जलियांवाला बाग का नृशंस नरसंहार और उधम सिंह का प्रतिशोध
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जलियांवाला बाग का नृशंस नरसंहार और उधम सिंह का प्रतिशोध

13 अप्रैल की तिथि आते ही जलियांवाला बाग के नरसंहार की बेगुनाह हुतात्माओं का हृदय विदारक दृश्य मन - मष्तिष्क को विचलित कर देता है और असभ्य अंग्रेजों के द्वारा किए गए इस महापाप का दुखद स्मरण उनकी शैतानी, बर्बरता और पैशाचिक मनोवृत्ति को उजागर करता है।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Apr 13, 2026, 05:56 pm IST
in भारत

विश्व इतिहास का दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि ईसाई मिशनरियों और कट्टर ईसाई मतावलंबियों ने गॉड को दयालु, कृपालु, क्षमाशील एवं उनके मैसेंजर ईसा मसीह को प्रेम, क्षमा तथा बलिदान का प्रतीक बताकर उनके विपरीत घृणा, हिंसा, बर्बरता और दुश्चरित्रता का आचरण किया है। यही हाल इस्लाम के कट्टर मतावलंबियों और कट्टरपंथी मुल्ला – मौलवियों का रहा, जिन्होंने इस्लाम को शांति का पर्याय बताकर विश्व में अशांति और अराजकता का विस्तार किया। सनातनी भारत ने सदैव वसुधैव कुटुंबकम् के आदर्श का पालन किया, प्रेम और करुणा का सन्देश दिया परन्तु इस्लामिक और ईसाई आक्रातांओं ने गहरे घाव दिए। इन्हीं गहरे घाव में से एक है जलियांवाला नृशंस नरसंहार जिसे ईसाई अंग्रेजों ने दिया।

13 अप्रैल की तिथि आते ही जलियांवाला बाग के नरसंहार की बेगुनाह हुतात्माओं का हृदय विदारक दृश्य मन – मष्तिष्क को विचलित कर देता है और असभ्य अंग्रेजों के द्वारा किए गए इस महापाप का दुखद स्मरण उनकी शैतानी, बर्बरता और पैशाचिक मनोवृत्ति को उजागर करता है। सामूहिक बलिदान दिवस पर भोंपू (सायरन) भी नहीं बजता है। वास्तविकता यह है कि जलियांवाला बाग हत्याकांड नहीं वरन सामूहिक नरसंहार है, बलिदान दिवस है, परंतु वर्तमान संदर्भ में श्रद्धांजलि के साथ इस पर एक विश्लेषणात्मक विमर्श की आवश्यकता है।

इतिहास में हिंसा और सामूहिक संघर्षों की पुनरावृत्ति

इतिहास, इतिहास को दोहराता है। सामूहिक नरसंहार की परंपरा पश्चिमी संस्कृति और इस्लामिक जिहाद का महत्वपूर्ण हिस्सा है और जिसकी पुनरावृत्ति होती रही है, यथा तथाकथित मध्यकाल में महमूद गजनवी, सिकंदर लोदी, अलाउद्दीन खिलजी, तैमूर लंग, औरंगज़ेब, नादिरशाह दुर्रानी के द्वारा हिंदुओं का नरसंहार, स्वाधीनता के पूर्व मोपला नरसंहार, प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस, विभाजन के समय नरसंहार और स्वाधीनता के उपरांत 19 जनवरी 1990 का कश्मीरी ब्राम्हणों का नरसंहार  तथा 27 फरवरी 2002 का गोधरा नरसंहार। प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध और वर्तमान संदर्भ में रुस – यूक्रेन युद्ध में बूचा नरसंहार पश्चिमी संस्कृति की बर्बरता का ज्वलंत उदाहरण है।

इसलिए भारत के संदर्भ में जलियांवाला बाग नरसंहार से सबक लेने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में ऐसे नरसंहारों की पुनरावृत्ति ना हो सके। ऐसा तभी संभव होगा जब हिंदू मुखर होगा। आज 13 अप्रैल, इतिहास का अध्येता होने के कारण मन विचलित हो रहा है। मन को स्थिर रखने के लिए महान् स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता संग्रह “मुकुल” के पृष्ठ 80 और 81 पर दृष्टि टिकी, जिसमें “जलियांवाले बाग में बसंत” कविता है “बार बार पढ़ता हूं , तो करुण, वीर और रौद्र रस के भाव उमड़ते हैं और मन इतिहास के आज के दिन की स्मृतियां मस्तिष्क में टटोलने लगता है, परिणामस्वरूप मनोदशा के आवेग में प्रसूत होती है, जलियांवाला बाग के बलिदान की महागाथा और स्मृति पटल पर छा जाती है!!

सन् 1885 में कांग्रेस के उदारवादियों ने बरतानिया सरकार का सदैव समर्थन कर तथाकथित स्वाधीनता संग्राम किया था और इसलिए वे बरतानिया शासन को भारत में दैवीय कृपा मानते थे। प्रथम विश्व युद्ध में कांग्रेस के साथ महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार का भरपूर सहयोग किया। प्रथम विश्व युद्ध के लिए भारतीय सैनिकों की भर्ती करवाई, लाखों भारतीय सैनिक प्रथम विश्व युद्ध में लड़ने के लिए गए, जिसमें सरकारी आंकड़ों के हिसाब से 43000 सैनिकों का बलिदान हुआ। परंतु प्रथम विश्व युद्ध में इंग्लैंड की विजय के उपरांत उन्होंने स्वराज और स्वशासन की मांग पर मौन धारण कर लिया। यह भयानक छल ब्रिटिश सरकार द्वारा किया गया।

न दलील, न अपील, न वकील

प्रथम विश्व युद्ध के उपरांत बरतानिया सरकार ने अपनी क्षतिपूर्ति के लिए पुनः भयंकर रुप आर्थिक शोषण आरंभ किया, व्यापारियों और किसानों को बर्बाद कर दिया। भारतीय सैनिक जो प्रथम विश्व युद्ध में शामिल हुए थे, उनको नौकरियों से निकाल बाहर किया। इन सब विपरीत परिस्थितियों के चलते पंजाब में क्रांतिकारियों ने मोर्चा संभाल रखा था और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम उफान पर था। नेतृत्व गरम दल के बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिनचंद्र पाल जैसे महारथियों के हाथ में था। पंजाब स्वाधीनता संग्राम का केन्द्र बिन्दु बन रहा था और सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम जैसा वातावरण बन रहा था । जिसके दमन हेतु सिडनी रोलेट के अध्यक्षता में बनी समिति ने रोलेट एक्ट पारित कर दिया। इस एक्ट के अंतर्गत किसी भारतीय को संदेह के आधार पर गिरफ्तार किया जा सकता था और उसके विरुद्ध अपील नहीं की जा सकती थी। इसे ही काला कानून (ब्लैक एक्ट) कहा गया जिसका सीधा पर्याय था – न दलील, न अपील, न वकील।

जलियांवाला बाग नरसंहार की पृष्ठभूमि और बैसाखी सभा

पंजाब में इस एक्ट का भारी विरोध था। हिन्दू-मुस्लिम एकता चरम पर थी। मस्जिद की चाबी सत्यपालजी के पास और स्वर्ण मंदिर की चाबी सैफुद्दीन हसन किचलू के पास होने का समाचार तथा दोनों को नजरबंद कर लिया गया था एवं बहिष्कृत कर काला पानी की सजा की हवा भी गर्म थी। उपर्युक्त परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में पंजाब की स्थिति देखकर तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर साइमन ओ डॉयर घबराया हुआ था। अतः पंजाब में नृशंसता पूर्वक दमन चक्र आरंभ कर दिया गया, जिसके विरोध में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के पास जलियांवाला बाग में एक शांतिपूर्ण सभा होनी थी। 13 अप्रैल 1919 बैसाखी का पर्व था। विशेषकर पंजाब और हरियाणा तथा भारत का अति महत्वपूर्ण महापर्व है, दसवें सिख गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। इस वर्ष फसलें अच्छी हुई थीं और स्वतंत्रता आंदोलन की उमंग भी जोरों पर थी और प्रतिवर्षानुसार इस अवसर पर अमृतसर में सबसे बड़ा मेला लगा था। सुबह से ही दूर दूर से लोग मेले में आये हुए थे, और जलियांवाला बाग में सभा होने की खबर भी थी।

विश्व इतिहास का सर्वाधिक नृशंस सामूहिक नरसंहार

आखिरकार 4.30 बजे 6 से 10 हजार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अपने परिवार समेत स्वर्ण मंदिर में मत्था टेकने के उपरांत जलियांवाला बाग पहुंच रहे थे । उधर माईकल ओ डॉयर ने दोपहर 12.30 पर रेजीनाल्ड डायर (जनरल डायर) को बुलाकर निर्देश दे दिए। समय ठीक सायं 5.10 हो रहा था और दुर्गादास जी भाषण दे रहे थे, तभी रेजीनाल्ड डायर पर शैतान लूसीफर हावी हो गया और डायर ने बाग को घेर लिया। फिर जो हुआ वह अंग्रेजों की विश्व की सबसे कायराना हरकत थी और लोमहर्षक नरसंहार। इस सामूहिक नरसंहार में बिना किसी चेतावनी के सरकारी आंकड़ों के अनुसार 10 मिनट में 1650 धुआंधार गोलियां दागी गईं, जिसमें एक 7 माह के एवं एक 6 सप्ताह के बच्चे के साथ किशोर, युवा, मातृ शक्ति और वृद्ध सहित लगभग 1000 से अधिक पंचत्व को प्राप्त होकर अमर बलिदानी हुए, और 2000 घायल हुए इसमें भी कई की मृत्यु हुई।

यह विश्व इतिहास का सर्वाधिक नृशंस सामूहिक नरसंहार है। इसका मार्मिक चित्र वीरांगना सुभद्रा कुमारी चौहान जी की कविता “जलियांवाला बाग में बसंत” में इस प्रकार किया गया है-

“यहां कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।
कलियां भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।
परिमल-हीन पराग दाग़ सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग़ खून से सना पड़ा है।
ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक-स्थान यहां मत शोर मचाना।
वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।
कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।
लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद,ओस से कुछ कुछ गीले।
किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना।
कोमल बालक मरे यहां गोली खा कर,
कलियां उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।
आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं।
कुछ कलियां अधखिली यहां इसलिए चढ़ाना,
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।
तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,
शुष्क पुष्प कुछ वहां गिरा देना तुम जा कर।
यह सब करना, किन्तु यहां मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना। “

ब्रिटिश सरकार ने अन्याय की सभी हदें पार की

यह नरसंहार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में महान् सामूहिक बलिदान एवं ‘स्व’ के लिए पूर्णाहुति है।  नरसंहार के बाद लीपापोती के लिए ब्रिटिश सरकार ने अन्याय की सभी सीमाएं पार कर दीं। इस हत्याकांड की सब जगह निंदा हुई, परन्तु ‘ब्रिटिश हाउस ऑफ़ लाडर्स’ में जनरल डायर की प्रशंसा की गई। 14 अक्तूबर, 1919 को भारत सरकार ने जलियांवाला बाग हत्याकांड की जांच करने के लिए डिसऑर्डर इन्क्वायरी कमेटी (Disorders Inquiry Committee) के गठन की घोषणा की, जिसमें भारतीय सदस्य भी शामिल थे। इस समिति के अध्यक्ष लॉर्ड विलियम हंटर थे, जिसके कारण इसे हंटर कमीशन भी कहा जाता है। इस समिति में 8 सदस्य थे, जिनमें 5 ब्रिटिश और 3 भारतीय थे।

अध्यक्ष-लॉर्ड विलियम हंटर,पूर्व सॉलिसिटर-जनरल और स्कॉटलैंड के कॉलेज ऑफ जस्टिस के सीनेटर, डब्ल्यू.एफ. राइस, भारत सरकार के अतिरिक्त सचिव (गृह विभाग), न्यायमूर्ति जी.सी. रैंकिन, कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश; मेजर जनरल सर जॉर्ज बैरो, पेशावर डिवीजन के कमांडेंट, एक गैर-सरकारी अंग्रेज थे। भारतीय सदस्य के रुप में सर चिमनलाल सीतलवाड- बॉम्बे विश्वविद्यालय के कुलपति, पंडित जगत नारायण मुल्ला- संयुक्त प्रांत के अधिवक्ता और  सरदार सुल्तान अहमद खान- ग्वालियर राज्य के अधिवक्ता थे। इस समिति के सचिव मद्रास सरकार के सचिव एच.सी. स्टोक्स थे। वस्तुतः यह समिति जांच समिति नहीं,लीपापोती समिति थी। गांधी जी ने तो इसे निर्लज्ज समिति कहा है।

हंटर कमेटी रिपोर्ट: डायर को हल्की सज़ा

हंटर कमेटी ने मार्च 1920 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी, इसके पहले ही सरकार ने दोषी लोगों को बचाने के लिए इण्डेम्निटी बिल पास कर लिया था। कमेटी ने संपूर्ण प्रकरण पर लीपापोती करने का प्रयास किया था पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर को निर्दोष घोषित किया गया। अति तो तब हुई जब जनरल रेजिनाल्ड डायर ने जाँच समिति के सामने दिलेरी के साथ स्वीकार किया कि उसने यह नरसंहार जानबूझकर किया। बावजूद इसके समिति ने रेजिनाल्ड डायर पर दोषों का हल्का बोझ डालते हुए कहा कि डायर ने कर्तव्य को गलत समझते हुए जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया लेकिन जो कुछ किया निष्ठा से किया तत्कालीन भारतीय सचिव मांटेग्यू ने कहा जनरल डायर ने जैसा उचित समझा उसके अनुसार बिल्कुल नेक नियति से कार्य किया था।अतः उसे परिस्थिति को ठीक-ठीक समझने में गलती हो गई डायर को उसके अपराध के लिए नौकरी से हटाने का दंड दिया गया था।

रेजिनाल्ड डायर को ब्रिटिश साम्राज्य का शेर कहा

बरतानिया समाचार पत्रों ने रेजिनाल्ड डायर को ब्रिटिश साम्राज्य का रक्षक और बरतानिया लॉर्ड सभा ने उसे ब्रिटिश साम्राज्य का शेर कहा था,सरकार ने उसकी सेवाओं के लिए जनरल रेजिनाल्ड डायर को मान की तलवार की उपाधि प्रदान की थी।इंग्लैंड के एक समाचार पत्र मॉर्निंग पोस्ट ने जनरल डायर के लिए 30000 पाउंड धनराशि एकत्रित किया था।

उल्लेखनीय है, कि जलियांवाला बाग हत्याकांड के उपरांत जांच के लिए गठित 8 सदस्यीय हंटर कमेटी जिसमें 5 अंग्रेज और 3 भारतीय सदस्य रखे गए थे। उसमें नेहरु के समधी जगत नारायण मुल्ला भी एक सदस्य थे और उन्होंने अंग्रेजों का साथ देते हुए, जाँच में लीपा -पोती कर क्लीन चिट देने अपना सहयोग दिया था।अंत में अन्य सदस्यों ने भी यही किया परन्तु समिति से त्यागपत्र नहीं दिया।

जलियांवाला नरसंहार ही असहयोग आंदोलन का मूलाधार बना। जलियांवाला बाग हत्याकांड के सामूहिक बलिदान ने भारत में बिखरे राष्ट्रवाद को एकात्म कर दिया और महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की नींव रखी, जिसने बरतानिया सरकार को हिला के रख दिया था।जालियांवाले नरसंहार के विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने नाइटहुड की उपाधि को त्याग दिया। महात्मा गांधी ने कैसर-ए-हिंद की उपाधि वापस कर दी, जिसे बोअर युद्ध के दौरान अंग्रेज़ों द्वारा दिया गया था।वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के भारतीय सदस्य शंकर नायर ने इस हत्याकाण्ड के विरोध में कार्यकारिणी परिषद से त्यागपत्र दे दिया था।

सरदार ऊधम सिंह ने दुर्दांत अपराधी का किया वध

परन्तु अभी जलियांवाला बाग नरसंहार का अंतिम चरण शेष था, अभी न्याय होना था और यह तब हुआ जब 13 मार्च 1940 को 21 साल बाद महान् स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सरदार ऊधम सिंह ने इंग्लैंड जाकर दुर्दांत अपराधी माईकल ओ डायर को मौत के घाट उतार कर लिया। ब्रिटिश पंजाब में लेफ्टिनेंट गवर्नर रह चुका  माइकल ओ’ड्वायर इसमें शामिल था और वही निशाना था, क्‍योंकि उसके पंजाब की कमान संभाले रहने के दौरान ही जलियांवाला बाग नरसंहार हुआ था। ओ’ड्वायर ने जनरल डायर के निहत्‍थे भारतीयों पर गोली चलाने के हुक्‍म का समर्थन किया था वरन् उक्त आदेश भी उसी का था।

भारत के सिंह, उधम सिंह ने 21 वर्ष की तपस्या के बाद लंदन में जाकर जलियांवाला बाग हत्याकांड के दरिंदे हत्यारे अंग्रेजी बेजर, माईकल ओ ड्वायर का शिकार 13 मार्च 1940 को किया था,परिणामस्वरुप न्यायालय में प्रकरण चला और उधम सिंह ने दिलेरी विचारण न्यायालय में वाद का सामना करते हुए ईसाईयत पर टिप्पणी करते हुए, अंग्रेजों को ‘डर्टी डॉग्स’ कहा और उन्हें करोड़ों भारतीयों की हत्या का जिम्मेदार बताते हुए, अपने आपको निर्दोष बताया परंतु बरतानिया सरकार ने अंततः 31 जुलाई सन् 1940 को लंदन में फाँसी पर लटका दिया गया। क्या खालिस्तानी समर्थक और ईसाई मत स्वीकार करने वाले अलगाववादी सिक्खों के ज्ञान के कपाट खुलेंगे?

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डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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Niger terrorist Attack

नाइजर में ISIS का कत्लेआम: मस्जिद में नमाजियों पर हमला, 44 की मौत

विभाजन की त्रासदी का ऐतिहासिक नग्न सत्य

जलियांवाला बाग

जलियांवाला बाग नरसंहार: बर्बरता की खूनी दास्तान, हजारों लोगों पर दस मिनट तक होती रही फायरिंग

अंग्रेजों की बर्बरता का स्याह पन्ना

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Sudeep Bandopadhyay Meets Amit shah

टीएमसी में भगदड़! ममता के करीबी सुदीप बंद्योपाध्याय ने गृहमंत्री अमित शाह से की मुलाकात, हलचल तेज

Indian man killed in London

लंदन साउथॉल में भारतीय युवक गुर्भेज सिंह की चाकू से बेरहमी से हत्या

Patanjali civil service academy

पतंजलि सिविल सेवा अकादमी का शुभारंभ: IAS-IPS के लिए विरासत और विज्ञान का अनोखा संगम

Uttarakhand police

देहरादून: सहसपुर के बैरागीवाला में पानी की आपूर्ति पर विवाद, मुस्लिम युवकों के हमले में हिंदू युवक विनोद की मौत

Pauri garhwal encroachment

उत्तराखंड: पौड़ी जिले में गरजा बुलडोजर, सरकारी भूमि को कराया अतिक्रमण मुक्त

Patna Railway Station

पटना के पाटलिपुत्र स्टेशन पर छात्रों का बवाल: रेलवे में तोड़फोड़, आईजी जीतेंद्र राणा समेत कई पुलिसकर्मी घायल

PM Modi France visit

पीएम मोदी की फ्रांस यात्रा: G7 समिट में ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज

Indias ICBM System

भारत ने हासिल की ICBM रोकने की BMD क्षमता, DRDO के तीन परीक्षण सफल

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