ओडिशा की उड़ान 2.0: प्रदीप जोशी बोले- सरसंघचालक जी का विरोध करने वालों को सता रहा 'दुकान बंद' होने का डर
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ओडिशा की उड़ान 2.0: प्रदीप जोशी बोले- सरसंघचालक जी का विरोध करने वालों को सता रहा ‘दुकान बंद’ होने का डर

पाञ्चजन्य के सुशासन संवाद ‘ओडिशा की उड़ान 2.0’ में आरएसएस सह प्रचार प्रमुख प्रदीप जोशी ने सरसंघचालक मोहन भागवत के विदेश प्रवास पर कहा – विरोध से ज्यादा समर्थन मिला। विश्व बंधुत्व की भावना लेकर गए हैं भागवत जी।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Sep 3, 2026, 02:46 pm IST
inओडिशा
panchjanya Sushashan Samvad Odisha ki udan

ओडिशा की उड़ान 2.0 में बोलते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख प्रदीप जोशी

पाञ्चजन्य के सुशासन संवाद ‘ओडिशा की उड़ान 2.0’ संवाद में पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख श्री प्रदीप जोशी के साथ विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की। इस दौरान उन्होंने हाल ही में सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी के विदेश प्रवास के दौरान कुछ तत्वों के द्वारा उनका विरोध किए जाने को लेकर स्पष्ट किया कि उनके कार्यक्रमों को विरोध से अधिक समर्थन मिला है। वह दुनिया में विश्व बंधुत्व की भावना को लेकर गए हैं। रही बात बात विरोध करने वालों की तो उन्हें अपनी दुकान बंद होने का डर सता रहा है, इसीलिए ऐसा कर रहे हैं।

सरसंघचालक मोहन भागवत जी के विदेश प्रवास में आप संघ के कौन-कौन से विषयों को देखते हैं? साथ ही इस दौरान पैदा हुए विवादों को कैसे देखते हैं?

भारत में तो यात्राओं का एक स्वभाव रहा है, बाहर जाने का, सीखने का। आज के परिप्रेक्ष्य की बात करें तो सरसंघचालक जी का ये कोई पहला विदेश प्रवास नहीं हुआ है। वह इससे पहले भी अमेरिका, ब्रिटेन और तमाम देशों में अलग-अलग कार्यक्रमों से जा चुके हैं। हम सब जानते हैं कि संघ के स्वयंसेवक कई देशों में संगठन औऱ समाज का काम करते हैं। वहां के समाज के लिए कई नए तरह के कार्य भी स्वयंसेवकों ने किए हैं। ऐसे में उनकी इच्छा रहती है कि संघ के अधिकारी आएं और उनके कार्यों का आंकलन करें, उन्हें प्रोत्साहित करें। इसी क्रम में पूज्यनीय रज्जू भैया और सुदर्शन जी भी प्रवास कर चुके हैं।

इस बार सरसंघचालक जी के इस बार के प्रवास का बैकग्राउंड थोड़ा भिन्न है। संघ शताब्दी होने के कारण ये विचार किया गया कि देश में तो हम कार्य करते हैं। लेकिन, दुनिया के लोग भारत को समझना चाहते हैं, हिन्दुत्व को समझना चाहते हैं। ऐसे में ये आवश्यक हो गया है कि हम उनके बीच जाएं और उनसे संवाद करें। हाल ही में विज्ञान भवन में हुए कार्यक्रम में करीब 68 देशों के लोग वहां आए थे। इसी क्रम में सरसंघचालक जी भी विश्व बंधुत्व की भावना को लेकर उन देशों में गए हैं। मैं मानता हूं कि ये वैश्विक पटल हिन्दुत्व के बारे में बताने का सरसंघचालक जी का विशेष प्रयास है। हालांकि, ऐसा पहले से ही होता आया है।

रही बात कुछ लोगों के द्वारा सरसंघचालक जी के विरोध की तो, ये स्पष्ट होना चाहिए कि इस प्रवास को विरोध से अधिक समर्थन मिला है। सरसंघचालक जी के कार्यक्रमों में हर पंथ और उपासना पद्धति के लोगों का बड़ी मात्रा में शामिल होना इस बात को दिखाता है कि उन लोगों में संघ को समझने और जानने की जिज्ञासा कितनी अधिक है। रही बात विरोधियों की तो उन्हें अपनी दुकान के बंद होने का डर सता रहा है। ऐसे में ये कुछ लोग अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए ऐसा कर रहे हैं।

हाल ही में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी का भी प्रवास हुआ था। इन दोनों प्रवासों में भिन्नता क्या थी?

भिन्नता कुछ नहीं है। सरसंघचालक और सरकार्यवाह जी दोनों के ही प्रवास का उद्देश्य संघ शताब्दी के निमित्त कार्यकर्ताओं के बीच जाना था। ये लगातार चलने वाला कार्यक्रम है।

अपने कार्य के लिए अपनी पहचान रखने वाला संघ, क्या अपनी छवि के लिए जागरूक हुआ है?

मैं मानता हूं कि संघ की पहचान उसके कार्यों से ही होने वाली है। न कि छवि या दृष्टिकोण से। संघ के कार्यकर्ता जमीन पर कार्य करते हैं और उनती ही पहचान महत्वपूर्ण है। लेकिन, एक सच ये भी है कि हाल के दिनों में संघ को जानने और समझने की उत्सुकता बहुत बढ़ी है। इसके लिए छवि के लिए कार्य करने पड़ते हैं। इस वर्ष सरसंघचालक के 4 कार्यक्रम हुए हैं। संघ कभी भी छवि के पीछे नहीं भागा।

कुछ लोग संघ की छवि को खास खांचे में प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं। संघ के शताब्दी वर्ष की इस यात्रा का आप कैसे आकलन करते हैं?

संघ की यात्रा मोहिते का बाड़ा से 100 साल की यात्रा हमारे सामने है। संघ की 100 साल की यात्रा विचार, व्यवहार, विश्वास और विकास की यात्रा है। इस 100 वर्ष की यात्रा का मूल है ‘व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण’। इस यात्रा में संघ में पूरी तरह से व्यक्ति निर्माण पर जोर दिया है। शुरुआती तौर पर लोगों के समक्ष कई प्रश्न थे, जैसे संगठन संभव है क्या, आवश्यक है क्या या हिन्दुत्व के नाम पर संगठन संभव है क्या? आदि। 100 साल पहले डॉ हेडगेवार जी ने जिस कार्य को शुरू किया था, उसी कार्य को 100 साल के बाद भी संघ जारी रखे हुए है। यही कारण है कि समाज को इस बात का विश्वास है कि जहां संघ होगा, वहां मतांतरण, देश विरोधी भावना, असामाजिक विषयों आदि को जगह नहीं मिल सकती है। संघ ने समाज में ये विश्वास खड़ा किया है।

रही बात विकास की तो जहां भी स्वयंसेवक हैं, वहां उन्होंने नए-नए उपक्रम समाज के लिए शुरू किए और आवश्यकता के अनुसार, समाज हित में बदलाव लाने की कोशिश की। आज हम स्वदेशी, समरसता, डिकोलोनॉइजेशन की बात करते हैं।

संघ जनसंख्या असंतुलन की बात करता है तो कुछ लोग इसे संघ की सूक्ष्म दृष्टि कहते हैं? संघ की दृष्टि में इस विषय की व्यापकता और आयाम क्या है?

डेमोग्राफी चेंज (जनसंख्या असंतुलन) केवल भारत की समस्या नहीं है। इस विषय पर दुनिया कई देशों में बड़े बदलावों को लाने की चर्चाएं चल रही हैं। उदाहरण के लिए अपने आपको लिबरल इमिग्रेशन वाला बताने वाला कनाडा भी आज इस पर सख्त कानून बनाने की बात कर रहा है। डेनमार्क कह रहा है कि हमारे देश में एक पैरलल सोसायटी तैयार हो रही है। वो इसे गेटोनाइजेशन कह रहे हैं। आज स्थिति ये हो गई है कि खुद को उदारवादी कहने वाला यूरोपियन यूनियन आज ये कह रहा है कि हमें रिफ्यूजी लेना चाहिए, लेकिन उससे पहले उनकी पृष्ठभूमि की अच्छी तरह से जांच की जानी चाहिए। कुल मिलाकर समूची दुनिया ही इस पर गहनता से काम कर रही है। इस मुद्दे पर हमारे देश में भी चर्चा है। हमें ये समझने की आवश्यकता है कि हमारा जो मौजूदा प्रजनन दर है वो केवल 1.57 प्रतिशत है। अगर समाज के नाते हम इसके बारे में सचेत नहीं होंगे, तो ये आने वाले दिनों में हमारे लिए बड़ी समस्या बन जाएगी। प्रजनन दर को देखें तो कई देश के कई राज्यों में यह 1.8 से भी नीचे दिखता है। ऐसे में आने वाले वक्त में हमें जनसंख्या की निश्चित नीति के बारे में सोचना होगा।

इसके साथ ही हमें इस बात को ये भी सोचना होगा कि ये जनसंख्या असंतुलन क्यों हो रहा है? हमारी जनसंख्या घट रही है,जबकि, दूसरे लोग लगातार इसे बढ़ाते जा रहे हैं। ये लोग किसी भी तरह के कानून को मानने के लिए तैयार नहीं है। मतांतरण लगातार जारी है। कुछ इलाकों में डिजाइन्ड मोबिलिटी करने का भी प्रयास हो रहा है। ऐसे में अगर इससे हम नहीं निपटेंगे तो आने वाली पीढ़ी को इसे भुगतना पड़ेगा। हम चाहते हैं कि भविष्य में सरकार इसको लेकर कोई न कोई नीति और कानून बनाए।

राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर संघ से युवाओं के जुड़ाव को आप किस प्रकार से देखते हैं?

युवाओं का निर्माण करके ही संघ का कार्य चला है। संघ शताब्दी वर्ष में जो सात प्रकार के आयाम रखे गए थे, उसमें से एक युवा संवाद भी था। संघ में अनेक युवा आते हैं और इसके बाहर के युवा भी उतने ही राष्ट्रभक्त हैं। जल्द ही युवाओं को लेकर देशभर करीब 5000 कार्यक्रम होंगे। फिलहाल हम युवाओं के मध्य अपने गौरवपूर्ण इतिहास की जानकारी रख रहे हैं। क्योंकि अरविंद जी ने कहा था-‘भूतकाल का गौरव, वर्तमान की पीड़ा और भविष्य के सपने जिस युवा पीढ़ी के साथ होती है वो समाज विकास करता है।’

हमारा अनुभव है कि आज का युवा कुछ नया, कुछ अनोखा और देशहित में और समाज के निचले पायदान पर खड़े लोगों के लिए करना चाहता है।

ओडिशा की सांस्कृतिक, जनजातीय पहचान औऱ राष्ट्रीय सुरक्षा को संघ कैसे देखता है?

इस विषय पर ओडिशा की सरकार अलग ही तरह से कार्य कर रही है। इसकी 575 किलोमीटर की तटरेखा है। राष्ट्रीय महत्व की बात करें तो यहां चांदीपुर, पारादीप और रिफाइनरी जैसे प्रतिष्ठान हैं। गोपालपुर का रेयर अर्थ मिनरल्स का क्षेत्र भी इसी में आता है। इसकी सुरक्षा के लिए शासन की आवश्यकता से अधिक समाज की सतर्कता ही आवश्यकता है। पिछली सरकार की तुलना में माझी सरकार ने खुद को अपग्रेड करते हुए यहां 15-20 पुलिस स्टेशन बनाए हैं। विजिलेंस के लिए अधिक से अधिक ड्रोन का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

Topics: प्रदीप जोशी इंटरव्यूपाञ्चजन्य ओडिशा की उड़ान 2.0विश्व बंधुत्वसुशासन संवादपाञ्चजन्य “सुशासन संवादसंघ शताब्दीमोहन भागवत विदेश प्रवास
कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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