खाड़ी संकट के बीच ईरान ने इस साल (2026) की शुरुआत से अब तक कम से कम 916 लोगों को फाँसी दी जा चुकी है। इनमें अगस्त में अभी तक 15 शामिल हैं। यह आँकड़ा अब्दुर्रहमान बोरौमंद सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स इन ईरान ने मंगलवार को जारी किया। यह संगठन अमेरिका में स्थित है।
संगठन का कहना है कि असली संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है, क्योंकि ईरानी अधिकारी कई मामलों की जानकारी छिपा लेते हैं। कई प्रदर्शनकारियों पर ऐसे आरोप लगे हैं जिन पर मौत की सजा हो सकती है। उनके मुकदमे जल्दबाजी में और सही प्रक्रिया के बिना चलाए जा रहे हैं। संगठन का आरोप है कि अधिकारी फाँसी की सजा और फाँसी देकर लोगों को डरा रहे हैं ताकि आगे विरोध न हो।
मार्च से फाँसियों की संख्या
ये आँकड़े ऐसे समय आए हैं जब संयुक्त राष्ट्र भी ईरान में मौत की सजा के इस्तेमाल को लेकर चिंतित है, खासकर उन लोगों के मामलों में जिन्हें सरकार विरोधी प्रदर्शनों में गिरफ्तार किया गया था। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क ने पिछले हफ्ते कहा कि 19 मार्च से अब तक राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े आरोपों में कम से कम 56 लोगों को फाँसी दी गई। इनमें 27 मामले इस साल के प्रदर्शनों से जुड़े हैं। तुर्क ने बताया कि मार्च के बाद फाँसियों और मौत की सजाओं की संख्या बढ़ी है। सौ से ज्यादा लोग ऐसे आरोपों का सामना कर रहे हैं जिन पर फाँसी हो सकती है। उन्होंने ईरानी अधिकारियों से सभी फाँसियाँ रोकने और मौत की सजा खत्म करने की अपील की।
ईरान इंटरनेशनल को मिली जानकारी के मुताबिक, 20 साल के अर्विन खैरखाह को 1 अगस्त को शाहरूद जेल में फाँसी दी गई। जनवरी के प्रदर्शनों में शामिल होने के आरोप में रिवोल्यूशनरी कोर्ट ने उन्हें मोहारेबेह यानी “ईश्वर के खिलाफ जंग” का दोषी ठहराया था। फाँसी से पहले उनका परिवार जेल के बाहर इकट्ठा हुआ था ताकि सजा रोकी जा सके।
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इस्फहान का प्रदर्शन मामला
जुलाई के आखिर में इस्फहान के अलीखानी चौक पर अमीरहोसैन सफारी और अबुलफजल सेपाही को फाँसी दी गई। वे उन 12 युवाओं में शामिल थे जिन्हें शहर में जनवरी के प्रदर्शनों से जुड़े मामले में मौत की सजा सुनाई गई थी। अधिकारियों ने उन पर चार सुरक्षाकर्मियों की मौत, आगजनी और तोड़फोड़ का आरोप लगाया था। उसी मामले में गोलमोहम्मद मोहम्मदी और इरफान इस्फंदियारी को 19 जुलाई को फाँसी दी गई थी।
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने जुलाई में ही तेहरान से इस मामले में फाँसियाँ रोकने की अपील की थी। उन्होंने बंद कमरे में मुकदमा, दुर्व्यवहार के आरोप और राज्य टीवी पर प्रसारित कबूलनामों पर चिंता जताई थी। विशेषज्ञों ने कहा कि एक ही सुनवाई में 12 लोगों को मौत की सजा देना, बंद अदालत और हर आरोपी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी साफ न होना निष्पक्ष मुकदमे के मानकों का उल्लंघन है। आरोपी देर किशोरावस्था से लेकर शुरुआती बीस साल की उम्र के थे। उन्हें मनमानी गिरफ्तारी, जबरन गायब किया जाना और कुछ मामलों में दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा।













