मौत से मिट नहीं जाता गुनाह का न्यायिक इतिहास!
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मौत से मिट नहीं जाता गुनाह का न्यायिक इतिहास!

1984 के सिख कत्लेआम के दौरान हुई हत्याओं के दोषी सज्जन कुमार को ‘रोल मॉडल’ बताने पर सवाल—कांग्रेस बताए, उसकी संवेदना पीड़ितों के साथ है या अपने पुराने नेता के साथ ?

Written byप्रमोद कौशलप्रमोद कौशल — edited by Mahak Singh
Aug 22, 2026, 05:34 pm IST
inभारत
सज्जन कुमार (फाइल फोटो)

सज्जन कुमार (फाइल फोटो)

किसी व्यक्ति की मृत्यु पर उसके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करना भारतीय संस्कार है। लेकिन संवेदना और महिमामंडन में बहुत बड़ा अंतर होता है।
और जब बात ऐसे व्यक्ति की हो जिसे देश की अदालतों ने 1984 के सिख कत्लेआम के दौरान हुई हत्याओं से जुड़े मामलों में दोषी ठहराकर उम्रकैद की सजा सुनाई हो, तब सार्वजनिक जीवन में बैठे प्रत्येक नेता के शब्दों की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है।

20 अगस्त 2026 को पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार की मृत्यु हो गई। लेकिन उसकी मृत्यु के बाद कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं की ओर से आए श्रद्धांजलि संदेशों और राजनीतिक प्रशंसा ने एक बार फिर उस दर्दनाक अध्याय को चर्चा के केंद्र में ला दिया, जिसका संबंध किसी सामान्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से नहीं, बल्कि 1984 के सिख कत्लेआम में अपनों को खोने वाले परिवारों की स्मृति, न्याय और चार दशकों के संघर्ष से है।

सवाल सीधा है- क्या मृत्यु किसी सजायाफ्ता व्यक्ति का न्यायिक इतिहास भी समाप्त कर देती है? यदि नहीं, तो सज्जन कुमार को मृत्यु के बाद राजनीतिक आदर्श के रूप में प्रस्तुत करने की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ी ?

पहले यह याद कर लीजिए कि सज्जन कुमार कौन था? सज्जन कुमार की पहचान केवल एक पूर्व सांसद की नहीं थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिसंबर 2018 में उसे 1984 के सिख कत्लेआम से जुड़े उस मामले में दोषी ठहराया जिसमें दिल्ली के राजनगर क्षेत्र में एक ही परिवार के पांच सिखों की हत्या हुई थी और एक गुरुद्वारे को जला दिया गया था। निचली अदालत ने 2013 में उसे बरी किया था, लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने वह फैसला पलट दिया और सज्जन कुमार को जीवन के शेष समय तक कारावास की सजा सुनाई। इस मुकदमे में पीड़ित एवं गवाह जगदीश कौर का संघर्ष उस असाधारण न्यायिक लड़ाई का प्रतीक बना, जिसमें एक पीड़ित परिवार दशकों बीत जाने के बावजूद न्याय की उम्मीद छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ। और कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। 2025 में दिल्ली की अदालत ने सज्जन कुमार को एक दूसरे मामले में भी दोषी ठहराया। यह मामला 1 नवंबर 1984 को जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुणदीप सिंह की हत्या से संबंधित था। अदालत ने सज्जन कुमार को इस मामले में भी उम्रकैद सुनाई।

अर्थात मृत्यु के समय सज्जन कुमार कोई ऐसा राजनीतिक व्यक्ति नहीं था जिसके विरुद्ध केवल आरोप या राजनीतिक बयानबाजी चल रही हो। वह अदालत से दोषी ठहराया गया और उम्रकैद काट रहा व्यक्ति था। इस न्यायिक सत्य को मिटाने, छोटा करने अथवा राजनीतिक श्रद्धांजलियों के नीचे दबा देने का अधिकार किसी राजनीतिक दल के पास नहीं है।

1984 का सिख कत्लेआम- इसे केवल इतिहास की तारीख समझने की भूल मत कीजिए

1984 का सिख कत्लेआम केवल इतिहास की किताब में दर्ज कुछ आंकड़े नहीं हैं। दिल्ली के अनेक इलाकों में सिख परिवारों के घर जलाए गए। दुकानें लूटी गईं। लोगों को उनके घरों से बाहर निकालकर मारा गया। गुरुद्वारों को निशाना बनाया गया। परिवारों के परिवार उजड़ गए। और उसके बाद शुरू हुआ न्याय का ऐसा इंतजार, जो कई मामलों में तीन दशक से भी अधिक लंबा चला। मामले दर्ज हुए। जांच हुई। गवाह सामने आए। अदालतों में सुनवाई हुई। बरी करने के फैसले आए। पीड़ितों ने उन फैसलों को चुनौती दी और अंततः दोषसिद्धियां भी हुईं। इसलिए आज सज्जन कुमार की राजनीतिक विरासत पर चर्चा करते समय केवल यह लिख देना कि वह “पूर्व सांसद” था, उसका अधूरा परिचय है। उसके परिचय के साथ अदालत द्वारा दर्ज दोषसिद्धियां भी इतिहास का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

‘रोल मॉडल’- आखिर किस बात का ?

यहीं से वर्तमान विवाद बेहद गंभीर हो जाता है। सज्जन कुमार की मृत्यु के बाद कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा द्वारा उसे देशभर के लिए “रोल मॉडल” बताए जाने की बात सामने आई। पूर्व हरियाणा मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने उसे अपना मित्र बताते हुए अच्छा नेता और जिंदादिल इंसान बताया। कांग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने भी उसके जमीनी जुड़ाव, कार्यकर्ताओं से संबंध और सरल स्वभाव को याद करते हुए श्रद्धांजलि दी। यहां प्रश्न किसी परिवार के प्रति शोक व्यक्त करने का नहीं है। प्रश्न उस राजनीतिक प्रशंसा का है, जो अदालत से दोषी ठहराए गए व्यक्ति के सार्वजनिक जीवन का महिमामंडन करती दिखाई देती है। किसी नेता को “रोल मॉडल” कहना साधारण शोक-संदेश नहीं होता।

“रोल मॉडल” का अर्थ है- अनुकरण करने योग्य व्यक्ति। ऐसे में 1984 के सिख कत्लेआम के पीड़ित परिवारों और सिख समाज का यह पूछना बिल्कुल स्वाभाविक है- सज्जन कुमार आखिर किस बात का ‘रोल मॉडल’ था ? इस प्रश्न का उत्तर कांग्रेस को देना चाहिए। उन पांच नामों के सामने एक बार ‘रोल मॉडल’ शब्द रखकर देखिए

  1. केहर सिंह।
  2. गुरप्रीत सिंह।
  3. रघुवेंद्र सिंह।
  4. नरेंद्र पाल सिंह।
  5. कुलदीप सिंह।

ये अदालत की किसी पुरानी फाइल में लिखे केवल पांच नाम नहीं थे। वे किसी के पिता थे। किसी के बेटे थे। किसी के भाई थे। किसी का पूरा संसार थे। इन्हीं पांच सिखों की हत्या से संबंधित मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने सज्जन कुमार को दोषी ठहराया था। एक तरफ अदालत का वह फैसला रखिए। दूसरी तरफ “रोल मॉडल” शब्द रखिए। और फिर कांग्रेस नेतृत्व स्वयं बताए- क्या दोनों एक साथ खड़े हो सकते हैं ?

जसवंत सिंह और तरुणदीप सिंह को भी मत भूलिए, 2025 की दूसरी दोषसिद्धि इस प्रश्न को और गंभीर बनाती है। दिल्ली की अदालत ने सज्जन कुमार को जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुणदीप सिंह की हत्या से जुड़े मामले में दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई। चार दशक बाद आया यह फैसला स्वयं बताता है कि पीड़ित परिवारों ने न्याय पाने के लिए कितना लंबा इंतजार किया। एक परिवार अपने पति और बेटे के लिए दशकों तक न्याय की प्रतीक्षा करे और न्याय मिलने के कुछ समय बाद उसी दोषी की मृत्यु पर राजनीतिक मंच से उसके सार्वजनिक जीवन का गुणगान होने लगे- तो उस परिवार पर क्या गुजरती होगी ? राजनीति में इतनी संवेदनशीलता तो होनी ही चाहिए कि वह दोषी के राजनीतिक परिचय से पहले 1984 के सिख कत्लेआम में मारे गए निर्दोष सिखों और न्याय के लिए दशकों तक संघर्ष करने वाले उनके परिवारों को याद करे।

यह केवल ‘सिख भावनाओं’ का प्रश्न नहीं- यह न्याय और मानवीय गरिमा का प्रश्न है? इस पूरे विवाद को केवल “सिख भावनाएं आहत हुईं” कहकर सीमित कर देना भी उचित नहीं होगा। जिन परिवारों के पिता, बेटे और भाई मारे गए, उनके लिए यह किसी धार्मिक भावना से कहीं आगे न्याय, स्मृति और मानवीय गरिमा का प्रश्न है। अदालत से दोषी ठहराए गए व्यक्ति का राजनीतिक महिमामंडन इसलिए केवल सिख समाज को आहत करने वाला विषय नहीं है। यह उन पीड़ित परिवारों के दशकों लंबे न्यायिक संघर्ष के सम्मान का भी प्रश्न है। उन्होंने केवल सहानुभूति नहीं मांगी थी। उन्होंने न्याय मांगा था। उन्होंने अदालतों के दरवाजे खटखटाए। उन्होंने गवाही दी। उन्होंने दशकों इंतजार किया। और आखिरकार जब अदालतों ने दोषसिद्धियां दर्ज कीं, तो कम से कम राजनीति से यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि वह उस न्यायिक सत्य का सम्मान करे।

कांग्रेस से सबसे बड़ा सवाल- संवेदना पीड़ितों के लिए है या अपने पुराने नेता के लिए? यही इस पूरे विवाद का केंद्रीय प्रश्न है। किसी मृत व्यक्ति के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करना एक बात है। लेकिन “परिवार के प्रति संवेदना” और “दोषी व्यक्ति के राजनीतिक जीवन का गुणगान”- दोनों एक चीज नहीं हैं। यदि संदेश केवल इतना होता- “परिवार के प्रति हमारी संवेदनाएं हैं” तो बात अलग होती। लेकिन जब “रोल मॉडल”, “अच्छा नेता”, “जिंदादिल इंसान”, “जमीनी जुड़ाव” और राजनीतिक योगदान की प्रशंसा होने लगे, तो 1984 के सिख कत्लेआम के पीड़ित परिवारों का आहत होना अस्वाभाविक कैसे माना जा सकता है?

पंजाब कांग्रेस के सामने असहज सवाल

पंजाब में कांग्रेस सिखों के बीच जाकर वोट मांगती है। पंजाब के गांवों में उसके नेता जाते हैं। गुरुद्वारों में माथा टेकते हैं। सिख गुरुओं और पंजाब की विरासत के सम्मान की बातें करते हैं। 1984 के सिख कत्लेआम के पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना जताते हैं। लेकिन जब उसी पार्टी के एक प्रभावशाली सांसद द्वारा सज्जन कुमार को “रोल मॉडल” कहा जाता है, तो पंजाब कांग्रेस को सफाई देनी पड़ती है कि यह उनका “व्यक्तिगत विचार” है।
लेकिन इससे अगला प्रश्न पैदा होता है- सिर्फ यह कह देना कि यह उनकी निजी राय है, क्या पर्याप्त है? यदि कथन गलत है तो स्पष्ट शब्दों में गलत कहिए। यदि अस्वीकार्य है तो अस्वीकार्य कहिए। यदि इससे 1984 के सिख कत्लेआम के पीड़ित परिवारों को चोट पहुंची है तो उनके सामने खेद व्यक्त कीजिए। राजनीतिक जवाबदेही केवल किसी बयान से दूरी बना लेने पर समाप्त नहीं हो जाती।

राहुल गांधी और कांग्रेस हाईकमान से भी स्पष्ट जवाब अपेक्षित है

हर कांग्रेस नेता के बयान को राहुल गांधी का बयान नहीं माना जा सकता। लेकिन जब मामला 1984 के सिख कत्लेआम जैसे अत्यंत संवेदनशील और ऐतिहासिक विषय का हो और पार्टी का प्रभावशाली सांसद अदालत से दोषी व्यक्ति को “रोल मॉडल” कहे, तो कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व से स्पष्टता मांगना पूरी तरह उचित है। राहुल गांधी से प्रश्न होना चाहिए- क्या आपकी कांग्रेस सज्जन कुमार को ‘रोल मॉडल’ मानती है- हां या नहीं? यदि नहीं-
तो सार्वजनिक रूप से स्पष्ट शब्दों में ऐसा क्यों नहीं कहा जाता ? क्या कांग्रेस अध्यक्ष इस पर पार्टी की स्थिति स्पष्ट करेंगे ? क्या दीपेंद्र हुड्डा से जवाब मांगा जाएगा ? क्या पीड़ित परिवारों से खेद व्यक्त किया जाएगा ? और क्या कांग्रेस यह स्पष्ट करेगी कि 1984 के सिख कत्लेआम से जुड़ी हत्याओं के मामलों में अदालत से दोषी ठहराए गए किसी व्यक्ति का राजनीतिक महिमामंडन पार्टी को स्वीकार है या नहीं ?

पीड़ितों ने न्याय पाने में अपनी जिंदगी के दशकों लगा दिए

सज्जन कुमार से जुड़े मामलों की कानूनी यात्रा को भी मत भूलिए। मामले दर्ज हुए। जांच हुई। गवाह आए। निचली अदालत से राहत मिली। लेकिन पीड़ित पीछे नहीं हटे। अपील हुई। उच्च न्यायालय ने फैसला पलटा। दोषसिद्धि हुई। उम्रकैद हुई फिर दूसरे मामले में भी दोषसिद्धि हुई। पीड़ित परिवारों ने न्याय के लिए अपनी जिंदगी के कई दशक लगा दिए। इसलिए किसी राजनीतिक नेता को श्रद्धांजलि देते समय इतना जरूर सोचा जाना चाहिए था कि उसके शब्द उन परिवारों को कैसे सुनाई देंगे, जिन्होंने न्याय के इंतजार में अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा गुजार दिया।

मृत्यु पर संवेदना हो सकती है- इतिहास पर पर्दा नहीं

मृत्यु किसी व्यक्ति के विरुद्ध अदालत द्वारा स्थापित न्यायिक सत्य और पीड़ित परिवारों के संघर्ष को समाप्त नहीं कर देती। सज्जन कुमार की मृत्यु हुई- यह तथ्य है। वह पूर्व सांसद था- यह तथ्य है। वह कांग्रेस का बड़ा राजनीतिक चेहरा रहा- यह भी तथ्य है। लेकिन वह 1984 के सिख कत्लेआम के दौरान हुई हत्याओं से जुड़े मामलों में अदालत से दोषी ठहराया गया और उम्रकैद काट रहा था- यह भी उतना ही बड़ा तथ्य है। पहले तीन तथ्यों को याद रखना और चौथे को राजनीतिक श्रद्धांजलियों के नीचे दबा देना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। न्यायिक सत्य को दर्ज करना किसी मृत व्यक्ति का अपमान नहीं- इतिहास और पीड़ितों के प्रति ईमानदारी है।

कांग्रेस को 1984 के सिख कत्लेआम पर शब्द नहीं, स्पष्ट नीति चाहिए

कांग्रेस चाहे तो एक वाक्य में इस पूरे विवाद पर अपनी स्थिति साफ कर सकती है- “1984 के सिख कत्लेआम से संबंधित हत्याओं के मामलों में अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया कोई भी व्यक्ति कांग्रेस के लिए आदर्श या ‘रोल मॉडल’ नहीं हो सकता।” बस। इतना स्पष्ट वाक्य। न कोई राजनीतिक बहाना। न “व्यक्तिगत विचार” की ढाल। न अगर-मगर। यह वक्तव्य पीड़ित परिवारों के चार दशक पुराने जख्मों को मिटा नहीं सकता। लेकिन कम से कम यह संदेश जरूर देगा कि पार्टी न्यायिक सत्य और पीड़ितों के सम्मान को अपने पुराने राजनीतिक रिश्तों से ऊपर रखती है। वोट के समय सिख याद आते हैं, तो सज्जन कुमार के महिमामंडन के समय 1984 के पीड़ित क्यों भूल जाते हैं? यह प्रश्न पंजाब में उठना स्वाभाविक है। यदि किसी राजनीतिक दल को सिख समाज का वोट चाहिए, तो उसे सिख समाज की ऐतिहासिक पीड़ा के प्रति भी उतना ही संवेदनशील होना पड़ेगा। सिखों को केवल चुनाव के समय सम्मान देना पर्याप्त नहीं है। गुरुद्वारों में माथा टेकना आसान है। सिख गुरुओं और पंजाब की विरासत के सम्मान की बातें करना आसान है। चुनावी मंचों से पंजाबियत की बातें करना भी आसान है। लेकिन असली परीक्षा तब होती है जब अपने ही दल के प्रभावशाली नेता द्वारा 1984 के सिख कत्लेआम के दौरान हुई हत्याओं के दोषी व्यक्ति के महिमामंडन के विरुद्ध खड़ा होना पड़े। वहीं राजनीतिक चरित्र की असली परीक्षा होती है।

सिख समाज की पीड़ा किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है

यह बात बहुत स्पष्ट रहनी चाहिए। 1984 के सिख कत्लेआम में जिन परिवारों ने अपने लोग खोए, वे किसी राजनीतिक दल की चुनावी संपत्ति नहीं हैं। उनकी पीड़ा न कांग्रेस-विरोधी है, न भाजपा-समर्थक और न किसी अन्य दल की राजनीतिक पूंजी। उनकी पीड़ा मानवीय है। वह न्याय का प्रश्न है। वह पीड़ितों की गरिमा का प्रश्न है। वह भारतीय लोकतंत्र और व्यवस्था की सामूहिक जवाबदेही का प्रश्न है। इसलिए 1984 के सिख कत्लेआम के दौरान हुई हत्याओं के दोषी सज्जन कुमार को लेकर उठने वाला मूल प्रश्न भाजपा बनाम कांग्रेस या अकाली दल बनाम कांग्रेस नहीं होना चाहिए। मूल प्रश्न इससे कहीं बड़ा है- क्या भारत की राजनीति अपने ही न्यायालयों द्वारा स्थापित सत्य और पीड़ित परिवारों के संघर्ष का सम्मान करेगी ?

सज्जन कुमार की मृत्यु हो गई- अदालत के फैसले नहीं मरे

एक मनुष्य की मृत्यु हो सकती है। उसकी सजा उसके साथ समाप्त हो सकती है। उसकी राजनीतिक यात्रा समाप्त हो सकती है। लेकिन अदालत का फैसला नहीं मरता। जगदीश कौर का संघर्ष नहीं मिटता। केहर सिंह का नाम नहीं मिटता।गुरप्रीत सिंह का नाम नहीं मिटता। घुवेंद्र सिंह का नाम नहीं मिटता। नरेंद्र पाल सिंह का नाम नहीं मिटता। कुलदीप सिंह का नाम नहीं मिटता। जसवंत सिंह और तरुणदीप सिंह का नाम नहीं मिटता। और 1984 के सिख कत्लेआम की भयावह स्मृति को भी किसी राजनीतिक श्रद्धांजलि से मिटाया नहीं जा सकता। राजनीति यदि दोषी को याद करे तो उससे पहले पीड़ितों को याद करना उसका नैतिक दायित्व होना चाहिए।

कांग्रेस से सात सीधे सवाल

  • क्या कांग्रेस सज्जन कुमार को “रोल मॉडल” मानती है ? यदि नहीं, तो क्या दीपेंद्र हुड्डा के बयान को पार्टी स्पष्ट और आधिकारिक रूप से अस्वीकार करेगी ?
  • क्या कांग्रेस नेतृत्व 1984 के सिख कत्लेआम के पीड़ित परिवारों से इस पूरे प्रकरण से पहुंची पीड़ा के लिए खेद व्यक्त करेगा ?
  • क्या भूपेंद्र सिंह हुड्डा स्पष्ट करेंगे कि सज्जन कुमार की न्यायिक दोषसिद्धियों के संदर्भ में उनकी श्रद्धांजलि को किस रूप में समझा जाए ?
  • क्या कांग्रेस अपने नेताओं के लिए 1984 के सिख कत्लेआम जैसे संवेदनशील विषय पर स्पष्ट सार्वजनिक आचार-रेखा बनाएगी ?
  • क्या राहुल गांधी सार्वजनिक रूप से यह कहेंगे कि 1984 के सिख कत्लेआम से जुड़ी हत्याओं के मामलों में अदालत से दोषी ठहराया गया व्यक्ति कांग्रेस का आदर्श या “रोल मॉडल” नहीं हो सकता सबसे महत्वपूर्ण क्या कांग्रेस अपने राजनीतिक रिश्तों से ऊपर पीड़ित परिवारों के न्याय, स्मृति और सम्मान को रखेगी ?

सवाल सज्जन कुमार की मृत्यु का नहीं- कांग्रेस की राजनीतिक स्मृति और जवाबदेही का है

बहस इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि किसी मृत व्यक्ति के बारे में कठोर शब्द कहे जाएं या नहीं।असली बहस यह होनी चाहिए कि राजनीतिक स्मृति में प्राथमिक स्थान किसे मिलेगा- दोषी को या पीड़ित को ? सज्जन कुमार के परिवार और परिचितों को उसे व्यक्तिगत रूप से याद करने का अधिकार है। लेकिन सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में उसके चरित्र का महिमामंडन करते समय अदालतों के फैसलों को हाशिये पर नहीं डाला जा सकता। 1984 के सिख कत्लेआम के पीड़ित परिवारों ने न्याय पाने के लिए बहुत लंबा इंतजार किया है। कम से कम अब उनके न्याय को राजनीतिक शिष्टाचार की भेंट मत चढ़ाइए। कांग्रेस को तय करना होगा- उसकी राजनीतिक संवेदना का पहला अधिकार किसका है: अपने पुराने नेता का या उन निर्दोष सिख परिवारों का, जिन्हें न्याय पाने में चार दशक लग गए ?

1984 इतिहास का एक अध्याय जरूर है

लेकिन 1984 के सिख कत्लेआम के जख्म केवल इतिहास नहीं हैं। वे उन परिवारों की जीवित स्मृतियां हैं जिन्होंने अपने लोग खोए। वे उन गवाहों के संघर्ष की स्मृतियां हैं जो दशकों तक न्याय के लिए खड़े रहे। वे उन अदालती फैसलों में दर्ज न्यायिक सत्य हैं जिन तक पहुंचने में एक पूरी पीढ़ी गुजर गई। मृत्यु किसी मनुष्य की जिंदगी समाप्त कर सकती है; अदालत द्वारा स्थापित सत्य को नहीं। और जो राजनीति इस अंतर को नहीं समझती-  उसे 1984 के सिख कत्लेआम के पीड़ित परिवारों से वोट मांगने से पहले उनके सामने अपने शब्दों का हिसाब जरूर देना चाहिए।

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प्रमोद कौशल
प्रमोद कौशल
25+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ स्वतंत्र और टीम-आधारित काम में सक्षम। नेतृत्व, टीम विकास और प्रेरणा में सिद्ध कौशल। विशेषज्ञता: भारतीय व कनाडाई राजनीति। [Read more]
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Rahul Gandhi

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