डिजिटल दुनिया में पली-बढ़ी जेनरेशन-जेड यानी जेन-जी के लिए लोगों से जुड़ना भले ही आसान दिखाई देता हो, लेकिन प्रोफेशनल लाइफ में यही पीढ़ी एक अलग तरह की झिझक का सामना कर रही है। सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर लगातार एक्टिव रहने के बावजूद 83 प्रतिशत युवा ऐसे लोगों से संपर्क करने से बच रहे हैं, जो उनके करियर को नई दिशा दे सकते हैं। प्रोफेशनल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म लिंक्डइन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 83 प्रतिशत जेन-जी पेशेवर उन लोगों से बातचीत करने में हिचकिचाते हैं, जिनसे उन्हें करियर संबंधी सलाह, मार्गदर्शन और नए अवसर मिल सकते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है, जजमेंट का डर (44 प्रतिशत), दूसरों को परेशान करने की चिंता (39 प्रतिशत), अपनी बात को बनावटी लगने की आशंका (37 प्रतिशत) जेन-जी को उपयोगी सलाह लेने, संपर्क बनाने और नए अवसर हासिल करने से रोक रही है। यह रिपोर्ट सेंसेसवाइड द्वारा 20 जुलाई से 11 अगस्त, 2026 के बीच 12 देशों (भारत, ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड, सिंगापुर, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब) में फुल-टाइम और पार्ट-टाइम काम करने वाले 18 से 80 वर्ष की उम्र के 18,050 लोगों के बीच किए गए सर्वेक्षण पर आधारित है।
हालांकि, भारत के 79 प्रतिशत जेन-जी युवा प्रोफेशनल रिश्ते को जरूरी मानते हैं, लेकिन आधे से ज्यादा (52 प्रतिशत) को यह नहीं पता कि शुरुआत कैसे करें और 53 प्रतिशत को संपर्कों को वास्तविक संबंधों में बदलने में कठिनाई होती है और वे इस बात को लेकर चिंतित होते हैं कि इसके लिए उन्हें क्या कीमत चुकानी पड़ेगी। 59 प्रतिशत जेन-जी भारतीयों का कहना है कि उन्हें किसी ने स्पष्ट रूप से नहीं सिखाया कि नेटवर्किंग कैसे की जाती है। वहीं, एक-तिहाई जेन-जी (30 प्रतिशत) का कहना है कि उन्हें अपनी नौकरी ऑनलाइन प्रोफेशनल कम्युनिटीज के जरिए मिली।
खुद को साबित करना एक बड़ी चुनौती
आज प्रतिस्पर्धा के दौर में खुद को साबित करना और आगे बढ़ना एक बड़ी चुनौती बन गया है। केवल शैक्षणिक योग्यता और तकनीकी दक्षता होना ही पर्याप्त नहीं है। सही लोगों से संपर्क, अपने काम को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करना, अनुभवी पेशेवरों से सलाह लेना और अवसरों के बारे में जानकारी हासिल करना भी करियर की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके बावजूद जेन-जी का एक बड़ा हिस्सा नेटवर्किंग को लेकर असहज महसूस कर रहा है।
लोग क्या सोचेंगे की चिंता
जेन-जी पेशेवरों की झिझक के पीछे सबसे बड़ा कारण आंके जाने का डर है। करीब 44 प्रतिशत युवाओं को आशंका रहती है कि सामने वाला व्यक्ति उनके बारे में नकारात्मक राय बना सकता है। उन्हें लगता है कि कहीं उनका सवाल अपरिपक्व न लगे या उनकी जानकारी कम न आंकी जाए। 39 प्रतिशत युवा यह सोचते हैं कि वे कहीं सामने वाले व्यक्ति को परेशान तो नहीं कर रहे। वहीं 37 प्रतिशत जेन-जी पेशेवरों को डर रहता है कि उनसे की गई बातचीत कहीं बनावटी या स्वार्थपूर्ण न लगे। यानी समस्या लोगों तक पहुंचने की क्षमता की नहीं, बल्कि बातचीत शुरू करने से पहले पैदा होने वाली झिझक की है।
ऑनलाइन कनेक्शन और वास्तविक नेटवर्किंग में अंतर
जेन-जी को ऐसी पीढ़ी माना जाता है जिसने इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल संचार को अपने जीवन का सामान्य हिस्सा बनते हुए देखा है। मैसेज, कमेंट, वीडियो कॉल और सोशल नेटवर्क के जरिए बातचीत करना इनके लिए नया नहीं है। इसके बावजूद जब बात किसी वरिष्ठ अधिकारी, नियोक्ता, उद्योग विशेषज्ञ या अन्य करियर से जुड़ी बातचीत शुरू करने की आती है तो उनका आत्मविश्वास कमजोर पड़ जाता है। दरअसल, सोशल मीडिया पर किसी को फॉलो करना और पेशेवर रिश्ते को आगे बढ़ाना दो अलग चीजें हैं। नेटवर्किंग का मतलब केवल संपर्कों की संख्या बढ़ाना नहीं है। इसमें सामने वाले व्यक्ति के अनुभव को समझना, सही सवाल पूछना, अपने उद्देश्य को स्पष्ट रखना और लंबे समय तक पेशेवर संबंध बनाए रखना शामिल है।
करियर के अवसरों पर पड़ सकता है असर
नेटवर्किंग से दूरी जेन-जी के लिए भविष्य में चुनौती बन सकती है। कई नौकरियों और अवसरों की जानकारी औपचारिक विज्ञापनों से पहले व्यक्तिगत और पेशेवर नेटवर्क के माध्यम से सामने आती है। किसी अनुभवी व्यक्ति की सलाह से युवा अपना रिज्यूमे बेहतर कर सकता है, इंटरव्यू की तैयारी कर सकता है या किसी नए क्षेत्र की संभावनाओं को समझ सकता है। ऐसे में केवल इस डर से किसी अनुभवी व्यक्ति से संपर्क न करना कि वह क्या सोचेंगे, युवा के लिए अवसरों का नुकसान भी बन सकता है। खासकर करियर की शुरुआत में एक सही सलाह कई महीनों और वर्षों की दिशा बदल सकती है। लोगों से संपर्क करने का बेहतर तरीका यह हो सकता है कि वे छोटे स्तर से शुरुआत करें। किसी वरिष्ठ के काम की सराहना करते हुए उनसे एक छोटा सवाल पूछना, किसी पेशेवर से उनके अनुभव के बारे में जानकारी लेना या किसी विषय पर मार्गदर्शन मांगना नेटवर्किंग की शुरुआत हो सकती है। इसके साथ ही कंपनियों और संस्थानों की भी जिम्मेदारी है कि वे ऐसा माहौल तैयार करें, जहां युवा सवाल पूछने या अपनी बात रखने में असहज महसूस न करें।

















