मेरे लिए विभाजन इतिहास का कोई अध्याय भर नहीं है। वह घर के भीतर बची हुई एक आवाज है। दादा दिल्ली में थे। उर्दू भी पढ़ते थे और अखबारों में लाहौर, रावलपिंडी, मुल्तान और पंजाब की खबरें पढ़ा करते थे। पुरखे कई पीढ़ी पहले पंजाब से उत्तरप्रदेश आ बसे थे, इसलिए वहां की पीड़ा उनके लिए पराई नहीं थी। कहते थे, खबर कागज पर छपती थी, मगर उसका असर मन के भीतर उतरता था। आज भी 1947 की बात होती है तो मुझे नक्शे पर खिंची रेखा से पहले अनुभव में तपी, भारी आवाज याद आती है।
विभाजन को समझना हो तो सत्ता हस्तांतरण की तारीखों से आगे जाना होगा। अंग्रेजों की नीतियां थीं। पृथक निर्वाचन की राजनीति थी। मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग थी। कांग्रेस की अपनी सीमाएं और अपने निर्णय थे। वामपंथ के भीतर भी ऐसे विचार थे, जिन्होंने पृथक राष्ट्रीयता के तर्क को बल दिया। यह सब इतिहास में दर्ज है। लेकिन इतिहास का असली चेहरा वहां दिखाई देता है, जहां कोई परिवार रातों रात यह तय करता है कि घर में ताला लगाकर जाए या बिना ताला लगाए, क्योंकि लौटकर आने की उम्मीद अभी पूरी तरह मरी नहीं है।
दादाजी कहा करते थे, लोग सामान नहीं, घर छोड़ते हैं। सामान फिर खरीदा जा सकता है, घर नहीं। घर में वह आंगन होता है, जहां किसी मां ने अपने बच्चे को पहली बार चलना सिखाया। वह दीवार होती है, जिस पर पिता ने बच्चों की बढ़ती ऊंचाई के निशान बनाए होते हैं। वह दूकान होती है, जिसमें कई पीढ़ियों की उंगलियों की गंध बसी होती है। विभाजन ने लाखों लोगों से यही सब छीन लिया। खेत, दूकानें, मंदिर, गुरुद्वारे, मकान, कागज, जेवर, खाते, स्मृतियां और श्मशान तक पीछे छूट गए।
पंजाब में यह पीड़ा असह्य रूप में फूटी। रावलपिंडी, शेखूपुरा, लाहौर और अनगिनत गांवों में हुई हिंसा ने मनुष्य को मनुष्य से डरना सिखा दिया। सिख समाज ने केवल जमीन नहीं खोई, अपने इतिहास और आस्था से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण स्थान भी सीमा पार छोड़ दिए। ननकाना साहिब, पंजा साहिब और करतारपुर जैसे स्थान अचानक दूसरे देश में चले गए। हिंदू और जैन परिवार भी पश्चिमी पंजाब और सिंध से उखड़े। थोहा खालसा की महिलाओं की त्रासदी पढ़ते हुए कोई आंकड़ा आंखों के सामने नहीं आता। वह कुआं दिखाई देता है, जिसके किनारे भय, मर्यादा, निराशा और हिंसा एक साथ खड़े थे।
यह भी याद रखना चाहिए कि हिंसा केवल एक दिशा में नहीं चली। पंजाब, बंगाल, बिहार, दिल्ली, नोआखाली, कलकत्ता और रावलपिंडी की अपनी-अपनी रक्तरंजित स्मृतियां हैं।
पिताजी की पीढ़ी ने इस कथा का दूसरा हिस्सा देखा। वह था उजड़ने के बाद फिर से बसने का संघर्ष। उनका बचपन, जब उन्होंने देखा कि दिल्ली शरणार्थियों से भर गई थी। पुराना किला, किंग्सवे कैंप, स्कूल, धर्मशालाएं, अस्थायी शिविर, तंबू, बरामदे और आधे बने कमरे, जहां जगह मिली, वहीं जीवन टिकाया गया। अनेक परिवारों को लंबे समय तक भरोसा था कि हालात सुधरेंगे और वे लौट जाएंगे। फिर धीरे-धीरे समझ आया कि लौटना अब केवल स्मृति में ही संभव है।
इसके बाद दिल्ली बदलने लगी। लाजपत नगर, राजेंद्र नगर, जंगपुरा और ऐसी अनेक बस्तियों में लोगों ने अपने शोक को रोजी-रोटी में बदला। किसी ने रेहड़ी लगाई, किसी ने छोटी दूकान खोली, किसी ने करघा चलाया, किसी ने स्कूल में नौकरी की। पंजाबी बोली, भोजन, कारोबारी ढंग, निर्भीकता और जीवट इस शहर के स्वभाव में उतरते गए। दिल्ली देश की राजधानी थी, लेकिन विभाजन के बाद वह नई आशाओं की राजधानी भी बनी। यहां आने वाले लोगों के पास अक्सर पूंजी बहुत कम थी, पर जीने की जिद बहुत बड़ी थी।
यह विभाजन की कथा का दूसरा चेहरा है। इसे केवल विभीषिका कहकर छोड़ देना भी अधूरा होगा। मनुष्य टूटा भी और फिर खड़ा भी हुआ। जिनके पास कल तक अपना मकान था, वे आज राशन की कतार में खड़े थे। फिर वही लोग कुछ वर्षों बाद दूकान, कारखाने, विद्यालय और संस्थाएं खड़ी कर रहे थे। सरकार ने पुनर्वास की योजनाएं बनाईं। भूमि और संपत्ति के दावे निपटाए गए। आवास दिए गए। लेकिन सरकारी कागज किसी व्यक्ति के भीतर साहस नहीं भर सकता। वह साहस इन विस्थापित परिवारों ने अपने भीतर स्वयं पैदा किया।
इतिहास में कुछ प्रश्न हमेशा असुविधाजनक बने रहेंगे। क्या विभाजन रोका जा सकता था। यदि कैबिनेट मिशन की योजना विफल न होती तो क्या कोई दूसरा रास्ता निकल सकता था। यदि सत्ता हस्तांतरण में इतनी जल्दबाजी न होती तो क्या हिंसा कुछ कम होती। क्या राजनीतिक नेतृत्व कुछ और समय ले सकता था। इन प्रश्नों का उत्तर एक पंक्ति में नहीं दिया जा सकता। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि विभाजन किसी प्राकृतिक आपदा की तरह नहीं आया था। वह राजनीतिक निर्णयों, बढ़ते अविश्वास, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, औपनिवेशिक नीतियों और असफल समझौतों की लंबी श्रृंखला का परिणाम था।
इसलिए 1947 को याद करना केवल घाव कुरेदने का वार्षिक आयोजन नहीं होना चाहिए। स्मृति का अर्थ यह है कि हम अपने घरों में पूछें कि हमारे बुजुर्ग कहां से आए थे, किस रास्ते आए, क्या खोया और किसने उनका हाथ थामा। शरणार्थी कार्ड, जमीन के कागज, पुराने पत्र, तस्वीरें, डायरियां और मौखिक कथाएं, जितना हो सके बचाई जानी चाहिएं। प्रत्यक्षदर्शियों की पीढ़ी लगभग जा चुकी है। अब उनके बच्चों और पोतों के पास जो बचा है, वही अगली पीढ़ियों की विरासत बनेगा।
मुझे विभाजन की सबसे बड़ी सीख यही लगती है कि समाज जब भीतर से टूटता है तो सीमा बाहर खिंचती है। राजनीति भी तभी सफल होती है, जब उसे समाज की दरारें मिलती हैं। इसलिए स्मरण का अंतिम उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, सजगता होना चाहिए। राष्ट्रीय एकता का अर्थ एकरूपता नहीं है। उसका अर्थ है परस्पर भरोसा। विविधता तभी शक्ति बनती है, जब उसके भीतर साझा नागरिकता की अनुभूति जीवित रहे।
विभाजन की स्मृतियां रुलाती हैं, क्योंकि उनमें घर छूटे हैं, अपने बिछड़े हैं और स्त्रियों तथा बच्चों पर असहनीय हिंसा हुई है। वे जगाती भी हैं, क्योंकि उसी पीड़ा से लाखों लोगों ने नया जीवन बनाया। दिल्ली इसका जीवित प्रमाण है। यहां शरणार्थियों का क्रंदन धीरे-धीरे बाजारों की आवाज, स्कूलों की घंटियों, कारखानों की खटखट और बच्चों की हंसी में बदल गया।
शायद स्मृति की सबसे बड़ी पूंजी यही है। अतीत को भूलना नहीं है। उससे जलते रहना भी नहीं है। उससे जागना है।
पिछले दस वर्षों से विभाजन का विषय पाञ्चजन्य के लिए केवल एक घटनाक्रम नहीं रहा है। यह इतिहास का वह मोड़ है, जिसने केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरे परिक्षेत्र और विश्व परिदृश्य को भी लंबे समय तक गहरे अर्थों में प्रभावित किया। विभाजन से उपजी व्यथा-कथाओं के साथ-साथ उस घटनाक्रम के पीछे की अदूरदर्शिता, अधूरापन, भारत के हितों से हुआ समझौता और ब्रिटिशों की व्यापक योजना क्या थी, इन सभी पहलुओं को भी हमने समय-समय पर अपने पाठकों के सामने रखा है। विभाजन की इस त्रासदी को केवल घटनाओं के क्रम के रूप में नहीं, बल्कि उसके सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक संदर्भों के साथ समग्रता में देखने और समझने का यह एक बौद्धिक प्रयास है। इस अंक के माध्यम से हमारा उद्देश्य इस विषय पर गंभीर सामाजिक विमर्श को आगे बढ़ाना है। यदि आपको लगता है कि विभाजन को किसी अन्य दृष्टि से देखने, समझने या शोध करने की आवश्यकता है, तो अपने सुझाव और दृष्टिकोण हमें अवश्य बताइए। आपके सुझाव इस विमर्श को अधिक व्यापक और मजबूत बनाने के साथ-साथ पाञ्चजन्य की पठनीयता को और बेहतर करने में भी सहायक होंगे।
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