Regime Change : 'सत्ता परिवर्तन' का वैश्विक खतरा और सरसंघचालक मोहन भागवत की चेतावनी
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Regime Change : ‘सत्ता परिवर्तन’ का वैश्विक खतरा और सरसंघचालक मोहन भागवत की चेतावनी

हिंसक और अनियंत्रित विद्रोह समाज में केवल अराजकता फैलाते हैं, कोई सार्थक बदलाव नहीं लाते।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Oct 21, 2026, 08:24 am IST
inविश्लेषण
श्री मोहन भागवत, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

श्री मोहन भागवत, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत ने 20 अक्टूबर 2026 को नागपुर में विजयादशमी उत्सव के अवसर पर अपने संबोधन में विविध समसामयिक विषयों पर गहरे और गंभीर विचार व्यक्त किए। उन्होंने रिजीम चेंज (सत्ता परिवर्तन ) के वैश्विक खतरे से न केवल भारत वरन् सम्पूर्ण विश्व को आगाह किया है। श्री भागवत के रिजीम चेंज के निहितार्थ का व्यापक फलक है, जिसके आलोक में अपकारी शक्तियों के उद्देश्य का भयावह स्वरूप स्पष्ट होता है, जहां किसी देश में इन विध्वंसकारी शक्तियों द्वारा विविध प्रकार से अराजकता और आतंक का वातावरण स्थापित कर उस देश की सत्ता परिवर्तन ही नहीं वरन् उस देश की सभ्यता,संस्कृति और अस्तित्व का विनाश करना है। अराजकता के व्याकरण पर उन्होंने डॉ. बी.आर. आम्बेडकर के कथन का संदर्भ देते हुए कहा कि हिंसक और अनियंत्रित विद्रोह समाज में केवल अराजकता फैलाते हैं, कोई सार्थक बदलाव नहीं लाते।

पश्चिम की आंधी संस्कारों को नष्ट करना चाहती है

मोहन भागवत ने भारत सहित सम्पूर्ण विश्व आगाह किया कि ‘रिजीम चेंज’ (सत्ता या सरकार परिवर्तन) करने से कभी भी परिस्थितियां नहीं बदलती हैं। इतिहास साक्षी है कि इससे कभी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ है। यह वैश्विक षड्यंत्र का हिस्सा है। उन्होंने दुनिया भर में हो रही उथल-पुथल का उल्लेख करते हुए कहा कि फ्रांस,अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल में जो कुछ भी हुआ, वह सब एक सोचे-समझे षड्यंत्र का हिस्सा है। पश्चिम से एक ऐसी आंधी (आसुरी शक्तियां ) चली है जो हर प्रकार की व्यवस्था, भद्रता और संस्कारों से नफरत करती है और उसे नष्ट करना चाहती है।

आसुरी शक्तियों के लिए भारत मुख्य निशाना

भारत मुख्य निशाना है, इसलिए संघ प्रमुख ने चेतावनी दी कि अपने स्वार्थ का पोषण करने वाली कुछ वैश्विक ताकतें भारत की प्रगति से परेशान हैं और उन्होंने भारत को अपने निशाने पर ले लिया है। वे नहीं चाहतीं कि भारत इतना शक्तिशाली बने कि उनके वर्चस्व को चुनौती दे, इसलिए भारत, हिंदू समाज और संघ को कमजोर व विभाजित करने के लिए ऐसी कोशिशें (सत्ता परिवर्तन के प्रयास) भारत में भी की जा रही है। इसलिए बांग्लादेश की तरह भारत में भी ‘रिजीम चेंज’ कराने और इसे तोड़ने के प्रयास चल रहे हैं, लेकिन भारत में ऐसा होना संभव नहीं है।

आंदोलन का मतलब

उक्त सन्दर्भ में उन्होंने आंदोलनों के राजनीतिकरण पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समाज में समस्याओं के समाधान के लिए आंदोलन होने चाहिए, लेकिन आज के दौर में विरोध-प्रदर्शनों को राजनीतिक हितों को साधने और समाज में विभाजन पैदा करने का जरिया (हथियार) बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पिछले दशकों में भारत जिस दृढ़ नीति और पक्के नेतृत्व के साथ आगे बढ़ा है, उसकी वजह से ऐसी हरकतों पर रोक लगी है। शक्तिशाली नेतृत्व के कारण बाहरी शक्तियों की खेल बंद हो गए हैं, इसलिए भारत में सत्ता परिवर्तन कभी नहीं होगा।

बाहरी ताकतों का बुरा खेल

सरसंघचालक मोहन भागवत के रिजीम चेंज की चेतावनी को भारत सहित संपूर्ण विश्व को बहुत गंभीरता लेने का समय आ गया है। गौरतलब है कि,रिजीम परिवर्तन (शासन परिवर्तन) को वैश्विक स्थिरता और शांति के लिए एक बड़ा खतरा माना जाता है, विशेष रूप से तब जब यह बाहरी ताकतों के हस्तक्षेप, सैन्य कार्रवाई या हिंसक भीड़तंत्र (Mobocracy) के माध्यम से किया जाए। यद्यपि , लोकतांत्रिक देशों में शांतिपूर्ण और संवैधानिक रूप से चुनाव के जरिए सत्ता बदलना नागरिकों का अधिकार है,परन्तु जबरन थोपा गया रिजीम चेंज अक्सर देशों को तबाह कर देता है। जब किसी देश की स्थापित सरकार को अचानक या हिंसक तरीके से हटाया जाता है, तो वहां एक सत्ता का खालीपन पैदा हो जाता है। इतिहास गवाह है कि इराक, लीबिया और अफगानिस्तान जैसे देशों में बाहरी हस्तक्षेप से हुए रिजीम चेंज के बाद वहां लोकतंत्र आने के बजाय दशकों लंबा गृहयुद्ध शुरू हो गया और आतंकवाद को बढ़ावा मिला।

हाल के वर्षों में कई देशों में हिंसक प्रदर्शनों के जरिए तख्तापलट या रिजीम चेंज की कोशिशें देखी गई हैं। जब भीड़ संसद या सरकारी कार्यालयों पर कब्जा कर लेती है, तो वह लोकतंत्र नहीं बल्कि अराजकता और भीड़तंत्र का रूप ले लेती है, जिससे आम नागरिकों का जीवन और देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह पटरी से उतर जाती है।

संवैधानिक तरीके से हो परिवर्तन

वैश्विक विचारकों और नीति विशेषज्ञों (जैसे Yale Law School की रिपोर्ट्स) का मानना है कि किसी भी देश में परिवर्तन आंतरिक, क्रमिक और संवैधानिक तरीकों से ही होना चाहिए। जबरन या अराजक तरीके से किया गया ‘रिजीम चेंज’ अधिकांश मामलों में सुधार लाने के बजाय स्थिति को और अधिक विनाशकारी बना देता है।

विश्व राजनीति में ‘रिजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) का भयावह खेल द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आरंभ हुआ, जब विश्व दो ध्रुवों क्रमशः संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ समर्थक देशों में बट गया और दोनों खेमों के मध्य शीत युद्ध प्रारम्भ हुआ। शीत युद्ध (Cold War) के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ जैसी महाशक्तियों ने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों में तख्तापलट और आंतरिक विद्रोहों को समर्थन दिया था। हाल के दशकों में भी इराक, लीबिया और अन्य देशों में ‘लोकतंत्र की स्थापना’ या ‘मानवाधिकारों की रक्षा’ के नाम पर हुए सैन्य हस्तक्षेपों को आलोचक ‘रिजीम चेंज’ की नीति का हिस्सा मानते हैं।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में रिजीम चेंज के लिए डिजिटल प्रोपोगैंडा और नैरेटिव प्रमुख साधन बन रहे हैं। आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया, फेक न्यूज और प्रोपोगैंडा के जरिए किसी भी देश के भीतर अस्थिरता पैदा करना आसान हो गया है। इसे ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ कहा जाता है, जहां हथियारों के बिना ही किसी देश की व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास किया जाता है।यह कहना कि पूरी विश्व में एक ही केंद्र से कोई साझा षड्यंत्र चल रहा है, एक बड़ी परिकल्पना हो सकती है। परन्तु ,फिर भी यह पूरी तरह सच है कि शक्तिशाली देश और वैश्विक समूह हमेशा अपने लाभ के लिए कमजोर देशों की सत्ता और नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास करते आ रहे हैं।

साजिश में डीप स्टेट शामिल

‘रिजीम परिवर्तन’ के विश्वव्यापी षड्यंत्र को लेकर वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग दृष्टिकोण और दावे सामने आते रहे हैं। परन्तु सच तो ये है कि वैश्विक स्तर पर ‘डीप स्टेट’ और शक्तिशाली देश इसमें संलिप्त हैं।ऐतिहासिक और समकालीन राजनीतिक परिचर्चाओं में संयुक्त राज्य अमेरिका और उसकी खुफिया एजेंसी सी.आई.ए.पर दुनिया के विभिन्न देशों में अपनी पसंद की सरकारें लाने या विरोधी सरकारों को अस्थिर करने के आरोप लगते रहे हैं। शीतयुद्ध के दौर से लेकर हाल के वर्षों में मध्य-पूर्व जैसे इराक, लीबिया, ईरान और लातिनी अमेरिकी देशों में शासन परिवर्तन के प्रयासों के लिए अक्सर वाशिंगटन के ‘डीप स्टेट’ को जिम्मेदार माना जाता है।

यह भी कड़वा सच है कि ‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’ जैसी वैश्विक षड्यंत्र थ्योरीज़ का मानना है कि दुनिया के कुछ शक्तिशाली अरबपति (जैसे जॉर्ज सोरोस), बड़े कॉर्पोरेट और वैश्विक थिंक-टैंक मिलकर एक एकल विश्व सरकार स्थापित करने के लिए विभिन्न देशों में ‘रिजीम चेंज’ की साजिश रचते हैं। इसलिए भारत में हो रहे आंदोलनों का वास्तविक उद्देश्य रिजीम चेंज ही है, जिसका रिमोट कंट्रोल इनके पास ही है।

लोकतांत्रिक सरकार को अस्थिर करना लक्ष्य

भारत में पश्चिमी ताकतें, विदेशी टूलकिट और कुछ अंतरराष्ट्रीय एनजीओ भारत की बढ़ती वैश्विक शक्ति और लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को अस्थिर करना चाहते हैं। इसके तहत भारत की संवैधानिक संस्थाओं, न्यायपालिका और बड़े औद्योगिक समूहों पर डिजिटल नैरेटिव और मनगढ़ंत रिपोर्टों (जैसे हिंडनबर्ग या ओसीसीआरपी की रिपोर्ट) के जरिए हमला करके जनता में अविश्वास पैदा करने की कोशिश की जाती है। परंतु भारत में सबसे दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि विपक्ष और भारत विरोधी तत्व इनके समर्थन में खड़े नजर आते हैं।

इसलिए सरसंघचालक ने अपकारी शक्तियों के विनाश के लिए नागपुर में संघ के 100 वर्षों के यात्रा और भविष्य की दिशा पर चर्चा करते हुए राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता पर जोर दिया। उन्होंने समाज को आईना दिखाते हुए कहा कि जब हम जाति को याद करते हैं तो विभाजन बढ़ता है। उन्होंने संतों की भूमिका को याद करते हुए कहा कि संतों ने समाज में आत्मबोध जगाने का काम किया है। उन्होंने स्वदेशी, पंच परिवर्तन, नई पीढ़ी में सही-गलत की समझ विकसित करने,आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी आधुनिक तकनीक के नैतिक उपयोग और पर्यावरण के अनुकूल विकास की आवश्यकता पर बात की। इस बात पर बल दिया कि केवल व्यवस्था बदलने से कुछ नहीं होगा, बल्कि व्यक्ति की आदत और आचरण में बदलाव से ही समाज और व्यवस्था में वास्तविक परिवर्तन आ सकता है।

भारत का सामाजिक ताना-बाना मजबूत

सरसंघचालक मोहन भागवत ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर जोर देते हुए कहा कि विरोध प्रदर्शनों का उद्देश्य समाज में विभाजन पैदा करना नहीं, बल्कि समस्याओं का समाधान खोजना होना चाहिए और इसके लिए हर हाल में संवैधानिक सीमाओं और नागरिक शिष्टाचार का पालन किया जाना चाहिए। अंत में उन्होंने विश्वास जताया कि भारत का सामाजिक ताना-बाना मजबूत है और भारत में इस तरह के ‘रिजीम चेंज’ के प्रयास कभी सफल नहीं होंगे।

 

Topics: जॉर्ज सोरोसडीप स्टेटडॉ. मोहन भागवतराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघसत्ता परिवर्तन
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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