क्या यह Gen Z की भाषा है? इस कथित 'कूलनेस' को जेन एक्स, मिलियनेयल्स ही नहीं, अल्फा भी नकार देंगे
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क्या यह Gen Z की भाषा है? इस कथित ‘कूलनेस’ को जेन एक्स, मिलियनेयल्स ही नहीं, अल्फा भी नकार देंगे

लड़कियां गालियां दे रही थीं और जब इन लड़कियों की गालियों पर प्रश्न उठ खड़े हुए तो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर खड़ा हुआ एक वर्ग यह कहने लगा कि “गालियां तो भारत के लोक में ही हैं, तो उसमें आपत्ति क्या है!”

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Jul 28, 2026, 05:58 pm IST
inभारत
जंतर मंतर पर नीट परीक्षा को लेकर हुआ था प्रदर्शन

जंतर मंतर पर नीट परीक्षा को लेकर हुआ था प्रदर्शन

जंतर-मंतर पर आंदोलन समाप्त हो चुका है। इसे जेन जी अर्थात ऐसी पीढ़ी का आंदोलन कहा गया, जिसका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ है। इस पीढ़ी को लेकर कहा जाता है कि यह बहुत जिम्मेदार और संवेदनशील है।

इन सबके अतिरिक्त जो सबसे बड़ी बात उभरकर आई, वह थी कथित जेन जी और उस पर लड़कियों की भाषा। लड़कियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए जिस भाषा का प्रयोग किया, उसने आम लोगों को हतप्रभ कर दिया। हर संवेदनशील व्यक्ति एक क्षण को ठहरकर सोचने लगा कि क्या यही वह पीढ़ी है, जिसे समझदार कहा जाता है और जो सरकारें बदल देती है। प्रधानमंत्री मोदी की दिवंगत माता जी को भी गाली दी गई। अश्लीलता की हर सीमा पार की गई। यह भाषा घर में तो नहीं ही बोली जा सकती, भारत का जेन एक्स और मिलियनेयल्स ही नहीं, अल्फा भी नकार देगा।

जेन जी: भाषा और मर्यादा से परे हैं क्या?

लड़कियां गालियां दे रही थीं और जब इन लड़कियों की गालियों पर प्रश्न उठ खड़े हुए तो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर खड़ा हुआ एक वर्ग यह कहने लगा कि “गालियां तो भारत के लोक में ही हैं, तो उसमें आपत्ति क्या है!” गालियां भारत के लोक में हो सकती हैं, मगर देश के नेतृत्व के प्रति अश्लील शब्दावली भारत के लोक का हिस्सा नहीं रही है। उस पर भी मां और बहन की गालियां अस्वीकार हैं।

यह भी कहा जा रहा है कि शादी-विवाह में भी तो गाली गीत गाए जाते हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या इन्हें उन अपशब्दों के समकक्ष रख सकते हैं, जो कथित जेन जी ने देश के नेतृत्व के लिए या फिर उनकी दिवंगत माताजी के लिए कहे?

कूल दिखाने के लिए गालियां?

यह एक महत्वपूर्ण बिन्दु है, जिस पर बात होनी चाहिए। गालियां देने से कुछ लड़कियां खुद को कूल समझने लगती हैं। ऐसा उनके मन में कई फिल्मों या ओटीटी सीरीज के माध्यम से डाल दिया गया है कि लड़कियों को गाली देना कूल लगने लगा है। मां-बहन की गालियां देना उन्हें सहज लगने लगा है। यह पीढ़ी एकदम से इस तरह से अभद्र हुई है, ऐसा नहीं है। इसे बहुत श्रम से गढ़कर तैयार किया गया है। उनके दिमाग में बहुत सब्र के साथ कचरा भरा गया है, या कहें उनके माता-पिता के दिमागों में भी, क्योंकि शायद वे तभी यह महसूस नहीं कर पाते हैं कि उनकी बेटियों से क्या गलती हुई है?

याद करें वे फिल्में, जिनमें लड़कियों का गाली देना कूलनेस दिखाया गया है। याद करें वे फिल्में जिनमें माता-पिता के हर कदम को नीचा दिखाया जाता था और नई पीढ़ी को नायक। “छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी” जैसे गाने हमारे दिलों में अभी तक बसे हुए हैं। तो पुरानी पीढ़ी को कोसना तो कूलनेस बना ही दिया गया था। अब बात गालियों की। वीरे दी वेडिंग फिल्म तो याद ही होगी। इस फिल्म पर हंगामा हुआ था, कि लड़कियों ने गालियां दी हैं, मगर इसमें यह कहा गया कि क्या गालियों पर केवल लड़कों का हक है? महिला सशक्तिकरण के नाम पर ऐसे शब्दों की भरमार की गई, जो किसी भी सभ्य समाज का हिस्सा हो ही नहीं सकते हैं। ‘फ़ोर मोर शॉट्स प्लीज़’ जैसी वेब सीरीज़ ने भी यही दिखाया। महिला सशक्तिकरण का पैमाना विचारों की गहराई, बौद्धिकता या संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह अब शराब का गिलास हाथ में लेकर, मुंह से माँ बहन की गालियां निकालना और केवल देह के आधार पर देह संबंधों को बनाना रह गया है।

गोलमाल 3 में नायिका को केवल कूल दिखने के लिए गालियों वाले डायलॉग दिए गए थे। अब जो यह कूलनेस का पैमाना गाली देना रह गया है, और भी प्रजनन अंगों से जुड़ी गालियों को देना, वह बहुत ही घातक है। अब पर्दा यह सिखाने ही नहीं लगा है, बल्कि सिखा चुका है कि प्रजनन अंगों से जुड़ी गालियां देना ही आधुनिकता का पैमाना है। ऐसे में उन लड़कियों से जो इस कूलनेस के पैमाने की चैंपियन खुद को मानती हैं, यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है, कि वे प्रधानमंत्री की आलोचना सकारात्मक करेंगी और वह भी तब जब उस आंदोलन में केवल मामला NEET का था?

‘विक्टिम कार्ड’ और ‘जेंडर कार्ड’ का कुतर्क

सोशल मीडिया पर यह कुतर्क दिया जा रहा है कि “समस्या गाली से नहीं है, समस्या यह है कि लड़की गाली क्यों दे रही है! यह तो पुरुषसत्तात्मक सोच (Patriarchy) है।” मगर वे यह भूल जाती हैं कि अभद्रता का कोई जेंडर नहीं होता। देश के नेतृत्व के प्रति और उनकी दिवंगत माताजी के लिए या फिर किसी की भी दिवंगत माताजी के लिए बोली गई अभद्र भाषा स्वीकार्य नहीं है।

प्रश्न लड़की होने पर नहीं है, बल्कि उसकी संस्कार हीनता और भाषिक हिंसा को लेकर है और यह जेंडर निरपेक्ष होती है। और दूसरी और महत्वपूर्ण बात कि यदि कोई समानता की बात करता है तो क्या लड़कों की कथित बुराइयों को अपनाकर ही समानता हासिल की जा सकती है? यदि जिन्हें आप पुरुषसत्तात्मक बुराई कहती हैं, तो क्या उनसे लड़ने का अर्थ है उन्हें इस तरह आत्मसात कर लेना कि आप उनसे भी आगे बढ़ जाएं?

यह कुतर्क है और कुछ नहीं। इसे ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी भी सभ्य समाज में गाली किसी भी जेंडर के व्यक्ति के हाथ में क्रांति का हथियार कभी भी नहीं हो सकती है, और लड़कियों को ढाल बनाकर इस अश्लीलता को सही ठहराना बंद होना चाहिए। लड़कियां ही क्यों, लड़कों को भी इस भाषा को बोलने से रोकना चाहिए।

Topics: कॉकरोच जनता पार्टीसीजेपी आंदोलनजंतर-मंतर पर आंदोलनभाषा विमर्श
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