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गाली मुक्त Gen Z : भाषा और व्यवहार आपके कर्म का निर्धारण करते हैं

सीजेपी आंदोलन में जिन युवाओं ने यह कंटेंट क्रियेट किया है, उन्हें लगा कि इससे वे वायरल होंगे और उनके सब्सक्राइबर भी बढ़ेंगे। इन बच्चों को समझाने की जरूरत है। भारत की पहचान देश की संस्कृति से है।

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डॉ सुनील जागलान

जंतर-मंतर पर सीजेपी आंदोलन के दौरान असभ्य भाषा पर विमर्श नहीं हुआ और समाधान नहीं खोजा गया तो यह परिवारों पर ही भारी पड़ेगा। यह एक बड़ी विफलता है कि हम बच्चों में संस्कार नहीं लेकर आ पाए। बड़े-छोटे, देश का लिहाज, संस्कृति का लिहाज, समाज का लिहाज, उन्हें इसका अहसास नहीं है। इस तरह की असभ्य भाषा कि वजह से घर के अंदर, परिवार के साथ जो संवाद होगा, उसमें लिहाज खत्म हो जाएगी। यह पीढ़ी अभिभावकों का सम्मान नहीं कर पाएगी। माता-पिता के अंदर अकेलापन आयेगा। वे अवसाद का शिकार हो जाएंगे।

इसके पीछे सबसे बड़ा कारण क्या है ?

इस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण क्या है ? क्योंकि अचानक से तो चीजें नहीं हुई हैं। संवाद समाप्त हुआ, दिमाग का भोजन और जीभ का स्वाद भी बदला। गालियां तो अपने यहां भी थीं, लेकिन जुबान पर इतनी नहीं थीं। कंटेंट क्रियेटर का जो काम आया है, सामान्य प्रकार के चुटकुलों पर शरीर की प्रतिक्रिया का आना खत्म हो गया तो दूसरा प्रयोग किया और उसे नाम दे दिया नॉन-वेज। उसे पहले खाने से जोड़ दिया कि यह उसकी खुद की पसंद है। लेकिन बोलने की पसंद के बारे में किसी ने यह नहीं सोचा कि यह विचार जो वे खाते चले जाएंगे और सोशल मीडिया का इस तरह से दुरुपयोग करेंगे, उसका क्या प्रभाव होगा। यह लड़के और लड़की दोनों के लिए है।

पहले ही पड़ गई थी नींव

जो बच्चे आज जंतर-मंतर पर गालियां देते दिखे, इसकी नींव तो तब ही पड़ गई थी जब वे सातवीं और आठवीं में थे और वीडियो गेम खेलते थे। उस समय कंटेंट क्रियेटर और इन्फ्लूएंसर गालियों का प्रयोग करते थे। ये फिर स्कूलों में पहुंचीं और फिर इसको सामान्य मान लिया गया। लेकिन नए भारत में यह सामान्य बात नहीं है। देश के बड़े इन्फ्लूएंसर्स को इस पर बात करनी चाहिए। इन विषयों पर बोलना चाहिए।

विपक्ष को भी इसे समझना चाहिए। वे सत्ता पक्ष के लिए इस तरह की भाषा सुनकर हो सकता है कि खुश हो रहे हों लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि इस तरह की गाली एक दिन देश के हर नागरिक को पड़ेगी। यह आने वाले समय में बड़ी सामाजिक समस्या बन जाएगी। जनरेशन जेड से इसे जनरेशन अल्फा में जाने से रोकना होगा। सरकार और शिक्षा विभाग भी इसको लेकर कार्यशाला चलाएं।

सीजेपी आंदोलन में जिन युवाओं ने यह कंटेंट क्रियेट किया है, उन्हें लगा कि इससे वे वायरल होंगे और उनके सब्सक्राइबर भी बढ़ेंगे। इन बच्चों को समझाने की जरूरत है। भारत की पहचान देश की संस्कृति से है। अगर यह भारत के पास नहीं है तो हम कितना भी आगे बढ़ जाएं हमारी पहचान खत्म हो जाएगी। हम विश्वगुरु नहीं रह पाएंगे। वाणी और व्यवहार, यह आज के समय की सबसे जरूरी चीज है। यही आपके कर्म निश्चित करते हैं। दोनों चीजें वाणी और व्यवहार खराब हो गए, फिर आप क्या ही बन लोगे?

अपशब्दों पर एक बड़ा शोध, 11 साल का अध्ययन

11 साल तक लंबे सर्वे (गाली बंद घर अभियान) के बाद रिपोर्ट जारी की थी। रिपोर्ट में बताया था कि सबसे ज्यादा गाली देने के मामले में दिल्ली पहले स्थान पर है, जहां करीब 80% लोग अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं। पंजाब दूसरे (78%) और उत्तर प्रदेश व बिहार (74%) संयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर हैं। राजस्थान में 68%, हरियाणा और महाराष्ट्र में 62%, गुजरात में 55% और मध्य प्रदेश में 48% लोगों ने अपशब्दों के प्रयोग की बात स्वीकार की।

सर्वे में लगभग 70,000 लोगों को शामिल किया था। अध्ययन में यह भी सामने आया था कि न सिर्फ पुरुष, बल्कि लगभग 30% महिलाएं और कॉलेज की लड़कियां भी रोजमर्रा की बातचीत में गालियों का उपयोग करती हैं। सुनील को यह सर्वे करने की प्रेरणा तब मिली जब उनकी बेटी ने खेल के मैदान में सुनी एक गाली का मतलब उनसे पूछा। इसके बाद उन्होंने महसूस किया कि पंचायत बैठकों से लेकर रोजमर्रा की बातचीत तक, महिलाओं को लेकर अपमानजनक शब्द कितनी सहजता से बोले जाते हैं, जोकि ठीक नहीं है।

 

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