युवाओं को अपने से अलग किसी वर्ग में मानना भारतीय दृष्टि नहीं
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होम भारत

युवाओं को अपने से अलग किसी वर्ग में मानना भारतीय दृष्टि नहीं

भारतीय संस्कृति में सवाल पूछने और संवाद करने की परंपरा बहुत पुरानी है। आज भी युवाओं के सवालों को दबाने के बजाय उन्हें ध्यान से सुनना, सही जवाब देना और असहमति के बावजूद बातचीत जारी रखना जरूरी है, ताकि उनकी जिज्ञासा समाज को आगे बढ़ाने में मदद करे।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Aug 26, 2026, 08:54 am IST
inभारत, सम्पादकीय

आज जब युवाओं के साथ संवाद की बात हो रही है तो हमें याद रखना चाहिए कि यह कोई नई शुरुआत नहीं है। हमारी परंपरा पहले से ही सिखाती आई है कि युवाओं को सुनिए, उनके प्रश्नों को समझिए और यदि वे सत्य का आग्रह लेकर सामने खड़े हैं तो उनके प्रश्नों का सम्मान कीजिए। क्योंकि संवाद वहीं से जन्म लेता है, जहां प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता होती है।

भारत में बच्चों और युवाओं से संवाद कोई नया प्रयोग नहीं है और न ही यह किसी नए विमर्श की देन है। भारतीय परंपरा में बाल मन की जिज्ञासा, उसके प्रश्न और सत्य को जानने की उसकी इच्छा को सदैव महत्व दिया गया है। यहां प्रश्न करने वाले बालक को इसलिए खारिज नहीं किया गया कि वह उम्र में छोटा है। यदि उसके प्रश्न के पीछे सत्य का आग्रह है तो उसे सुना, समझा और उचित स्थान दिया गया। आज युवाओं के साथ संवाद को लेकर उठ रहे विमर्श को इसी भारतीय दृष्टि के संदर्भ में समझने की आवश्यकता है।

कठोपनिषद की कथा में नचिकेता इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। नचिकेता की आयु 12 वर्ष थी, लेकिन उसकी जिज्ञासा साधारण नहीं थी। नचिकेता के पिता महर्षि वाजश्रवा ‘विश्वजित यज्ञ’ में बूढ़ी, बीमार और दूध न देने वाली गायों का दान कर रहे थे, जो शास्त्रसम्मत नहीं था। पिता को पाप से बचाने के लिए बालक नचिकेता ने बार-बार पूछा, ‘पिताजी, आप मुझे किसे दान में देंगे?’ क्रोध में पिता ने कह दिया, ‘मैं तुम्हें मृत्यु (यमराज) को देता हूं।’

वह सत्य जानना चाहता था। यही आग्रह उसे यमराज के पास तक ले गया। वहां भी उसने कोई सांसारिक वस्तु नहीं मांगी। उसने मृत्यु और उसके पार के सत्य को जानने का प्रश्न किया। यमराज ने अनेक प्रलोभन दिए, लेकिन वह अपने प्रश्न से विचलित नहीं हुआ। वह बालक था, लेकिन सत्य के प्रति उसका आग्रह उसे साधारण बालक से अलग बनाता था। भारतीय चिंतन ने उसे इसी कारण आदर्श माना। यह प्रसंग बताता है कि भारत की संस्कृति में बालक को प्रश्न करने का अधिकार रहा है।

अष्टावक्र का प्रसंग भी इसी भारतीय संवाद परंपरा की एक अनूठी मिसाल है। उनके जन्म से पूर्व की कथा में आता है कि जब उनके पिता ने क्रोधित होकर उन्हें शाप दिया, तब वे अजन्मे थे। जेन-जी और जेन-अल्फा जिन्हें कहा जा रहा है, वह तो फिर भी बड़े हैं। अजन्मे अष्टावक्र ने भी अपने पिता से प्रश्न किया और सत्य के आग्रह पर दृढ़ रहे। उनका उद्देश्य विवाद नहीं, सत्य को जानना था।

अष्टावक्र का प्रसंग आगे यह भी बताता है कि ज्ञान के सामने बाहरी रूप का कोई महत्व नहीं। महाराज जनक के दरबार में उनके शरीर को देखकर सभा में बैठे लोग हंसने लगे। अष्टावक्र ने प्रश्न खड़ा किया कि यदि किसी व्यक्ति को केवल उसकी चमड़ी और शरीर से परखा जाएगा तो फिर ज्ञान और शास्त्रार्थ का क्या अर्थ रह जाएगा? उनके प्रश्न ने सभा को आईना दिखाया। आज जिस ‘बॉडी शेमिंग’ की चर्चा आधुनिक विमर्श में होती है, उसके मूल प्रश्नों को भारतीय परंपरा में बहुत पहले उठाया जा चुका था।

किसी व्यक्ति की बात का मूल्य उसके शरीर, आयु या सामाजिक स्थिति से तय नहीं होता। उसका मूल्य इस बात से तय होता है कि उसके पास कहने के लिए क्या है और उसके तर्क में कितना सत्य है। यही कारण है कि अष्टावक्र जैसे बालक को विद्वानों की सभा में अपनी बात रखने का अवसर मिला।

भारतीय परंपरा में ऐसे अनेक प्रसंग हैं, जहां संवाद स्थापित मान्यताओं को चुनौती देता दिखाई देता है। यहां प्रश्न को विद्रोह मानकर दबाने के बजाय उसे ज्ञान प्राप्ति का साधन माना गया। गुरु-शिष्य संवाद इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। शिष्य प्रश्न करता है, गुरु उत्तर देता है और कई बार शिष्य का अगला प्रश्न उस उत्तर को और गहराई तक ले जाता है। इस प्रक्रिया में उद्देश्य किसी को पराजित करना नहीं, सत्य तक पहुंचना होता है।

यही बात आज युवाओं के संदर्भ में भी लागू होती है। युवाओं को अपने से अलग किसी वर्ग में मानना भारतीय दृष्टि नहीं है। वे परिवार और समाज का हिस्सा हैं। उनके मन में उठने वाले प्रश्न भी समाज के भविष्य से जुड़े प्रश्न हैं।

हालांकि संवाद का अर्थ यह नहीं कि उनकी हर बात स्वीकार कर ली जाए। संवाद का अर्थ है उनके प्रश्नों को गंभीरता से सुनना, उनकी पृष्ठभूमि समझना और तर्कपूर्ण उत्तर देना। असहमति हो सकती है, लेकिन असहमति के कारण संवाद समाप्त नहीं होना चाहिए। प्रश्न को दबाने से जिज्ञासा समाप्त नहीं होती, बल्कि वह भीतर ही भीतर और गहरी होती जाती है। संवाद उस जिज्ञासा को सही दिशा देता है।

भारत की संस्कृति में सत्य का आग्रह सबसे ऊपर रहा है। इसलिए यदि कोई सत्य के लिए प्रश्न करता है तो वह सामने खड़े व्यक्ति की स्थिति से भयभीत नहीं होता। वह अपने पिता से प्रश्न कर सकता है, गुरु के सामने प्रश्न रख सकता है, विद्वानों की सभा में अपनी बात कह सकता है और आवश्यकता पड़े तो सत्ता के सामने भी खड़ा हो सकता है। प्रश्न करने वाले की उम्र छोटी हो सकती है, लेकिन यदि उसका आग्रह सत्य के लिए है तो उसकी बात का महत्व कम नहीं हो जाता।

आज आवश्यकता इस बात की है कि युवाओं के प्रश्नों को किसी बाहरी या आयातित विमर्श की दृष्टि से देखने के बजाय अपनी परंपरा के आईने में देखा जाए। समस्या तब पैदा होती है जब हम युवाओं को अपने से अलग समझने लगते हैं। यदि हमारे बच्चे परिवार, समाज और संस्कृति का हिस्सा हैं तो उनके प्रश्न भी हमारे साझा भविष्य का हिस्सा हैं। उन्हें संवाद में शामिल करना किसी कृपा का विषय नहीं, बल्कि एक स्वस्थ सामाजिक परंपरा का स्वाभाविक विस्तार है।

भारत की संवाद परंपरा का मूल भाव यही है कि सत्य किसी एक व्यक्ति, संस्था या आयु वर्ग की निजी संपत्ति नहीं है। सत्य की खोज में प्रश्न करने वाला हर व्यक्ति महत्वपूर्ण है। नचिकेता ने प्रश्न किया तो यमराज को उत्तर देना पड़ा। अष्टावक्र ने प्रश्न किया तो विद्वानों की सभा को अपने अहंकार का सामना करना पड़ा। यही भारतीय संस्कृति की शक्ति है-यह प्रश्न से डरती नहीं, बल्कि प्रश्न के माध्यम से सत्य तक पहुंचने का मार्ग खोलती है।

इसलिए आज जब युवाओं के साथ संवाद की बात हो रही है तो हमें याद रखना चाहिए कि यह कोई नई शुरुआत नहीं है। हमारी परंपरा पहले से ही सिखाती आई है कि युवाओं को सुनिए, उनके प्रश्नों को समझिए और यदि वे सत्य का आग्रह लेकर सामने खड़े हैं तो उनके प्रश्नों का सम्मान कीजिए। क्योंकि संवाद वहीं से जन्म लेता है, जहां प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता होती है,

X@hiteshshankar

Topics: Body Shamingअष्टावक्र भारतीय संस्कृतिअल्फाकठोपनिषदभारतीय संस्कृतियुवा संवादभारतीय दृष्टिपाञ्चजन्य विशेषजेन जीनचिकेताजिज्ञासा
हितेश शंकर
हितेश शंकर
हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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