यह श्लोक चाणक्य नीति एवं प्राचीन भारतीय शासन-शास्त्र (राजनीति विज्ञान) के सिद्धांतों से उद्भूत है। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, नागरिक चेतना और देशद्रोह के दुष्परिणामों पर प्रकाश डाला गया है।
श्लोक-
अराष्ट्रियकराक्रान्तं तद् राष्ट्रं जायते ध्रुवेम्।
यत्र राष्ट्रे वर्तमानाश्चाण्डाला राष्ट्रघातिनः ॥
भावार्थ-
राष्ट्र में राष्ट्रघाती चाण्डाल जीवित रहते हैं, वह राष्ट्र अराष्ट्रिय 5 करों से आक्रान्त हो जाता है, “जिस राष्ट्र में राष्ट्रद्रोही तथा समाज विरोधी तत्त्व खुलेआम रहते हैं और सक्रिय होते हैं, वह राष्ट्र निश्चित रूप से विदेशी शक्तियों/शक्तियों के नियंत्रण में चला जाता है अथवा उसका विनाश हो जाता है।”
श्लोक की प्रासंगिकता- एक सशक्त राष्ट्र के लिए उसके नागरिकों का राष्ट्र के प्रति निष्ठावान होना अनिवार्य है। यदि नागरिक अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए देशहित से समझौता करते हैं, तो राष्ट्र की स्वतंत्रता संकट में पड़ जाती है।
यह श्लोक आज के परिप्रेक्ष्य में भी यह संदेश देता है कि राष्ट्र की अखंडता और संप्रभुता बनाए रखने के लिए आंतरिक शत्रुओं पर सतर्क दृष्टि और कठोर नीति अति आवश्यक है।

















