पाञ्चजन्य के सुशासन संवाद ‘ओडिशा की उड़ान 2.0’ संवाद में पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख श्री प्रदीप जोशी के साथ विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की। इस दौरान उन्होंने हाल ही में सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी विदेश प्रवास के दौरान कुछ तत्वों के द्वारा उनका विरोध किए जाने को लेकर स्पष्ट किया कि उनके कार्यक्रमों को विरोध से अधिक समर्थन मिला है। वह दुनिया में विश्व बंधुत्व की भावना को लेकर गए हैं। रही बात बात विरोध करने वालों की तो उन्हें अपनी दुकान बंद होने का डर सता रहा है। इसीलिए ऐसा कर रहे हैं।
सरसंघचालक मोहन भागवत जी के विदेश प्रवास में आप संघ के कौन-कौन से विषयों को देखते हैं? साथ ही इस दौरान पैदा हुए विवादों को कैसे देखते हैं?
भारत में तो यात्राओं का एक स्वभाव रहा है, बाहर जाने का, सीखने का। आज के परिप्रेक्ष्य की बात करें तो सरसंघचालक जी का ये कोई पहला विदेश प्रवास नहीं हुआ है। वह इससे पहले भी अमेरिका, ब्रिटेन और तमाम देशों में अलग-अलग कार्यक्रमों से जा चुके हैं। हम सब जानते हैं कि संघ के स्वयंसेवक कई देशों में संगठन औऱ समाज का काम करते हैं। वहां के समाज के लिए कई नए तरह के कार्य भी स्वयंसेवकों ने किए हैं। ऐसे में उनकी इच्छा रहती है कि संघ के अधिकारी आएं और उनके कार्यों का आंकलन करें, उन्हें प्रोत्साहित करें। इसी क्रम में पूज्यनीय रज्जू भैया और सुदर्शन जी भी प्रवास कर चुके हैं।
इस बार सरसंघचालक जी के इस बार के प्रवास का बैकग्राउंड थोड़ा भिन्न है। संघ शताब्दी होने के कारण ये विचार किया गया कि देश में तो हम कार्य करते हैं। लेकिन, दुनिया के लोग भारत को समझना चाहते हैं, हिन्दुत्व को समझना चाहते हैं। ऐसे में ये आवश्यक हो गया है कि हम उनके बीच जाएं और उनसे संवाद करें। हाल ही में विज्ञान भवन में हुए कार्यक्रम में करीब 68 देशों के लोग वहां आए थे। इसी क्रम में सरसंघचालक जी भी विश्व बंधुत्व की भावना को लेकर उन देशों में गए हैं। मैं मानता हूं कि ये वैश्विक पटल हिन्दुत्व के बारे में बताने का सरसंघचालक जी का विशेष प्रयास है। हालांकि, ऐसा पहले से ही होता आया है।
रही बात कुछ लोगों के द्वारा सरसंघचालक जी के विरोध की तो, ये स्पष्ट होना चाहिए कि इस प्रवास को विरोध से अधिक समर्थन मिला है। सरसंघचालक जी के कार्यक्रमों में हर पंथ और उपासना पद्धति के लोगों का बड़ी मात्रा में शामिल होना इस बात को दिखाता है कि उन लोगों में संघ को समझने और जानने की जिज्ञासा कितनी अधिक है। रही बात विरोधियों की तो उन्हें अपनी दुकान के बंद होने का डर सता रहा है। ऐसे में ये कुछ लोग अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए ऐसा कर रहे हैं।
हाल ही में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी का भी प्रवास हुआ था। इन दोनों प्रवासों में भिन्नता क्या थी?
भिन्नता कुछ नहीं है। सरसंघचालक और सरकार्यवाह जी दोनों के ही प्रवास का उद्देश्य संघ शताब्दी के निमित्त कार्यकर्ताओं के बीच जाना था। ये लगातार चलने वाला कार्यक्रम है।
अपने कार्य के लिए अपनी पहचान रखने वाला संघ, क्या अपनी छवि के लिए जागरूक हुआ है?
मैं मानता हूं कि संघ की पहचान उसके कार्यों से ही होने वाली है। न कि छवि या दृष्टिकोण से। संघ के कार्यकर्ता जमीन पर कार्य करते हैं और उनती ही पहचान महत्वपूर्ण है। लेकिन, एक सच ये भी है कि हाल के दिनों में संघ को जानने और समझने की उत्सुकता बहुत बढ़ी है। इसके लिए छवि के लिए कार्य करने पड़ते हैं। इस वर्ष सरसंघचालक के 4 कार्यक्रम हुए हैं। संघ कभी भी छवि के पीछे नहीं भागा।

















