ईरान जल रहा है : खामेनेई शासन के खिलाफ सबसे खूनी आंदोलन, 20 दिनों में 2,500+ मौतें
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ईरान जल रहा है : खामेनेई शासन के खिलाफ सबसे खूनी आंदोलन, 20 दिनों में 2,500+ मौतें

ईरान में अभूतपूर्व जनविद्रोह, 20 दिनों में 2,500+ मौतें। महंगाई से शुरू हुआ आंदोलन अब खामेनेई और इस्लामी शासन के खिलाफ निर्णायक जंग बन चुका है। पढ़ें पूरी रिपोर्ट

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी — edited by Shivam Dixit
Jan 14, 2026, 06:29 pm IST
inविश्व

ईरान इस समय अपने इतिहास के सबसे उथल-पुथल भरे और निर्णायक दौर से गुजर रहा है। खस्ताहाल अर्थव्यवस्था, रिकॉर्ड महंगाई, बेरोजगारी और दशकों से चले आ रहे दमनकारी धार्मिक शासन के खिलाफ भड़का जनाक्रोश अब एक व्यापक और हिंसक जनविद्रोह का रूप ले चुका है। अमेरिका स्थित ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज एजेंसी (HRANA) के अनुसार बीते बीस दिनों में देशभर में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान अब तक कम से कम 2,571 लोगों की मौत हो चुकी है। यह आंकड़ा 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान में किसी भी आंदोलन के दौरान हुई मौतों से कहीं अधिक है और इस बात का संकेत है कि ईरानी समाज अब भय की दीवारें तोड़ चुका है।

आर्थिक संकट से सत्ता विरोध तक पहुंचा आंदोलन

उल्‍लेखनीय है कि आंदोलन करीब दो सप्ताह पहले ईरान की गिरती अर्थव्यवस्था और रियाल मुद्रा के ऐतिहासिक पतन के विरोध के साथ शुरू हुआ था। लेकिन देखते ही देखते यह आर्थिक मांगों तक सीमित न रहकर इस्लामी धर्मतंत्र और सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ सीधे विद्रोह में बदल गया। तेहरान, मशहद, इस्फहान, शिराज और तबरीज जैसे बड़े शहरों के साथ-साथ छोटे कस्बों में भी लोग सड़कों पर उतर आए। दीवारों पर लिखे “खामेनेई मुर्दाबाद” जैसे नारे और सत्ता परिवर्तन की मांग करते ग्रैफिटी इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि प्रदर्शनकारी अब सुधार नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को बदलना चाहते हैं।

मौतों और गिरफ्तारियों के डरावने आंकड़े

मानवाधिकार संगठनों द्वारा जारी आंकड़े इस आंदोलन की भयावहता को उजागर करते हैं। HRANA के मुताबिक मृतकों में 2,403 प्रदर्शनकारी शामिल हैं, जबकि 147 लोग सरकार समर्थक या सुरक्षाबलों से जुड़े बताए गए हैं। मरने वालों में 12 बच्चे भी शामिल हैं, जो यह दर्शाता है कि दमन की कार्रवाई किस कदर बेकाबू हो चुकी है। इसके अलावा नौ ऐसे नागरिकों की भी मौत हुई है जो किसी भी प्रदर्शन में शामिल नहीं थे। इसी अवधि में 18,100 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें छात्र, मजदूर, महिलाएं और बुजुर्ग तक शामिल हैं।

सरकार की चुप्पी और आधी-अधूरी स्वीकारोक्ति

कई दिनों तक चुप्पी साधे रखने के बाद ईरान सरकार ने पहली बार मौतों की पुष्टि की। सरकारी टेलीविजन पर एक अधिकारी ने कहा कि देश में “कई शहीद” हुए हैं और मृतकों को इतनी गंभीर चोटें आई थीं कि पहले आंकड़े जारी करना संभव नहीं था। हालांकि सरकार ने अब तक कुल हताहतों की स्पष्ट संख्या जारी नहीं की है। इस अस्पष्टता ने उसकी पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, खासकर तब जब मानवाधिकार संगठन पहले ही हजारों मौतों की जानकारी सार्वजनिक कर चुके हैं।

इंटरनेट बंदी और सूचना पर सख्त पहरा

दमन की रणनीति के तहत सरकार ने लगभग पूरे देश में इंटरनेट और संचार सेवाएं ठप कर दीं। मोबाइल डेटा, सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय कॉलिंग सेवाओं पर रोक लगा दी गई ताकि प्रदर्शन की तस्वीरें और वीडियो दुनिया तक न पहुंच सकें। कई दिनों बाद जब कुछ ईरानियों ने विदेश में संपर्क किया, तब जले हुए सरकारी भवनों, टूटे एटीएम, खाली सड़कों और भारी सैन्य तैनाती की तस्वीरें सामने आईं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने भी स्वीकार किया कि इंटरनेट बंद होने के कारण स्वतंत्र पुष्टि करना मुश्किल हो गया है।

सड़कों पर सुरक्षाबलों का सख्त पहरा

तेहरान सहित कई शहरों में दंगा रोधी पुलिस, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड और बासिज मिलिशिया की भारी तैनाती देखी जा रही है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सुरक्षाबल हेलमेट, कवच, ढाल, लाठी, शॉटगन और आंसू गैस से लैस हैं। सादे कपड़ों में खुफिया एजेंट सार्वजनिक स्थानों पर लोगों को रोककर पूछताछ कर रहे हैं। कई इलाकों में बैंकों और सरकारी इमारतों को आग के हवाले कर दिया गया। इसके बावजूद राजधानी का ग्रैंड बाजार, जहां से आंदोलन की चिंगारी भड़की थी, सुरक्षा बलों के दबाव में दोबारा खुलवाया गया।

महिलाओं का साहसिक प्रतिरोध बना आंदोलन की पहचान

इस आंदोलन की सबसे प्रभावशाली तस्वीरें महिलाओं के प्रतिरोध से सामने आई हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में महिलाएं सार्वजनिक रूप से हिजाब उतारती दिख रही हैं, जिन्हें आसपास मौजूद लोग समर्थन और तालियों के साथ प्रोत्साहित कर रहे हैं। अन्य वीडियो में प्रदर्शनकारी खामेनेई की तस्वीरों को जलाते और उन पर सिगरेट सुलगाते नजर आए। ये दृश्य इस बात का प्रतीक हैं कि विरोध अब केवल आर्थिक संकट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धार्मिक नियंत्रण और सामाजिक पाबंदियों के खिलाफ खुला विद्रोह बन चुका है।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और कूटनीतिक तनाव

मृतकों की संख्या सामने आने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने ईरानी प्रदर्शनकारियों से आंदोलन जारी रखने और संस्थानों पर कब्जा करने का आह्वान किया तथा यह भी कहा कि मदद रास्ते में है। इसके बाद उन्होंने ईरानी अधिकारियों के साथ सभी बैठकों को रद्द करने की घोषणा की। जवाब में ईरान के सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव अली लारीजानी ने ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर तीखा हमला बोला और उन्हें “ईरानी जनता का मुख्य हत्यारा” बताया। सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए चेतावनी दी है कि प्रदर्शनकारियों को “ईश्वर का शत्रु” मानकर मृत्युदंड दिया जा सकता है। जिसने भय का माहौल और गहरा कर दिया है।

इस संदर्भ में उल्‍लेखित है कि यह आंदोलन 2009 के ग्रीन मूवमेंट, 2019 के पेट्रोल विरोध और 2022 के महसा अमिनी आंदोलन से कहीं अधिक व्यापक और हिंसक है। कुछ ही हफ्तों में हजारों मौतें इस बात का संकेत हैं कि ईरान एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें ईरान पर टिकी हैं, क्योंकि यहां चल रही यह लड़ाई स्वतंत्रता, सत्ता और मानवाधिकारों की निर्णायक जंग बन चुकी है।

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डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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