पाञ्चजन्य के मंच पर आने को आप किस तरह देखते हैं? आपकी विचारधारा और पाञ्चजन्य की विचारधारा में कितना साम्य है?
अटल बिहारी वाजपेयी जी की दो बातें मुझे बहुत महत्वपूर्ण लगती हैं। वे कहते थे कि राजनीति में शब्द हथियार का काम करते हैं और सरकारें आती-जाती रहेंगी, देश रहना चाहिए। हर वह व्यक्ति जो देश को बचाने और आगे बढ़ाने में लगा हुआ है, हम उसके साथ हैं। विचारधारा अलग-अलग हो सकती है, लेकिन देश किसी के लिए अलग नहीं हो सकता। पाञ्चजन्य जिस परिस्थिति में प्रकाशित होना शुरू हुआ, वह भी देश के संकट का समय था। मैं हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को संस्कृति के संदर्भ में देखता हूं। मेरा एक मित्र है। मैं उससे पूछता था कि हिंदू राष्ट्र से तुम्हारा क्या मतलब है? उसने कहा कि लंदन जाओ तो वहां यहूदी, ईसाई और हिंदू नागरिकों को उनके पहनावे से पहचान सकते हो? मैंने कहा, नहीं। वहां सब एक जैसा पहनावा पहनते हैं। उसने कहा, बस यही हिंदू राष्ट्र है, अगर विचारधारा इतनी व्यापक है कि सबको स्वीकार करे तो उसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
क्या आप स्वयं को भारतीय परंपरा और संस्कृति की उस विचारधारा के करीब पाते हैं, जिसे पाञ्चजन्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा आगे बढ़ाते हैं?
बिल्कुल पाता हूं। अटल जी का शासन देखिए। ‘गोल्डन क्वाड्रीलैटरल’ और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कितना बढ़ावा दिया। उन्होंने पाकिस्तान जैसे शत्रु देश के साथ भी सौहार्दपूर्ण व्यवहार किया, उसे विकास के रास्ते पर आने की बात कही। हालांकि पाकिस्तान ने अपनी आदत के अनुसार बाद में फिर धोखा दिया। यदि किसी देश को राजनीतिक शक्ति बनना है तो सबसे पहले उसे आर्थिक शक्ति बनना होगा। जर्मनी 1871 में, इटली 1870 में, जापान 1867 में और अमेरिका 1787 में आधुनिक राष्ट्र के रूप में सामने आए। अमेरिका की शुरुआती स्थिति भी बहुत कमजोर थी, लेकिन उसने आर्थिक शक्ति बनने पर ध्यान दिया और आज वह महाशक्ति है। चीन भी उसी रास्ते पर चला और आर्थिक शक्ति बना।

आपके लिए शिक्षा का वास्तविक अर्थ क्या है?
शिक्षा का काम केवल जानकारी देना नहीं है। शिक्षा का काम विवेक पैदा करना है। बचपन में मैं अपने शिक्षक से पूछता था कि किताब से पैर लग जाए तो हम उसे माथे से क्यों लगाते हैं? शिक्षक कहते थे कि सरस्वती का सम्मान है। लेकिन मुझे लगता था कि इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण भी होगा। बाद में मेरे दर्शन के शिक्षक एच.एस. उपाध्याय जी ने मुझे आज्ञा चक्र और विवेक की अवधारणा समझाई। उन्होंने कहा कि किताबें मनुष्य के भीतर विवेक पैदा करती हैं। दुर्योधन के पास सब कुछ था, लेकिन विवेक नहीं था। भगवान कृष्ण स्वयंउसे समझाने गए, फिर भी वह नहीं समझा। इसलिए शिक्षा कासबसे बड़ा उद्देश्य विवेक पैदा करना है।
ओं के आंदोलनों को आप किस नजर से देखते हैं?
युवाओं की समस्याएं वास्तविक हैं। यह समस्या केवल आज की सरकार के कारण पैदा नहीं हुई है। यह समस्या पुरानी है। लेकिन आज युवाओं की सबसे बड़ी समस्या केवल नौकरी नहीं है। उनकी बड़ी समस्या दिशा का अभाव है। आज चीन में ऐसी कक्षाएं हैं जहां एआई पाठ्यक्रम का हिस्सा है। हमें भी बदलना होगा। यदि कक्षा 9 से 12 तक बच्चों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और नई तकनीकों का व्यवस्थित प्रशिक्षण दिया जाए तो 12वीं के बाद उनके पास रोजगार और कमाई के नए साधन होंगे। समय बदल गया है तो शिक्षा भी बदलनी चाहिए।
लोकतंत्र में आंदोलन की क्या सीमा होनी चाहिए?
आंदोलन कीजिए, अपनी बात रखिए, लेकिन हिंसा और अराजकता का रास्ता नहीं अपनाना चाहिए। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन का उदाहरण देखिए। जब चौरी-चौरा में हिंसा हुई और पुलिसकर्मियों की हत्या हुई तो गांधी जी ने आंदोलन वापस ले लिया। उनका मानना था कि हिंसा के साथ आंदोलन आगे नहीं बढ़ सकता। सरकार की आलोचना कीजिए, सवाल पूछिए, लेकिन मर्यादा बनाए रखिए। अराजकता मत फैलाइए। यदि सरकार गलत है तो चुनाव में उसे बदल दीजिए। लोकतंत्र में यही सबसे बड़ी शक्ति है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर आपकी क्या राय है?
राजनीतिक रूप से मैं नरेंद्र मोदी जी से कई मुद्दों पर असहमत हो सकता हूं, लेकिन एक बात की मैं हमेशा तारीफ करता हूं। एक सामान्य परिवार से आकर भारत का तीसरी बार प्रधानमंत्री बनना बहुत बड़ी उपलब्धि है। भारत में लंबे समय से राजनीति में वंशवाद का प्रभाव रहा है। ऐसे माहौल में एक सामान्य परिवार से आने वाला व्यक्ति लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनता है, यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि है।
आप रामराज्य को किस रूप में देखते हैं?
रामराज्य केवल किसी व्यक्ति के सत्ता में आने का नाम नहीं है। रामराज्य की अवधारणा में ऐसा शासक होना चाहिए जो अपनी निजी इच्छाओं से ऊपर उठ चुका हो और जिसकी प्राथमिकता जनता का कल्याण हो। रामायण में हनुमान जी का उदाहरण देखिए। सुग्रीव, विभीषण, नल-नील और अंगद भी भगवान राम के साथ थे। लेकिन हनुमान जी को विशेष सम्मान इसलिए मिला क्योंकि उनका पूरा जीवन राम के प्रति समर्पित था। जब सीता जी ने उन्हें मोतियों की माला दी तो हनुमान जी एक-एक मोती में राम को खोजने लगे। उनका पूरा जीवन राम में रमा हुआ था।
आज युवा सिविल सर्विस में जाना चाहते हैं, लेकिन शिक्षक नहीं बनना चाहते। इसका कारण क्या है?
समाज ने शिक्षक के सम्मान को कम किया है। आज युवाओं को लगता है कि सिविल सर्विस में पद, पैसा और सामाजिक प्रतिष्ठा अधिक है। इसलिए सबसे प्रतिभाशाली युवाओं का बड़ा हिस्सा शिक्षक बनने की ओर नहीं जाता। यदि शिक्षक को समाज में सर्वोच्च सम्मान और बेहतर सुविधाएं मिलेंगी तो प्रतिभाशाली युवा शिक्षा के क्षेत्र में आएंगे।
क्या कोचिंग संस्कृति शिक्षा व्यवस्था की विफलता का परिणाम है?
बिल्कुल। यदि 1960 के दशक के आईएएस अधिकारियों से बात करें तो उनमें से बहुत से लोग किसी कोचिंग में नहीं गए थे। उस समय स्कूल और कॉलेज की कक्षाओं में अच्छी पढ़ाई होती थी। शिक्षक पढ़ाते थे, वरिष्ठ विद्यार्थी कनिष्ठों को पढ़ाते थे और हॉस्टल में चर्चा का माहौल होता था। आज वह वातावरण खत्म हो गया है। इसलिए कोचिंग का विस्तार हुआ।
कोचिंग संस्कृति से निकलने का रास्ता क्या है?
शिक्षा में तीन चीजें वापस लानी होंगी-मनन, चर्चा और ज्ञान का दान। आपने कोई चीज पढ़ी। उस पर मनन किया। फिर किसी दूसरे के साथ उस पर चर्चा की। इससे ज्ञान बढ़ता है। इसके बाद जो आपने सीखा, उसे किसी और को समझाइए। धन बांटने से कम होता है, लेकिन ज्ञान बांटने से बढ़ता है। यदि शिक्षा व्यवस्था में यह संस्कृति वापस आ जाए तो कोचिंग की जरूरत अपने आप कम हो जाएगी।

















