‘भारतीय ज्ञान का श्रुति-संवाद’ : पारंपरिक ज्ञान बना आधुनिक शिक्षा का हिस्सा
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‘भारतीय ज्ञान का श्रुति-संवाद’ : पारंपरिक ज्ञान बना आधुनिक शिक्षा का हिस्सा

संस्कृति मंत्रालय के अनुसार वैदिक जप विश्व की सबसे प्राचीन और दीर्घजीवी मौखिक परंपराओं में से एक है, जिसे यूनेस्को ने ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर‘ के रूप में मान्यता दी है

कुशाग्र राजेंद्रदेविना कौल कृष्णाWritten byकुशाग्र राजेंद्रandदेविना कौल कृष्णा
Aug 8, 2026, 07:16 pm IST
inधर्म-संस्कृति

भारत की विशालता और विविधता के कारण इसे एक उपमहाद्वीप के रूप में वर्णित किया जाता है। यह विभिन्न भाषाओं की विविधता को समेटे हुए है। ‘ भारतीय लोक भाषा सर्वेक्षण’ के अनुसार देश में 780 से अधिक जीवंत भाषाएं बोली जाती हैं, जबकि भारत सरकार के अनुसार 19,569 दर्ज मातृभाषा को समेकित कर 121 प्रमुख भाषाओं (जिनमें 22 अनुसूचित भाषाएं हैं) को मान्यता प्राप्त है। इस विराट भाषिक संसार की सबसे प्रमुख विशेषता इसकी ज्ञान-परंपरा है,जो केवल ग्रंथों में नहीं, बल्कि लोकस्मृति, वाणी और जीवंत सामाजिक व्यवहार में सुरक्षित रही हैं। वस्तुतः भारत की वास्तविक शक्ति उसकी भाषाई विविधता और वाचिक परंपरा है, जिसने अलिखित अभिलेखों के भी ज्ञान को अक्षुण्ण रखा और निरंतर समृद्ध किया। आज जब विश्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से ज्ञान के नए प्रतिमान गढ़ने में व्यस्त है, तब भारत अपनी हजारों वर्ष पुरानी वाचिक ज्ञान-परंपरा के आधार पर एक नए ‘डिजिटल श्रुति-युग’ की ओर अग्रसर है। इस मिशन के माध्यम से भारत ज्ञान, भारतम् मिशन, जैसी पहल के माध्यम से प्राचीन पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण हो रहा है, भारतीय भाषाओं को कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जोड़ा जा रहा है और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक शिक्षा एवं अनुसंधान का हिस्सा बना रहा है।

ज्ञान की मौखिक विरासत

भारतीय वाङ्गमय की सबसे विशिष्ट पहचान उसकी सशक्त मौखिक परंपरा रही है। भाषा विज्ञान की एक महत्वपूर्ण समझ है कि जहां लोग बोलते हैं, वहां साहित्य होगा ही और यही मूल बात है। इसका संचरण लिखित और मौखिक भी हो सकता है, जो भारतीय वाङ्गमय का एक मौलिक पहलू है, जो किसी अन्य ज्ञान परंपरा में विकसित नहीं हुई। भारतीय ज्ञान स्वाभाविक रूप से केवल लिखित न होकर मूलतः श्रुति, वाचन, गायन और प्रदर्शन की परंपरा है जो वस्तुतः उद्घोषणा, उच्चारण, लयबद्ध गायन, श्रवण और देखे जाने के लिए है। यह परंपरा सभ्यता के साथ विकसित हुई। महाभारत और रामचरितमानस रचनाशीलता के सर्वोत्तम उदाहरण हैं। लिखित रूप में उपलब्ध होने के बाद भी उनकी छंदात्मक संरचना उन्हें मौखिक पाठ और गायन के लिए समान रूप से उपयुक्त बनाती है। भारतीय बौद्धिक संस्कृति की संरचना, जहां विचार कहानियों, गीतों और नाटकों के माध्यम से संप्रेषित होते हैं और जो दृष्टांत उदाहरणों के रूप में कार्य करते हैं, इस मौखिक नींव को सुदृढ़ करते हैं।

वाचिक परंपरा-सामूहिकता का स्वरुप

भारत में साहित्य और श्रोताओं के बीच संबंध का आधार मौखिक परंपरा रही है। रोमन लिपि-आधारित साहित्य अक्सर व्यक्तिवादी होता है, जबकि भारतीय साहित्य सहभागी, प्रदर्शनकारी और सामूहिक जीवंतता का संवाहक रहा है। यहां दर्शक-कलाकार, रचनाकार-श्रोता दोनों सहभागी होते हैं। वैदिक मंत्रपाठ, महाभारत और रामायण के नाट्य रूपांतरण, कर्नाटक का यक्षगान, केरल का कथकली, उत्तर भारत की रामलीला तथा सत्संग-कथा जैसी परंपरा ज्ञान की सामूहिक अनुभूति में बदल जाती है। यह संवाद है न कि एकालाप। जहां ‘साहित्य सीधे सामूहिक भावना’ में बदल जाता है। वस्तुतः यह साहित्य के लोकतंत्रीकरण का भारतीय स्वरूप है।

मौखिक परंपराओं की व्यापकता के कारण ज्ञान की स्मृति और संरक्षण के लिए परिष्कृत विधियों का विकास हुआ। उदाहरण के लिए, वेदों का संरक्षण ‘श्रुति’ परंपरा में हुआ। इसे सुनकर और कंठस्थ करने के बाद कालांतर में लिपिबद्ध किया गया। इसी प्रकार गुरु ग्रंथ साहिब ‘बानी’ है, जिसे रागों में गाकर आत्मसात किया जाता है। संस्कृति मंत्रालय के अनुसार ‘वैदिक जप’ विश्व की सबसे प्राचीन और दीर्घजीवी मौखिक परंपराओं में से एक है, जिसे यूनेस्को ने मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता दी है। यूरोपीय विद्वान मैक्समूलर ने भी स्वीकार किया कि सहस्राब्दियों बाद भी वेद अपने मूल स्वरूप में सुरक्षित हैं। इसका श्रेय वैदिक ऋ षियों को है, जिन्होंने ग्रंथों के संरक्षण के लिए अक्षरों और स्वरों को विकसित किया।

भारतीय ज्ञान परंपरा और डिजिटल प्रौद्याेगिकी

भारत सरकार की पहल पर ज्ञान भारतम् मिशन, राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन, अष्टादशी परियोजना, पीएम ई-विद्या, स्वयं तथा अन्य डिजिटल ज्ञान पहल ने भारतीय ज्ञान-संपदा को वैश्विक शोध समुदाय और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त किया है। ज्ञान भारतम् मिशन में अब तक 50 लाख प्राचीन पांडुलिपियों की मैपिंग, 7.5 लाख की डिजिटाइजेशन और 1.29 लाख तो आमजन के लिए उपलब्ध भी हो चुके है, जो आध्यात्मिक समझ के साथ-साथ आयुष, योग, पारंपरिक कृषि, स्थानीय जल प्रबंधन और लोकज्ञान पर आधारित शास्त्रीय और लोक परंपरा के प्राचीन संवाद को भी पुनर्जीवित कर रहे है। यदि वेदों की मौखिक परंपरा ने सहस्राब्दियों तक ज्ञान को अक्षुण्ण रखा, तो आज वही परंपरा कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल प्रौद्योगिकी के माध्यम से एक नए डिजिटल श्रुति-युग में प्रवेश कर रही है। माध्यम बदल रहे हैं, पर भारतीय ज्ञान की आत्मा आज भी वाणी, संवाद और लोक-सहभागिता में ही निहित है।

वेद- जटिल मौखिक तकनीक

वेदों को हजारों वर्षों तक अक्षरशः सुरक्षित रखना मानव इतिहास की सबसे विलक्षण बौद्धिक उपलब्धियों में से एक है। प्राचीन ऋ षियों ने भूल, विकृति और मिलावट से बचाने के लिए एक ऐसी मौखिक संरक्षण प्रणाली विकसित की, जिसे आधुनिक दृष्टि से एक प्रकार का ‘गणितीय कोडिंग सिस्टम’ कहा जा सकता है। अगर कोई व्यक्ति बोलते समय एक भी शब्द भूलता या बदलता, तो यह पूरा गणितीय ताना-बाना टूट जाता था, और गलती तुरंत पकड़ में आ जाती है।

ज्ञान को स्मरणीय बनाने के लिए भारी-भरकम और उदासीन गद्य के स्थान पर छंद, लय और सूत्र-पद्धति अपनाई गई। अमरकोश जैसा विशाल शब्दकोश पद्य में रचा गया। याद करने, समझने और प्रभावशाली बनाने के लिए सूत्र, अनुवृत्ति और स्वर-आधारित तरीके अपनाए गए। जैसे ‘सूत्रात्मक’ शैली जिसमें भारी-भरकम विचारों को गणित के फाॅर्मूले जैसे छोटे ‘सूत्रों’ में बांधना। अनुवृत्ति शैली में एक बात को अगली बात से जोड़ देना, ताकि पिछला याद आते ही आगे की बात अपने आप याद आ जाए। इसके साथ-साथ स्वरों का उतार-चढ़ाव, जिसमे मंत्रों के स्वराघात को ऐसा रखा गया कि वे दिमाग के लिए ‘श्रवण उत्प्रेरक’ का काम करें, ताकि स्मृति और समझ दोनों तेजी से काम करे। परिणामस्वरूप आचार्य अपने मस्तिष्क में विशाल ज्ञान-संपदा को सुरक्षित रखते थे, वे अनेक विषयों में पारंगत होते थे और अत्यल्प शब्दों में गहन विचार व्यक्त कर पाते थे। यही भारतीय वाचिक परंपरा की अद्वितीय वैज्ञानिकता और बौद्धिक परिष्कार का प्रमाण है।

व्यास परंपरा-ताकि ज्ञान कुंद न पड़ जाए

भारतीय ज्ञान परंपरा की सबसे बड़ी शक्ति उसकी निरंतरता और सतत विकसित होने वाली प्रकृति रही है। प्रो. कपिल कपूर के अनुसार ज्ञान कभी स्थिर नहीं रहा बल्कि पूर्ववर्ती ज्ञान के आधार पर उसकी परंपरा आगे बढ़ती रही। विदेशी आक्रमणों से विश्वविद्यालय और पुस्तकालय नष्ट हुए, फिर भी ज्ञान अक्षुण्ण रहा, क्योंकि वह जनमानस की मौखिक स्मृति में सुरक्षित रहा। इस मौखिक संस्कृति के भीतर ज्ञान को सुरक्षित रखने, उसे समय के अनुकूल ढालने और नया बनाए रखने की एक अद्भुत अंतर्निहित व्यवस्था थी। इसके तहत प्राचीन ग्रंथों को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए समय-समय पर टीकाओं, पुनर्पाठ, अनुवाद और पुर्नव्याख्या के माध्यम से ज्ञान को युगानुकूल बनाए रखा गया।

ज्ञान की सतत पुनर्सृजन की प्रक्रिया के लिए कुछ लोग या लोगों के समूह आगे आए और समय व देशकाल के अनुसार इसे प्रतिस्थापित किया, जिन्हें व्यास परंपरा कहा गया। कृष्ण द्वैपायन ने पहली बार चारों वेदों के मूलभूत ज्ञान का संकलन किया। वेद अस्तित्व में आए तभी तो उन्हें वेदव्यास के नाम से जाना गया। कृष्ण द्वैपायन ने वेदों का संकलन कर वेदव्यास की उपाधि प्राप्त की। महाभारत युद्ध के बाद व्यापक विनाश के बाद राजा जनमेजय के समय ज्ञान के पुनर्संगठन का कार्य हुआ। परंपरा के अनुसार अब तक 28 व्यास भारतीय ज्ञान को पुनर्परिभाषित कर चुके हैं। गुरु नानक भी इसी परंपरा की कड़ी हैं, जिन्होंने व्यापक यात्राओं से अर्जित जीवन-दर्शन को गुरु ग्रंथ साहिब में प्रतिष्ठित किया।

मौखिक परंपरा-कल आज और कल

इक्कीसवीं सदी में भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनर्जागरण केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य के ज्ञान-समाज की आधारशिला बन रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने भारतीय भाषाओं, मातृभाषा और भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा एवं अनुसंधान की मुख्यधारा में पुनःस्थापित किया है। विश्वविद्यालयों में भारतीय ज्ञान प्रणाली प्रकोष्ठों की स्थापना, भारतीय भाषा समिति, भाषा संगम, तथा भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने जैसी कदमों ने भाषा को सभ्यता की स्मृति और ज्ञान के संवाहक के रूप में पुनः प्रतिष्ठित किया है। वहीं ‘भाषिणी’ और ‘अनुवादिनी’ जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मंच उस भारतीय वाचिक परंपरा का आधुनिक विस्तार हैं, जहां ज्ञान का मूल आधार श्रुति, संवाद और जीवंत भाषिक परंपरा रही है।

Topics: व्यास परंपरालोक संस्कृतिभाषिणीभारतीय ज्ञान परंपराकृत्रिम बुद्धिमत्ताज्ञान भारतम् मिशनसामूहिक चेतनावाचिक परंपरामौखिक विरासतडिजिटल श्रुति-युगभाषाई विविधतावेदिक जपराष्ट्रीय शिक्षा नीति
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