सीजेपी आंदोलन के दौरान जेन जी की जो भाषा सामने आई, उसने कई पहलुओं पर सोचने को मजबूर किया। इस तरह की अभद्र, अश्लील और असभ्य भाषा का अनुमोदन बिल्कुल नहीं करना चाहिए। भाषा विचारों की वाहिका होती है, उसमें संप्रेषण होना चाहिए। आपके भावों को वह दूसरों तक पहुंचाए। लेकिन प्रदर्शन के दौरान कौन सा भाव आप पहुंचाना चाहते थे और किस भाषा का आपने प्रयोग किया, इन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर था। आप बात तो करना चाहते थे शिक्षा व्यवस्था पर, पेपर लीक पर, लेकिन आपने असभ्य, फूहड़ भाषा का प्रयोग किया। पेपर लीक और शिक्षा पर बात न करके दूसरे-दूसरे विषयों को लेकर बातें कीं, जो बिल्कुल ही समर्थन योग्य नहीं था।
यह युवाओं की भाषा नहीं
यह भी कहा जा रहा है कि आज के युवा की यह भाषा है और युवा इसी भाषा में बोल रहा है, मैं इससे सहमत नहीं हूं। मैं रोज युवाओं से मिलती हूं, कॉलेज में, विश्वविद्यालयों और औपचारिक मंचों पर ही नहीं, अनौपचारिक मंचों पर भी मिलती हूं, उनकी भाषा ऐसी नहीं होती है। यह उन्हीं युवाओं की भाषा है, जो सोशल मीडिया पर लाइक के लिए काम कर रहे हैं, जो सोशल मीडिया पर अपनी वैल्यू बढ़ाने और धन अर्जित करने के लिए काम कर रहे हैं।
गाली युक्त भाषा को कौन दे रहा बढ़ावा
इसको बढ़ावा देने वाले लोग कौन हैं? स्टैंड-अप कॉमेडियन और स्टैंड-अप टॉकिंग का जो एक चलन चल पड़ा है, उसमें आप देखिए कि जितने भी जज बैठे होते हैं, वे खुलेआम इस तरह की अश्लील भाषा का प्रयोग करते हैं। स्टैंड-अप कॉमेडियन वह भी खुलेआम गालियों का प्रयोग कर रहा है। उससे हो क्या रहा है? जितनी गाली, उतना व्यू। जितनी गाली, उतना कमेंट। और जितना कमेंट, जितना लाइक, उतना पैसा। तो यह भाषा सीधे-सीधे बाजार से जुड़ गई है। किसी को लाइक्स के कारण 500 मिल रहा है, किसी को 1,000 मिल रहा है और वह बढ़ाते जा रहे हैं कि आप और बढ़ाएँ तो और लाइक्स मिलेगा और पैसे मिलेंगे। यह एक चेन बन गई है, उस चेन को हम लोगों को रोकना है। इससे ऐसी भाषा का प्रयोग भी बंद होगा।
बच्चों को किस दिशा में ले जा रहे हैं
हमारे समाज में कुछ लोग इसका समर्थन कर रहे हैं कि भाई, यह महिलाएं जो हैं, लड़कियां जो हैं, बच्चियां जो हैं, वह लड़कों की भाषा में अगर बात कर रही हैं, अपने मन की बात कह रही हैं, तो इसमें गलत क्या है, बुरा क्या है? यह जेन जी की भाषा है और यह अश्लीलता से हमें मुंह नहीं मोड़ना चाहिए, यही आज की सच्चाई है। मैं इसके समर्थन में बिल्कुल नहीं हूं। वे इस तरह से बच्चों को समर्थन देकर उन्हें किस दिशा में ले जाना चाहते हैं? मैं एक बहुत सीधा सा प्रश्न उन सारे विचारकों और लोगों से, फेमिनिस्ट्स से पूछना चाहती हूं कि क्या उनके अपने बच्चे ऐसी ही अभद्र, अश्लील और फूहड़ भाषा में उन्हें संबोधित करें, उनसे बात करें, तो उनको कैसा लगेगा? क्या वे अपने बच्चों के मुंह से ऐसी बातें सुनना चाहेंगे? वह चाहेंगे कि उनके बच्चे भी ऐसी ही भाषा का प्रयोग करें और इसी भाषा में उनसे बात करें? जो लोग इस भाषा के समर्थन में उतरे हैं, वे सामने आएं और अपना उत्तर दें।
इन समाधानों पर दें ध्यान
निश्चित रूप से अगर समस्या है, तो समस्या से ज्यादा हमें समाधान पर बातचीत करना है। परिवार में जाकर देखना पड़ेगा, माता-पिता से बात करनी होगी। स्कूलों में, कॉलेजों में, विश्वविद्यालयों में भाषा को लेकर हमें कार्यशाला करनी होगी। भाषा का काम क्या है? भाषा भावों की वाहिका है, विचारों की वाहिका है। आप अपने विचारों को दूसरे तक संप्रेषित करते हैं और अगर आपके मन में किसी से असहमति है, नाराजगी है, तो उसके लिए भी भाषा में बहुत सुंदर-सुंदर शब्द हैं। आप उन भाषा का प्रयोग कीजिए, उस तरह से अपने विचारों को अभिव्यक्त कीजिए। गाली-गलौज भरी भाषा के जरिये जेन जी को भटकाया गया। कॉकरोच जनता पार्टी के आह्वान पर यह बच्चे आए थे और उन्होंने ऐसी भाषा का प्रयोग किया है, तो क्या वे (सीजेपी) इस भाषा का खंडन करते हैं? या फिर इसका समर्थन करते हैं? उन्हें यह बात स्पष्ट करनी चाहिए।












