राजस्थान की प्रसिद्ध लोक गायिका बेगम बतूल मांड शैली और भजन गायन के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। उनका बचपन नागौर जिले के केराप गांव में बीता। सांगीतिक मिरासी परिवार में जन्मी बेगम बतूल को संगीत विरासत में मिला है। उनके परिवार में मांड गाने की परंपरा रही है, इसलिए वह घर में ही उन गीतों को सुनकर ही आत्मसात करती रहीं।
भारतीय कला जगत में मान्यता है कि देख्या-सिख्या-परख्या यानी देखो, सीखो और परखो। आमतौर पर लोक संगीत को सुन-सुन कर सीखने का ही प्रचलन रहा है। छुटपन में बेगम बतूल को राजस्थानी भजन बहुत लुभावने लगते थे, सो आस-पड़ोस के मंदिरों में गाए जाने वाले भजनों को सरलता से कंठस्थ कर लिया और धीरे-धीरे उन्हें अपने सुरीले आवाजों में गाने लगीं।
बेगम बतूल ने मांड और भजन गायन के साथ-साथ तबला और ढोलक बजाना भी सीखा है। सच तो यह है कि एक महिला कलाकार का संगीत के चहुंमुखी अंग में निपुण होना बहुत बड़ी बात है। यह उनकी लगन का ही परिणाम है कि बेगम बतूल घर के आंगन से निकलकर विश्व के मंचों पर स्वयं को स्थापित कर पाईं हैं।
सुशासन संवाद-राजस्थान के दौरान उन्होंने अपनी प्रस्तुति का आरंभ प्रथम पूज्य देवता गणपति की वंदना से किया। इसके बोल थे-‘घर आओ म्हारा प्यारा गजानन’। उनके द्वारा प्रस्तुत दूसरा भजन था-‘बोलो सो राम-राम मीठी-मीठी वाणी रे’। उन्होंने एक और भजन प्रस्तुत किया, जिसमें राम और लक्ष्मण के वन गमन प्रसंग का वर्णन था। यह भजन था-‘आगे-आगे राम चलत है, पीछे लछमन भाई रे’।
उन्होंने कई लोक गीतों को भी अपनी प्रस्तुति में शामिल किए। इनमें कुछ थे-‘बागा में तो फूल रही फुलवा चंपा’, ‘बाजै छै, बाजै छै नौबत बाजै छै’, ‘तू मत जाना कान्हा गली’ और ‘संग सहेला रे’। उनकी गायकी में मधुरता, सरसता के साथ-साथ राजस्थानी भाषा की सोंधी महक थी। लोक का ठेठपन और ठहराव उनकी गायकी में बखूबी उभर कर आया। वास्तव में, उन्होंने अपनी कला के माध्यम लोक आस्था, विश्वास और सामुदायिक एकता का परिचय दिया। बेगम बतूल जैसी लोकगायिका ने ही लोक परंपरा को अपनी कला के माध्यम से अक्षुण्ण रखा है।
देश के विभिन्न मंचों के माध्यम से राजस्थान के लोक संगीत को उन्होंने जन-जन तक पहुंचाया है। वह फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्विट्जरलैंड, अमेरिका, ब्रिटेन सहित पचास देशों की सांगीतिक यात्राएं कर चुकी हैं। इतना ही नहीं, वह अंतरराष्ट्रीय फ्यूजन लोक संगीत बैंड-क्लेजमर की भी सदस्य हैं। इस बैंड के माध्यम से वह अन्य भाषाओं के लोक कलाकारों के साथ मिलकर काम करने से उन्हें और बेहतर ढंग से संगीत को समझने और कला की प्रस्तुति के अवसर मिले हैं। इस तरह के प्रयोगों से उन्होंने अपने संगीत के अनुभव को समृद्ध किया है। इससे उनकी कला में एक और नया आयाम जुड़ा है।
बतूल बेगम को 2021 में नारी शक्ति सम्मान और 2025 में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया। उन्हें फ्रांस और ट्यूनीशिया की सरकारों के द्वारा भी सम्मानित किया गया है। यह भारतीय कला जगत के लिए बहुत गर्व की बात है। इस दौरान राजस्थान साइकिलिंग एसोसिएशन की अध्यक्ष सारिका चौधरी, सुप्रीम मोटर्स के अशोक अग्रवाल के साथ कई गणमान्य अतिथि उपस्थित थे।
















