विशाखापट्टणम में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तीन दिवसीय समन्वय बैठक में राष्ट्र, समाज, सामाजिक चुनौतियों और कार्य की भावी दिशा को लेकर व्यापक विचार-विमर्श हुआ। बैठक के समापन पर आयोजित पत्रकार वार्ता में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर सह सरकार्यवाह श्री मुकुंदा सी. आर. ने दिए। प्रस्तुत हैं मुख्यांश-
व्यवस्था में भ्रष्टाचार और विभिन्न कमियों को लेकर बैठक में क्या चर्चा हुई?
इस विषय को केवल भ्रष्टाचार तक सीमित करके नहीं देखा गया। व्यवस्था में जहां-जहां कमियां हैं, उन्हें ठीक करने के लिए सरकार के साथ-साथ समाज की जागरूकता भी आवश्यक है। नीट जैसे विषय हों अथवा अन्य व्यवस्थागत समस्याएं, इनके कारण युवाओं में अपने भविष्य को लेकर चिंता उत्पन्न होती है। इस चिंता को समझना और उसका समाधान करना आवश्यक है। केवल विरोध या व्यवधान से समाधान नहीं होगा। सकारात्मक और रचनात्मक दृष्टि से व्यवस्था में सुधार के लिए सरकार और समाज-दोनों को मिलकर प्रयास करना चाहिए।
युवा पीढ़ी में संस्कृति और परंपराओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए संघ क्या करेगा?
संघ का कार्य मुख्य रूप से युवाओं के बीच व्यापक रूप से चल रहा है। इस वर्ष लगभग 21,000 युवा स्वयंसेवकों ने 21 दिवसीय प्रशिक्षण वर्गों में भाग लिया और दैनिक शाखाओं की उपस्थिति में 60 प्रतिशत से अधिक युवा हैं। युवाओं में संस्कार और सांस्कृतिक मूल्यों का निर्माण केवल भाषणों या पोस्टरों से नहीं हो सकता। उनके साथ निरंतर जुड़ना, उनकी भावनाओं को समझना, संवाद करना तथा भारत की महानता और सांस्कृतिक विरासत को अनुभव के स्तर पर उनके सामने रखना आवश्यक है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, बजरंग दल, हिंदू जागरण मंच सहित अनेक संगठनों के माध्यम से युवकों और युवतियों के बीच कार्य किया जा रहा है। आज की युवा पीढ़ी की क्षमता और सकारात्मक प्रतिसाद को देखते हुए हमें विश्वास है कि भारत का भविष्य युवाओं के हाथों में सुरक्षित है। इसके साथ ही धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक संगठनों को भी युवाओं में सांस्कृतिक मूल्यों के संवर्धन के लिए मिलकर कार्य करने का आह्वान किया गया।
सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत की प्रस्तावित अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन यात्रा का उद्देश्य क्या है?
यह यात्रा संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर व्यापक वैश्विक संपर्क का हिस्सा है। इसके तीन प्रमुख उद्देश्य हैं- पहला-भारत, हिंदू समाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंध में विश्व में व्याप्त भ्रांतियों और दुष्प्रचार के बीच तथ्यपरक एवं सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना। दूसरा-भारत के ऋषि-मुनियों द्वारा दिए गए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और वैश्विक एकात्मता के संदेश को विश्व के विभिन्न समाजों तक पहुंचाना। तीसरा-विश्व के विभिन्न देशों में रहने वाले हिंदुओं और भारतीय मूल के लोगों के हितों एवं अधिकारों के विषय में वहां के मुख्यधारा समाज से संवाद बढ़ाना। इस क्रम में श्री मोहनराव भागवत जी न्यूयॉर्क में Universal Oneness कार्यक्रम तथा टोरंटो और लंदन में सामुदायिक नेतृत्व के कार्यक्रमों में सहभागिता करेंगे।
पंच परिवर्तन में पर्यावरण संरक्षण को लेकर केवल प्रस्ताव या संकल्प से आगे व्यावहारिक रूप से क्या किया जा सकता है?
पंच परिवर्तन की कल्पना लगभग तीन वर्ष पूर्व संघ के शताब्दी वर्ष की योजना बनाते समय की गई थी। हमारा मानना है कि किसी भी व्यवस्थागत परिवर्तन से पहले सामाजिक परिवर्तन आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण केवल प्रकृति को बाहर से बचाने का विषय नहीं है। भारतीय दृष्टि में मनुष्य स्वयं इस संपूर्ण सृष्टि और पर्यावरण का अभिन्न अंग है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति और परिवार अपने दैनिक जीवन में कम से कम तीन स्तरों पर योगदान कर सकता है-जल का विवेकपूर्ण उपयोग, प्लास्टिक के उपयोग को कम करना और अपने आसपास हरियाली बढ़ाना। केवल प्रस्ताव पारित करने से परिवर्तन नहीं आएगा। जीवनशैली में परिवर्तन आवश्यक है। इसी संदेश को परिवारों, गांवों और देश के दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। व्यक्ति और परिवार के व्यवहार में आया छोटा परिवर्तन भी व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय परिवर्तन का आधार बन सकता है।

















