संकटों की पहली पंक्ति, फैसलोंकी आखिरी पंक्ति क्यों?
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संकटों की पहली पंक्ति, फैसलों की आखिरी पंक्ति क्यों?

बहुध्रुवीय दुनिया केवल नए समूह बना लेने से नहीं बनती। अमेरिका और चीन जैसे शक्ति केंद्र अभी भी अर्थव्यवस्था, तकनीक, वित्त और सुरक्षा पर गहरा प्रभाव रखते हैं। इसलिए भारत को अपनी आर्थिक क्षमता, तकनीकी शक्ति, विनिर्माण, रक्षा क्षमता और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को बढ़ाना होगा।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Sep 26, 2026, 10:02 pm IST
inसम्पादकीय

संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान 22 सितंबर को विदेश मंत्री एस. जयशंकर की टिप्पणी ने ग्लोबल साउथ की उस पुरानी शिकायत को नए शब्द दिए हैं, जिसे विकासशील देश दशकों से विभिन्न मंचों पर उठाते रहे हैं। उन्होंने कहा कि ग्लोबल साउथ संकटों की पहली पंक्ति में खड़ा दिखाई देता है, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया में पीछे है। यह केवल कूटनीतिक असंतोष नहीं, बल्कि आज की विश्व व्यवस्था की संरचना पर एक गंभीर प्रश्न है।

ग्लोबल साउथ उन देशों के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द है जो मुख्यतः एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में हैं। यह देश ऐतिहासिक रूप से उपनिवेशवाद, कम औद्योगिकीकरण और विकास संबंधी चुनौतियों से जुड़े रहे हैं। इनमें भारत भी शामिल है। ये देश विकास, गरीबी, व्यापार, जलवायु और वैश्विक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर सहयोग करते हैं।

दुनिया का आर्थिक, तकनीकी और उत्पादन भूगोल तेजी से बदल रहा है। एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमेरिका वैश्विक वृद्धि के बड़े केंद्र बन रहे हैं, लेकिन जलवायु संकट, महंगी ऊर्जा, खाद्य असुरक्षा, ऋण और युद्धों का भार भी मुख्यतः ग्लोबल साउथ पर है। फिर भी वैश्विक संस्थाओं की निर्णय संरचनाओं में 20वीं सदी के शक्ति-संतुलन की छाप अब भी दिखाई देती है। पूंजी तक पहुंच, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीक, व्यापार, आपूर्ति शृंखलाएं और अंतरराष्ट्रीय वित्त हर क्षेत्र में यह सवाल सामने आता है कि जोखिम और अधिकार का वितरण क्या एक समान है?

भारत का तर्क किसी एक देश का विरोध नहीं है। अमेरिका और यूरोप के साथ भारत साझेदारी बढ़ाता है, रूस से पुराने संबंध बनाए रखता है, खाड़ी देशों से ऊर्जा और निवेश संबंध मजबूत करता है तथा अफ्रीका और लातिनी अमेरिका के साथ विकास सहयोग बढ़ाता है। साथ ही, ब्रिक्स जैसे मंचों पर वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग करता है। अत: भारत के रुख को केवल पश्चिम विरोध के रूप में देखना वास्तविकता को छोटा करना होगा। भारत ऐसी व्यवस्था चाहता है, जिसमें शक्ति कुछ पुराने केंद्रों में स्थायी रूप से बंद न रहे और उभरती अर्थव्यवस्थाएं केवल नियम मानने वाली पक्ष न बनें।

भारत की इस सोच के केंद्र में उसकी सभ्यतागत दृष्टि भी है। जी-20 के दौरान भारत ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को दुनिया के सामने रखा। यदि दुनिया वास्तव में एक परिवार है तो संकट का बोझ और निर्णय का अधिकार एक ही दिशा में नहीं बह सकते। महामारी, महंगी ऊर्जा, खाद्य संकट, ऋण दबाव और जलवायु आपदाओं का सबसे गहरा असर जिन देशों पर पड़ता है, उन्हें समाधान तय करने वाली मेज पर भी पर्याप्त स्थान मिलना चाहिए।

ग्लोबल साउथ कोई एकरूप राजनीतिक गुट नहीं है। भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, छोटे द्वीपीय देश, अफ्रीकी अल्प विकसित देश और तेल निर्यातक अर्थव्यवस्थाओं की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। फिर भी ऊंची पूंजी लागत, बाहरी ऋण, तकनीक तक सीमित पहुंच, जलवायु जोखिम और वैश्विक संस्थाओं में सीमित प्रभाव जैसे प्रश्न अनेक देशों को एक साझा मंच की ओर खींचते हैं। इसे किसी सैन्य या वैचारिक गुट के बजाय साझा हितों वाले लचीले समूह के रूप में समझना अधिक उचित है।

सबसे स्पष्ट असमानता वित्तीय व्यवस्था में दिखती है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक बहुपक्षीय संस्थाएं हैं, लेकिन उनकी मतदान व्यवस्था समान नहीं है। सितंबर 2026 के आंकड़ों के अनुसार आईएमएफ में अमेरिका की मतदान हिस्सेदारी लगभग 16.49 प्रतिशत है, जबकि भारत की हिस्सेदारी उसकी विशाल जनसंख्या और बढ़ते आर्थिक महत्व की तुलना में काफी छोटी है। इसलिए भारत का आग्रह संस्थाओं को समाप्त करने का नहीं, बल्कि उनकी निर्णय संरचना को बदलती आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप करने का है।ऋण संकट भी इसी असंतुलन का दूसरा पहलू है। संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास संस्था के अनुसार, विकासशील देशों का बाहरी ऋण 2025 में 12.3 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच गया। ऋण की लागत, ब्याज दर और भुगतान अवधि विकास के लिए उपलब्ध संसाधनों को सीधे प्रभावित करती हैं। यदि ऋण चुकाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे या जलवायु अनुकूलन पर खर्च घटाना पड़े तो विकास का चक्र कमजोर होता है। हालांकि हर ऋण शर्त को भेदभाव कहना भी उचित नहीं होगा। आर्थिक अनुशासन की अपनी आवश्यकता है। प्रश्न यह है कि समायोजन का पूरा बोझ किस पर पड़ता है?

बहुपक्षीय व्यवस्था की दूसरी बड़ी परीक्षा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद है। चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका उसके स्थायी सदस्य हैं। यह संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के शक्ति-संतुलन से निकली थी। भारत कई बार अस्थायी सदस्य रहा है, लेकिन स्थायी सदस्य नहीं बना। अफ्रीका का भी कोई देश स्थायी सदस्य नहीं है। जब एशिया और अफ्रीका आज विश्व की जनसंख्या और भविष्य की वृद्धि में इतनी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं, तब प्रतिनिधित्व का प्रश्न स्वाभाविक है। लेकिन सुधार का रास्ता आसान नहीं है। नए स्थायी सदस्यों का चयन, वीटो का प्रश्न, क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा और मौजूदा स्थायी सदस्यों के हित इसे जटिल बनाते हैं। इसलिए भारत की मांग के पीछे सिद्धांत स्पष्ट हो सकता है, लेकिन उसे लागू करना शक्ति-राजनीति से मुक्त नहीं है।

सी. राजा मोहन का विश्लेषण इस बहस में एक जरूरी सावधानी जोड़ता है। बहुध्रुवीय दुनिया केवल नए समूह बना लेने से नहीं बनती। अमेरिका और चीन जैसे शक्ति केंद्र अभी भी अर्थव्यवस्था, तकनीक, वित्त और सुरक्षा पर गहरा प्रभाव रखते हैं। इसलिए भारत को अपनी आर्थिक क्षमता, तकनीकी शक्ति, विनिर्माण, रक्षा क्षमता और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को बढ़ाना होगा। यही रणनीतिक स्वायत्तता का व्यावहारिक अर्थ है।

इसका मतलब हर शक्ति से समान दूरी रखना नहीं, बल्कि किसी एक शक्ति, बाजार, मुद्रा व्यवस्था, ऊर्जा स्रोत या तकनीकी तंत्र पर ऐसी निर्भरता से बचना है जो स्वतंत्र निर्णय क्षमता सीमित कर दे। आज ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, सेमीकंडक्टर, डिजिटल भुगतान, समुद्री मार्ग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी रणनीतिक स्वायत्तता का हिस्सा हैं। महामारी और बाद के युद्धों ने आपूर्ति शृंखलाओं की कमजोरी उजागर की। दवाओं, चिकित्सा उपकरणों, भोजन, ईंधन और उर्वरक की आपूर्ति में व्यवधान ने आयात-निर्भर देशों को अधिक प्रभावित किया। इसलिए भारत खुले व्यापार का विरोध किए बिना आपूर्ति स्रोतों के विविधीकरण और सुरक्षित समुद्री मार्गों पर जोर देता है।

ऊर्जा और जलवायु के प्रश्न पर भी यही संतुलन आवश्यक है। भारत नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश का समर्थन करता है, लेकिन विकासशील देशों की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को भी सामने रखता है। जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल के अनुसार 1850-2019 के ऐतिहासिक जीवाश्म ईंधन एवं औद्योगिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में विकसित देशों की हिस्सेदारी लगभग 57 प्रतिशत रही, जबकि अल्प विकसित देशों की हिस्सेदारी लगभग 0.4 प्रतिशत थी। इसलिए भारत जलवायु कार्रवाई के साथ वित्त, तकनीक और जिम्मेदारी के न्यायपूर्ण बंटवारे की बात करता है।

इसी क्रम में अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, आपदा रोधी अवसंरचना गठबंधन और डिजिटल सार्वजनिक ढांचे में भारत के प्रयास महत्वपूर्ण हैं। संदेश स्पष्ट है-ग्लोबल साउथ केवल शिकायत करने वाला समूह नहीं, समाधान देने वाला पक्ष भी हो सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता इस बहस का नया क्षेत्र है। यदि गणना क्षमता, आंकड़े और उन्नत चिप कुछ देशों या कंपनियों तक सीमित रहे तो नई डिजिटल निर्भरता पुराने औद्योगिक अंतर को और बढ़ा सकती है। भारत का सुधारवादी बहुपक्षवाद मौजूदा संस्थाओं को तोड़ने की मांग से अलग है। लक्ष्य उन्हें अधिक प्रतिनिधिक और उत्तरदायी बनाना है। नियम जरूरी हैं, लेकिन नियमों की वैधता इस बात से भी आती है कि नियम बनाने की प्रक्रिया कितनी सहभागी है।

यहां चुनौतियां भी हैं। ग्लोबल साउथ के देशों के हित हमेशा समान नहीं होते। चीन विकासशील दुनिया की भाषा का उपयोग करता है, लेकिन उसका आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव छोटे देशों से अलग है। भारत-चीन सीमा विवाद और एशिया में प्रभाव की प्रतिस्पर्धा दक्षिण-दक्षिण एकजुटता की सीमाएं भी दिखाती है। दूसरी ओर, केवल प्रतिनिधित्व बढ़ जाने से गरीब देशों को अपने आप सस्ती पूंजी, बेहतर स्वास्थ्य सेवा या तकनीक नहीं मिल जाएगी। वैश्विक सुधार के साथ घरेलू शासन, शिक्षा, बुनियादी ढांचा, वित्तीय अनुशासन और उत्पादन क्षमता भी आवश्यक हैं।

इसलिए भारत की विदेश नीति की असली परीक्षा संतुलन में है। उसे अमेरिका और यूरोप से तकनीक व निवेश चाहिए, रूस से रणनीतिक संबंध बनाए रखने हैं, पश्चिम एशिया से ऊर्जा और पूंजी चाहिए, अफ्रीका के साथ विकास साझेदारी बढ़ानी है और चीन के साथ प्रतिस्पर्धा को संभालना है। यह नीति किसी सरल वैचारिक खांचे में नहीं समा सकती। मुद्दे के अनुसार साझेदारी और विकल्प बनाए रखना ही इसका व्यावहारिक आधार है। अंततः जयशंकर की टिप्पणी का सार एक बुनियादी प्रश्न में है-क्या इक्कीसवीं सदी की दुनिया को बीसवीं सदी की शक्ति संरचनाओं के सहारे चलाया जा सकता है?

भारत का उत्तर है-संस्थाओं को समय के साथ बदलना होगा। लेकिन शक्ति का पुनर्वितरण केवल घोषणाओं से नहीं होता। उसके पीछे अर्थव्यवस्था, तकनीक, उत्पादन, ज्ञान और विश्वसनीय साझेदारियां होती हैं। यदि भारत अपनी सुधार की मांग को केवल अपने लिए अधिक स्थान की मांग न बनाकर अफ्रीका, एशिया और अन्य विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने से जोड़ता है, तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ एक कूटनीतिक सूत्र से आगे बढ़कर वैश्विक शासन का व्यावहारिक सिद्धांत बन सकता है। संकटों का बोझ यदि साझा है तो निर्णय का अधिकार भी अधिक साझा होना चाहिए। यही वैश्विक दक्षिण की आकांक्षा है और यही आने वाली विश्व व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा भी।

X@hiteshshankar

Topics: बहुपक्षवादऋण संकटआपूर्ति शृंखलाएस जयशंकरजलवायु वित्त।आईएमएफसंयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद समाचारजी-20‘ग्लोबल साउथ’ब्रिक्सवसुधैव कुटुम्बकम्रणनीतिक स्वायत्तता
हितेश शंकर
हितेश शंकर
हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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