सरदार उधम सिंह : लंदन जाकर जलियांवाला बाग के गुनहगार को उतारा मौत के घाट
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सरदार उधम सिंह : लंदन जाकर जलियांवाला बाग के गुनहगार को उतारा मौत के घाट

सन् 1919 को जलियाँवाला बाग में निरपराध भारतीय जनता की एक सभा पर गोलियों की वर्षा की गई। यह अमानवीय कृत्य इतिहास के काले पृष्ठों पर लिखा गया।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by Mahak Singh
Jul 31, 2026, 02:48 pm IST
inपंजाब

सन् 1919 को जलियाँवाला बाग में निरपराध भारतीय जनता की एक सभा पर गोलियों की वर्षा की गई। यह अमानवीय कृत्य इतिहास के काले पृष्ठों पर लिखा गया। इस समय कितने ही व्यक्ति मारे गये, कितने ही घायल हो गए। उस भीड़ में एक बालक भी था। सरदार ऊधमसिंह गोलियाँ चलाने वाले पर बहुत कुपित हुए। उन्होंने कहा- ‘‘मैं भी इसको मारूँगा।’’ प्रतिशोध की यह अग्नि उसके हृदय-कुण्ड में लगातार जलती रही। हर समय उसको यही लगा रहता था कि मुझे उस हत्यारे को दण्ड देना है जिसने मेरे भाइयों को इस प्रकार गोलियों से भूनकर रख दिया है।

ऊधम सिंह इंजीनियर बने। दैनिक कृत्य सम्पन्न करते, पढ़ते-लिखते उन्हें अपना मिशन याद रहता। वह इस अवसर की ताक में थे कि जो पंजाब का तत्कालीन लैफ्टिनेंट गवर्नर ओ ड्वायर यह हत्याकाण्ड कराके इंग्लैंड भाग गया है, जब भी भारत वापस आएगा, तभी उसे दण्ड देने का अवसर मिलेगा। इस प्रकार प्रतीक्षा करते-करते जब उनका धैर्य जवाब दे गया तो वह आगे पढऩे का बहाना बनाकर इंग्लैंड चले गये। उस समय इंग्लैंड में देशभक्तों का एक अच्छा संगठन हो चुका था। ऊधम सिंह इसी घात में रहता था कि कब ओ ड्वायर से भेंट हो। इतने बड़े शहर में एक व्यक्ति को पाना बड़ा कठिन होता है। वह किसी सार्वजनिक आयोजन की प्रतीक्षा में थे। 13 मार्च, 1940 को यह प्रतीक्षा समाप्त हुई। यह दिन भारतीय गौरव के दिनों में चिरस्मरणीय रहेगा। लन्दन के कैक्सटन हाल में सेन्ट्रल एशियन सोसायटी व ईस्ट इण्डिया एसोसिएशन के संयोजन में एक सार्वजनिक सभा हुई। इसमें सर माइकल ओ ड्वायर का भी भाषण था जिसकी पूर्व सूचना प्रसारित कर दी गई थी। सरदार ऊधम सिंह को लगा कि अब उसका स्वप्न साकार होने ही वाला है।

माइकल ओ ड्वायर का वध

वह जाकर मंच के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। माइकल ओ ड्वायर, लेफ्टिनेंट गवर्नर पद पर रहते जिसके हुक्म से पंजाब में जलियाँवाला गोली-काण्ड हुआ था, भाषण देने खड़ा हुआ। वह अपने स्थान से उठ खड़ा हुआ। उसे अपने रिवालवर का निशाना बना कर ऊधम सिंह ने तीन फायर किए ओ ड्वायर धराशायी हो गया, उसका वहीं प्राणान्त हो गया। दो अन्य व्यक्ति बाल-बाल बचे। सरदार उधम सिंह को पकड़ लिया गया और जेल भेज दिया गया। उनके सिर से बहुत बड़ा बोझ हट गया। न्यायालय ने उन्हें मृत्यु-दण्ड की सजा दी।

उधम सिंह के अंतिम शब्द

उधम सिंह के शब्दों में उनके समय के क्रांतिकारियों करतार सिंह सराभा और भगत सिंह की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। ओ’ड्वायर को मारने से पहले उन्होंने कहा था, ‘मुझे फर्क नहीं पड़ता, मरने से मुझे कोई समस्या नहीं है। बुढ़ापे तक इंतजार करने का क्या मतलब है ? उससे कुछ नहीं होने वाला। मरना ही है तो जवानी में मरना बेहतर है। ये बेहतर है क्योंकि मुझे पता तो है कि मैं क्या कर रहा हूँ!’ थोड़ी देर रुकने के बाद उन्होंने फिर कहा, ‘मैं अपनी मातृभूमि के लिए मर रहा हूँ।’ 13 मार्च, 1940 को दिए गए एक बयान में उन्होंने कहा था, ‘मैंने अपना विरोध जताने के लिए गोली चलाई थी। मैंने ब्रिटिश साम्राज्यवादी भारत में लोगों को भूख से मरते हुए देखा है। मैंने ही वो किया पिस्तौल तीन या चार बार चली। मैं अपने प्रोटेस्ट के लिए माफ़ी नहीं मांगूंगा। ऐसा करना मेरा फ़र्ज़ था। सज़ा थोड़ी बढ़ा दो। सिर्फ़ इसलिए कि मैंने अपनी मातृभूमि के लिए प्रोटेस्ट किया, मुझे इस सज़ा से कोई दिक्कत नहीं है। दस, बीस, पचास साल, या मुझे फांसी भी दे दो- मैंने अपना फ़र्ज़ निभाया है।

जज और उधम सिंह में संवाद

जब जज एटकिन्सन ने पूछा कि उन्हें ‘क्यों न उन्हें कानून के मुताबिक सजा दी जाए ‘, तो उन्होंने कहा, ‘मैं कहता हूँ ब्रिटिश साम्राज्यवाद का नाश हो। तुम कहते हो भारत में शांति नहीं है! हमारे हिस्से सिर्फ ग़ुलामी है। तथाकथित सभ्यताओं की पीढ़ी दर पीढ़ी ने हमारे हर तरह के घटिया और नीच किस्म के अत्याचार किए। तुम्हें बस ये करना है कि अपना इतिहास पलट कर पढ़ लो। अगर तुम्हारे अंदर रत्ती भर भी मानवीय शालीनता है, तो तुम्हें शर्म से मर जाना चाहिए। जिस क्रूरता और रक्तपिपासु प्रवृति के तथाकथित बुद्धिजीवी हैं और खुद को सभ्यताओं का शासक कहते फिरते हैं, वो दोगले हैं।’ जस्टिस एटकिन्सन-मैं तुम्हारे राजनैतिक भाषण को नहीं सुनने वाला। अगर इस केस से जुड़ी कुछ काम की बात हो, तो कहो। उधम सिंह-मुझे ये कहना है। मैं विरोध करना चाहता हूँ।  एटकिन्सन -तुम ये जान लो कि तुम जो भी कह रहे हो, उसमें से कुछ भी प्रकाशित नहीं किया जाएगा। जो भी कहना है केस के संदर्भ में संक्षिप्त रूप में कहो। चलो, बोलो। उधम सिंह -मैं विरोध कर रहा हूँ। यही मेरा मानना है। मैं तो उस भाषण के संदर्भ में निर्दोष हूँ। ज्यूरी को उस भाषण को लेकर बहलाया गया है। मैं अब इसे पढ़ रहा हूँ। ज. एटकिन्सन -ठीक है, पढ़ो। और ध्यान रहे उतना ही बोलो कि ‘क्यों ना तुम्हारे ऊपर कानून के हिसाब से सजा सुनाई जाए।’

उधम सिंह -मुझे सजा से कोई लेना-देना नहीं। ये मेरे लिए कोई मतलब नहीं रखता। मुझे मौत या किसी अन्य चीज से फर्क नहीं पड़ता। मुझे रत्ती भर भी चिंता नहीं है। मैं एक उद्देश्य के लिए मर रहा हूँ। हम इस ब्रिटिश साम्राज्य से त्रस्त हैं। मुझे मरने से डर नहीं लगता। मुझे तो मरने पर गर्व है, गर्व है कि मैं अपने देश को आजाद करा पाऊँगा। मुझे आशा है कि जब मैं चला जाऊँगा तो मेरे जैसे हजारों मेरी जगह लेंगे और तुम्हारे जैसे घटिया कुत्तों को अपने देश से निकाल बाहर करेंगे; देश को आजाद कराएँगे। मैं एक अंग्रेजी ज्यूरी के समक्ष हूँ। मैं एक अंग्रेजी कोर्ट में हूँ। तुम लोग भारत जाते हो और जब वहाँ से आते हो तो तुम्हें पुरस्कार दिया जाता है और हाऊस ऑफ कॉमन्स में चुना जाता है। जब हम इंग्लैंड में आते हैं, तो हमें मौत की सजा सुनाई जाती है! मेरा कोई मतलब था ही नहीं; लेकिन मैं इसे भी स्वीकार करूँगा। मुझे इसके किसी भी हिस्से से कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन जब तुम्हारे जैसे नीच कुत्ते भारत आएँगे, तो एक समय आएगा जब तुम्हारा भारत से सफाया हो जाएगा। तुम्हारा सारा ब्रिटिश साम्राज्यवाद चकनाचूर कर दिया जाएगा। सरदार उधम सिंह को 31 जुलाई 1940 को फांसी की सजा दी गई।

Topics: जलियांवाला बाग नरसंहारJallianwala Bagh MassacreMichael O'DwyerUdham Singh BiographyHistory of Udham SinghFreedom Fighter Udham Singh
राकेश सैन
राकेश सैन
वरिष्ठ पत्रकार। पंजाब के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन। [Read more]
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