के विचारों से प्रभावित नेताओं ने भारतीय जनसंघ की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आगे चलकर इसी राजनीतिक धारा से भारतीय जनता पार्टी का विकास हुआ, जो आज विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों में शामिल है। भाजपा के अनेक प्रमुख नेताओं के राजनीतिक संस्कारों और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण के निर्माण में संघ की भूमिका रही है। पार्टी की वैचारिक दिशा और संगठनात्मक विस्तार में संघ की विचारधारा तथा कार्यपद्धति के योगदान को महत्वपूर्ण माना जाता है।

अनुशासन और चरित्र निर्माण: भविष्य की प्राथमिकता

आज समाज में अनुशासन, नागरिक जिम्मेदारी और कर्तव्यबोध को मजबूत करने की आवश्यकता है। *’देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें’* की भावना प्रत्येक नागरिक को राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का एहसास कराती है। संघ की आगामी यात्रा में चरित्र निर्माण को महत्वपूर्ण लक्ष्य के रूप में देखा जा सकता है। एक चरित्रवान व्यक्ति अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों को भी समझता है और राष्ट्रहित को महत्व देता है। यदि भारत को अपने गौरवशाली अतीत से प्रेरणा लेकर एक सशक्त भविष्य का निर्माण करना है, तो ईमानदारी, अनुशासन, सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्रीय निष्ठा जैसे गुणों को जीवन का हिस्सा बनाना होगा।

विश्व पटल पर भारतीयता और हिंदू समाज की एकता

भारतीयता और हिंदुत्व को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में संघ तथा उससे प्रेरित संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति बढ़ती वैश्विक रुचि इस विषय को और प्रासंगिक बनाती है। हालांकि, हिंदू समाज की एकता के सामने जातिगत भेदभाव और सामाजिक विभाजन जैसी चुनौतियां भी हैं। यदि समाज को संगठित और सशक्त बनाना है, तो सामाजिक समरसता तथा परस्पर सम्मान को प्राथमिकता देनी होगी। संघ और उससे प्रेरित संगठनों की भूमिका इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है कि वे समाज को विभाजित करने वाली प्रवृत्तियों को दूर करने तथा सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने में कितना योगदान देते हैं।

अंततः संघ के 101वें वर्ष की यात्रा राष्ट्र निर्माण, सांस्कृतिक चेतना और चरित्र निर्माण के संकल्प को आगे बढ़ाने का अवसर है। एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण तभी संभव है, जब उसके नागरिक अपनी परंपराओं के प्रति जागरूक हों, समय के अनुरूप सकारात्मक बदलाव स्वीकार करें और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करें।

Topics: Rashtriya Swayamsevak Sanghrashtriya swayamsevak sangh ki sthapnaRSSvijayadashami utsav rssराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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