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राहुल गांधी के निशाने पर क्यों हैं भारतीय परिवार?

2 अगस्त 2026 को पुणे में कांग्रेस के 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में उन्होंने Smash Patriarchy के नारे लगाए। 'Diamantaling Global Hindutva' की टर्म पर राहुल गांधी ने मनुस्मृति को लेकर वामपंथियों की स्क्रिप्ट पढ़ी।

Written byकृष्णमुरारी त्रिपाठी अटलकृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल — edited by Mahak Singh
Aug 24, 2026, 11:40 am IST
inभारत
Rahul Gandhi

राहुल गांधी

Smash ‘Hindutva’-Smash ‘Brahminwad’ के भारत विखंडन के ग्लोबल एजेंडे की तर्ज़ पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी  वामपंथियों वाला Smash Patriarchy अभियान लेकर आए। 22 अगस्त 2026 को पुणे में कांग्रेस के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में उन्होंने Smash Patriarchy के नारे लगाए। ‘Diamantaling Global Hindutva’ की टर्म पर राहुल गांधी ने मनुस्मृति को लेकर वामपंथियों की स्क्रिप्ट पढ़ी। जोशीले अंदाज़ में ‘भारतीय नारी’ / परिवार को लेकर कुंठात्मक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि- “मैं यहां मनुस्मृति का उद्धरण देना चाहूंगा, जो स्पष्ट रूप से कहती है कि बचपन में एक महिला को अपने पिता के अधीन रहना चाहिए, युवावस्था में वह अपने पति की होती है और जब उसका पति मर जाता है तो वह अपने बेटों की होती है।”

राहुल गांधी की हिंदू परिवारों पर निशानेबाज़ी

फिर इसे राहुल गांधी ने शर्मनाक बताते हुए ‘कश्मीर से आज़ादी’ वाली लाइन पर भारतीय नारी को व्यक्तिगत (‘इंडिविजुअल’) पहचान की नारेबाज़ी शोशेबाजी करते नज़र आए । सत्य तो ये है कि राहुल गांधी की व्याख्या और दृष्टि दुर्भावना पूर्ण है। भारतीय परिवार में हर रिश्ते परस्पर पूरक और अन्योन्याश्रित हैं‌। गरिमा, आदर्श, आदरभाव और समन्वय के आधार पर सर्वोच्च जीवन मूल्यों को प्रकट करते हैं। सबसे महत्वपूर्ण है राहुल गांधी के मूल मंतव्य को जानना। यद्यपि राहुल गांधी केवल टारगेट करते हैं तो सिर्फ़ हिन्दू धर्म को, हिन्दू परिवारों को। क्योंकि अपने किसी उद्धरण में राहुल गांधी- कुरान, हदीस, बाइबिल; इत्यादि का संदर्भ या उद्धरण देने की हिम्मत नहीं कर सकते हैं।अन्यथा उन पर ‘मजहबियों’ का डंडा चल जाएगा।

‘भारतीय परिवार’ के खिलाफ़ वैचारिक हमला

राहुल गांधी जब ये सब कह रहे थे तो उसी समय मुस्लिम समाज से आने वाली महिलाएं हिजाब/ बुर्के में दिखीं।जबकि स्वतंत्रचेता हिन्दू युवतियां/ महिलाएं राहुल गांधी को सुनती नज़र आईं। किन्तु राहुल गांधी के निशाने पर  ‘भारतीय परिवार’  व्यवस्था रही। राहुल गांधी का ये राजनीतिक अभियान कम बल्कि ‘भारतीय परिवार’ के ख़िलाफ़ घोषित अभियान ज़्यादा समझ आता है। ये ठीक उसी के एक क़दम आगे की लाइन है जैसे JNU/AMU/जादवपुर विश्वविद्यालय आदि में हमेशा से होता रहा है। भारत से बाहर अमेरिका समेत कई देशों में भारतीय संस्कृति और मानबिन्दुओं के ख़िलाफ़ अभियान चलाया जाता रहा है।

वस्तुत : राहुल गांधी का ये भारतीय परिवार को ख़त्म करने का ऐलान है। ये कम्युनिज्म का वो ज़’हर है जो राहुल गांधी के सिर चढ़कर बोल रहा है। राहुल गांधी भारतीय परिवार में ‘स्त्री’ को ‘शक्ति’ के रूप में नहीं पचा पा रहे हैं। उन्हें ये नहीं मालूम कि भारतीय परिवार में- माँ, बहन, बेटी, पत्नी इन सबका अपना विशिष्ट स्थान होता है। इनके बिना परिवार नहीं हो सकते हैं। क्या ये राहुल गांधी को नहीं पता है? क्यों? ये इसलिए क्योंकि – ‘स्त्री को केवल देह’ के तौर पर परिभाषित करने वाले वामपंथियों ने पूरी कांग्रेस की वैचारिकी को हाईजैक कर लिया है। राहुल गांधी सिर्फ़ वही बोल रहे हैं। जो वामपंथी वर्षों से भारतीय जीवन मूल्य, भारतीय संस्कृति, परिवार के ख़िलाफ़ घोषित युद्ध में करते आ रहे हैं। क्योंकि नारों में, रील्स में तो ये इंडिविजुअल पहचान बड़ी आकर्षक लगती है।जबकि राहुल गांधी के इस अभियान का स्पष्ट उद्देश्य है ‘स्त्री’ को केवल देह और उपभोग की वस्तु के रूप में परिभाषित करना। भारतीय संस्कृति की आधारशिला ‘परिवारों की शक्ति’ को नष्ट करना। पश्चिमी देश यही चाहते हैं कि भारतीय परिवार को अगर नष्ट कर दिया जाए तो भारत को शनै:-शनै: नष्ट करना आसान हो जाएगा।

भारतीय परंपरा में नारी-सम्मान की शाश्वत दृष्टि

भारतीय / हिन्दू परिवार सेमेटिक मज़हबों की भांति किसी एक पुस्तक या धर्मग्रंथ के आधार पर नहीं चलते हैं। भारतीय संस्कृति में अनेकानेक धर्मग्रंथ हैं।सतत चलने वाली ज्ञान परंपरा है। जो किसी भी प्रकार के भेदभाव को नहीं मानती है। राहुल गांधी ने जिस मनुस्मृति के नाम पर वामपंथियों की स्क्रिप्ट पढ़ी। लांछित करने का कुकृत्य किया। उसी मनुस्मृति का एक श्लोक देखिए- “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ॥”

अर्थात् : जहां स्त्रियों की पूजा की जाती है और उनका आदर किया जाता है। उस स्थान पर देवता सदा निवास करते हैं और प्रसन्न रहते हैं जहाँ ऐसा नहीं होता है, वहाँ सभी धर्म और कर्म निष्फल होते हैं।
(मनुस्मृति ३.५६ )

इसी संदर्भ में मनुस्मृति को लेकर ये विष-वमन कब से और क्यों चलाया जा रहा है? इसको लेकर सुप्रसिद्ध चिंतक और विचारक अभिजीत सिंह लिखते हैं कि -“मनुस्मृति कोई आज उनके निशाने पर नहीं आई। ये बहुत पहले से चल रहा है।देश में अंग्रेजों के आने के बाद भारत तोड़ने के जो सूत्रधार बने उनके निशाने पर सबसे अधिक महर्षि मनु और ‘मनुस्मृति’ आई। मनु को गालियाँ दी गई, मनुस्मृति जलाए गए, ब्राह्मणों को ‘मनुवादी’ कहकर कोसा गया।आपने कभी सोचा है कि मनु उनके हमलों का शिकार क्यों बने? मनुस्मृति ही क्यों जलाई गई ? जबकि हिन्दू समाज के अंदर मनुस्मृति के अलावा आज सौ से अधिक स्मृतियाँ यथा याज्ञवल्क्य, अत्रि, बिष्णु, हारीत, औशनस, अंगिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, वृहस्पति, बिष्णु, पराशर, व्यास, शंख, देवल, लिखित, गौतम, शातातप, वशिष्ठ, प्रजापति मौजूद हैं?”

इन प्रश्नों के मूल के बारे में अभिजीत सिंह लिखते हैं कि-

“इसकी वजह ये है कि घरवापसी, स्वदेशी और आत्मबोध के मन्त्र-प्रणेता महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपने ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में ‘मनुस्मृति’ को ही मूल आधार बनाया। अस्पृश्यता का निवारण हो, समाज में न्याय का प्रतिपादन हो, नारी सम्मान की बात हो, राष्ट्र के गौरव की स्थापना हो, दूसरे मतों का खंडन हो सबके सूत्र महर्षि ने मनुस्मृति से ही निकाले और यही मनुस्मृति से इनके चिढ़ने का मूल कारण है। अब तक बचाव की मुद्रा में रहने वाले हिन्दू समाज को महर्षि दयानंद ने मनुस्मृति को आधार बनाकर बौद्धिक हमलावर बना दिया । उन्होंने विभिन्न मतों और मज़हबों के मूल पर ही चोट कर दी तो इनकी कुंठा स्वाभाविक थी। मनु ने सदाचार की महिमा गाई, चरित्र उज्जवल रखने का आदेश दिया‌ । इसीलिए ज़ाहिर है कि जैसा ये यौन-कुंठित समाज – हिन्दू अतीत को दिखाना चाहते हैं वो ये सिद्ध नहीं कर पाएंगे।”

ये तो रही मनुस्मृति के ख़िलाफ़ घ्रणा के दुष्प्रचार की बात किन्तु राहुल गांधी उसी अभियान को बढ़ा रहे हैं जो कभी JNU की School of Language, Literature and Culture Studies की 2nd building, 3rd floor पर 2022 में लिखा गया- “Brahmino-Baniyas, we are coming for you! We will avenge” । वहीं 2022 में JNU के School of International Studies के 1st floor में लिखा गया- “Brahmins Leave The Campus.”

निशाना सिर्फ़ राजनीति नहीं, भारतीय परिवार-व्यवस्था

ये सब उसी पूर्वपीठिका के स्पष्ट संदेश समझ आते हैं जिसे टुकड़े-टुकड़े गैंग/ दिमागी नक्सली गैंग बारंबार उच्चारित करता रहा है कि—“ब्राह्मणवाद की क़ब्र खुदेगी JNU की धरती पर। हिंदुत्व की कब्र खुदेगी JNU की धरती पर। ” यानी भारतीय समाज का संपूर्ण रूप से विभाजन करना उनका उद्देश्य है। राहुल गांधी ने 22 अगस्त को पुणे में कोई बचकाने तरीके या सामान्य राजनीतिक कार्यक्रम के ज़रिए ‘भारतीय परिवारों के ख़िलाफ़’ मैसेज नहीं दिया है। बल्कि ये सुनियोजित रूप से उन्होंने ‘भारत’ को लेकर अपना मूल उद्देश्य प्रकट किया है। वस्तुतः राहुल गांधी जो कह रहे हैं, उसमें भारत के विषय में उनका मन्तव्य क्या है? यह स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है। उनके वक्तव्य और राजनीतिक अभियान/ नारे/स्क्रिप्ट ये सब इस बात की प्रमाण हैं कि — उनका निशाना केवल किसी राजनीतिक दल या विचारधारा तक सीमित नहीं है। बल्कि उनके निशाने पर भारत की परिवार-व्यवस्था और उसके मूल्यादर्श हैं। समन्वय और सद्भाव है।

दूसरा यह भी सत्य ही है कि सोने का चम्मच लेकर पैदा हुए राहुल गांधी जिस परिवार से आते हैं, वहाँ भारतीय परिवार-व्यवस्था के पारंपरिक मूल्य-बोध का अनुभव कितना रहा होगा? क्योंकि जहां ‘Give And Take’ का पॉलिसी रही हो। जहां एक छत के नीचे कभी पूरा परिवार न रहा हो। जहां रिश्तों और संबंधों को ‘बिज़नेस’ के तौर पर देखने और परिभाषित करने की पद्धति रही हो। रिश्ते जहां राजनीतिक खेल के आगे मात खाते रहे हों। वहां भारतीय जीवन और भारतीय परिवारों को लेकर भला कैसी सोच उत्पन्न होगी?

क्योंकि जो व्यक्ति भारतीय परिवार में पला-बढ़ा है, उसे यह सहज रूप से पता होता है कि भारत में परिवार केवल व्यक्तियों का समूह नहीं होता है। बल्कि रिश्तों, दायित्वों, स्नेह, त्याग, समन्वय और संस्कारों से निर्मित एक जीवंत संस्था है। राहुल गांधी जिन रिश्तों को Smash Patriarchy के नाम पर अपमानित और कलंकित करने का अभियान चला रहे हैं। उन्हें यह नहीं मालूम है कि – भारतीय परिवार मूल्यबोध और श्रद्धा और आदर के केंद्र हैं।
भारतीय मानस वो है जो ये गाता और जीता है कि- “चन्दन है इस देश की माटी, तपोभूमि हर ग्राम है।
हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा-बच्चा राम है॥”

भारतीय परिवार: रिश्तों, संस्कारों और नारी-सम्मान की शक्ति

राहुल गांधी को ये पता होना चाहिए कि- भारतीय परिवार में बहन वह संबंध है, जिसमें व्यक्ति स्नेह और आत्मीयता का अनुभव करता है। माँ के समतुल्य बोध पाता है। माँ मातृत्व की अनुभूति का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। जहां माँ के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। बेटी जीवन के एक नए आयाम का प्रतिनिधित्व करती है। जहां हर स्त्री को माता के रूप में श्रद्धा के साथ देखा जाता है। भारत वो है जहां नवरात्र के समय कन्या-पूजन जैसी परंपराएँ हमारी सांस्कृतिक चेतना में गहरे तक रची-बसी हैं। हर बिटिया के चरण स्पर्श करने वाले माता-पिता, भाई, काका-फूफा, मौसा जैसे सभी रिश्ते हैं। भारतीय परिवार वो है जहां ‘पत्नी’ भारतीय परिवार-व्यवस्था में जीवन-सहचरी है। अर्धांगिनी है। अर्थात् परिवार में स्त्री के बिना पुरुष और पुरुष के बिना स्त्री अधूरी है। दोनों परस्पर पूरक हैं।अन्योन्याश्रित हैं। इनमें कोई भेद की दृष्टि या वर्चस्व की दृष्टि नहीं है। दोनों के पारस्परिक भागीदारी के बिना परिवार की संकल्पना अधूरी  है। ये संबंध एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। भारतीय परिवार में कहीं कोई आइडेंटिटी क्राइसेस नहीं है। जबकि राहुल गांधी की उत्पत्ति यूरोप/ पश्चिम के जिस ‘कल्चर’ की है। वहां ये सबकुछ है ही नहीं। वहां स्त्री सिर्फ़ देह है‌। उपभोग की वस्तु है। वहां किसी भी संबंध की भारतीय जीवन की भांति कोई गरिमा नहीं है। वहां Multiple Husband And Wife का Concept है। जबकि भारतीय परिवार ‘सप्तपदी’ के वचनों के साथ केवल सात जन्म ही नहीं बल्कि जन्म-जन्मांतर की मान्यता पर विश्वास करते हैं। जीवन को जीते हैं। ऐसे में राहुल गांधी का भारतीय परिवार को ख़त्म करने का अभियान ; घोषित रूप से भारत के ख़िलाफ़ अभियान है। यह हमारे मूल्यादर्शों, संस्कारों और सर्वोच्च जीवन प्रणाली के मानबिन्दु पर ‘Global Dismantling Hindutva’ के अंतर्गत किया गया वैश्विक हमला है। जिसे राहुल गांधी अंज़ाम दे रहे हैं।

समानता के सवाल पर राहुल गांधी से आत्ममंथन क्यों नहीं?

अब आते हैं राजनीति प्रश्न पर : राहुल गांधी जिस स्त्री-समानता और स्त्री-अधिकार की बात करते हैं । उसको लेकर क्या  उनसे ये सवाल नहीं होने चाहिए? यदि वे राजनीतिक और सामाजिक जीवन में समान अवसर के इतने बड़े समर्थक हैं, तो क्या उन्होंने अपने ही परिवार और कांग्रेस संगठन में उस समानता का आदर्श प्रस्तुत किया है? यदि ऐसा है, तो फिर उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस का अध्यक्ष क्यों नहीं बनाया गया? कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी ही प्रधानमंत्री के उम्मीदवार क्यों बनाए जाते हैं? मल्लिकार्जुन खड़गे अध्यक्ष हैं और राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। ऐसे में परिवार के भीतर राजनीतिक अवसरों और समानता के प्रश्न पर राहुल गांधी को क्या आत्ममंथन नहीं करना चाहिए? इतना ही नहीं कांग्रेस में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के अलावा क्या किसी दूसरी महिला को कांग्रेस अपना अध्यक्ष बनाएगी? क्या कांग्रेस की ओर से इनके अलावा राहुल की शब्दावली के अनुसार कोई ‘इंडिविजुल’ स्त्री 2029 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार होगी? ऐसे में आवश्यक ये है राहुल गांधी ने जो कुछ बोला-कहा, नारेबाज़ी की। वो सब केवल हिन्दू -हिन्दुत्व और भारतीय परिवारों के ख़िलाफ़ वैश्विक अभियानों का राजनीतिक ‘टीजर’ है। संभवतः इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि आज की कांग्रेस, माओवादी मुस्लिम लीगी कांग्रेस (MMC) बन गई है। जो सिर्फ़ भारतीय जीवन मूल्यों, संस्कृति और संस्कारों के विरुद्ध अपना अभियान चलाती है। क्या सत्ता की छटपटाहट इतनी होनी चाहिए कि- आप भारतीय समाज को ही विभाजित कर दें? ऐसे में आवश्यक ये है समाज, संत समाज, घर-परिवारों में इस दिशा पर संवाद हों। हम अपने बच्चों को बताएं कि हर राजनीतिक नारे जो देखने में बड़े फैशनेबल लगते हैं। किन्तु उनके पीछे का निहितार्थ क्या है? ये जानना आवश्यक है। भारतीय समाज सशक्त है। वो जानता है कि किसी भी विभाजन का प्रत्युत्तर उसे कैसे देना है।

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