भारत के बंटवारे के समय मेरी उम्र करीब चार वर्ष थी। हम रावलपिंडी के रहने वाले थे। बंटवारे के बाद जो कुछ हमने भोगा, उसे शब्दों में बताना भी मुश्किल है। मेरे माता—पिता और सात भाइयों और तीन बहनों के परिवार को लेकर इस तरफ आए थे। हमारा सबकुछ पीछे छूट गया था। रास्ते में हिंदुओं की लाशों के ढेर लगे हुए थे। कई जगह लाशें फेंकने तक की जगह नहीं बची थी। पीने के पानी के कुओं में भी लाशें फेंक दी गईं।
लाशों के सड़ने से पानी का स्रोत जहरीला हो गया। मजबूरी में भारत लौट रहे लोगों को वही पानी पीना पड़ा। बहुत से लोग बीमार हो गए और रास्ते में ही दम तोड़ दिया। इस भयानक त्रासदी और हमलों को झेलते हुए हम जैसे कुछ भाग्यशाली लोग ही भारत की सीमा तक पहुंच पाए। जिन लोगों को कत्ल कर दिया गया, जो भूख से मर गए या जिन महिलाओं ने आत्महत्या कर ली, उनकी पहचान तक नहीं हो पाई। उनका फिर कभी कोई पता नहीं चला।
विभाजन जब घोषित हुआ तो कोई सरकार नहीं थी, कोई व्यवस्था नहीं थी। हर तरफ अफरा-तफरी का माहौल था। पाकिस्तान की घोषणा हो जाने के बाद मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मुसलमान हिंदुओं की जान के दुश्मन बन गए थे। भारत का विभाजन इतनी बड़ी त्रासदी थी कि लोगों को हड़बड़ी में अपना घर, जमीन-जायदाद और सब कुछ छोड़कर भागना पड़ा। गर्भवती महिलाएं, छोटे बच्चे और सभी लोग खाली हाथ अपने मूल निवास से नए भारत की तरफ बदहवास भाग रहे थे। खेतों और जंगलों के रास्ते भूखे-प्यासे कई दिन संघर्ष करते हुए हम भारत की सीमा तक पहुंचे।
जिसको जहां रास्ता मिला, वह उसी रास्ते से भारत की तरफ चल पड़ा। कोई अमृतसर के रास्ते से भारत आया, कोई सिंध से नासिक और महाराष्ट्र की तरफ गया और कोई पश्चिमी पंजाब से होता हुआ दिल्ली पहुंचा। जिसे किसी तरह का आसरा या अपने किसी रिश्तेदार के बारे में जानकारी थी, वह उसी जिले या शहर की तरफ पहुंच रहा था।
लखनऊ में फिर शुरू हुआ जीवन
भारत आने के बाद हम लखनऊ आकर बसे। शरणार्थी शिविर से बाहर निकलने के बाद जीवन चलाने के लिए हमने हर तरह का काम किया। परिवार में किसी ने बिस्किट बेचा, किसी ने रिक्शा चलाया और किसी ने अखबार बेचा। जिस तरीके से जीविकोपार्जन हो सकता था, हम लोग संघर्ष करते रहे। करीब तीन साल इसी तरह बीते।
बंटवारे से पहले हम बेहद संपन्न थे, लेकिन उसके बाद पूरा परिवार सड़क पर आ गया। यहां तक कि कपड़े भी दूसरों से मांगकर पहनने पड़े। हमें शरणार्थी बनकर सड़कों पर समय बिताना पड़ा।
परिवार ने अखबार बेचा, बिस्किट बेचा और साधारण से साधारण काम किया, लेकिन किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। हमने कभी हालात से समझौता नहीं किया। मेरे पिता ने खद्दर के कपड़े का कारोबार शुरू किया, इसके बाद धीरे-धीरे आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ और फिर हम लोग आगे बढ़े।















