बांग्लादेश में सरकार बन गई है, मगर सरकार बनने के बाद भी हिन्दू और अन्य अल्पसंख्यकों की स्थिति में अंतर नहीं आया है। उनकी स्थिति आज भी वैसी ही है और उन पर होने वाले अत्याचार थमे नहीं हैं। वैसे तो बांग्लादेश में किसी की भी सरकार रही हो, हिंदुओं पर अत्याचार आम थे। सभी ने देखा था कि कैसे कभी दुर्गा पूजा के पंडालों में झूठे बेअदबी के आरोप के चलते हिंदुओं के प्रति हिंसा भड़कती थी या फिर भारत के प्रधानमंत्री के बांग्लादेश दौरा करने पर भी वहाँ पर हिंसा भड़कती थी और वहाँ के हिंदुओं पर हमला करती थी।
ऐसे कई मामले और अवसर थे, जब सरकार किसी की भी रही हो, हिंदुओं को वहाँ पर जिहादी ताकतों का शिकार होना पड़ा था। और उसके बाद जब शेख हसीना को भारत आने के लिए बाध्य होना पड़ा तो उसके बाद से तो हिंदुओं पर अत्याचारों की जैसे बाढ़ आ गई थी। बांग्लादेश में कई सरकारी अधिकारियों को नौकरी छोड़ने पर मजबूर किया गया था और यूनिवर्सिटी तक को नहीं छोड़ा गया था। चटगांव यूनिवर्सिटी में वर्ष 2025 में संस्कृत के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. कुशल बरन चक्रवर्ती के साथ कुछ मुस्लिम छात्रों ने अभद्रता की थी। वे वहाँ पर प्रमोशन के लिए इंटरव्यू के लिए गए थे। मगर उनका यह प्रमोशन इस्लामी छात्र शिबिर ने होने नहीं दिया था। और वीसी कार्यालय का घिराव आदि करके प्रमोशन रद्द करने में सफलता पाई थी।
एक नहीं कई रिपोर्ट्स ऐसी थीं, जिनमें हिन्दू सरकारी कर्मचारियों को जबरन इस्तीफा देने के लिए इस्लामी कट्टरपंथी पार्टियों ने मजबूर किया था। उन्हें घेरकर डराया-धमकाने के साथ ही यह चेतावनी दी जाती थी कि अगर वे इस्तीफा नहीं देते, तो उन्हें मार दिया जाएगा। बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के सत्ता में आने के बाद कट्टर इस्लामी ताकतों को बढ़ावा मिला था और जब चुनाव हुए थे तो लोगों के दिल में यह विश्वास जागृत हुआ था कि अब शायद उनके साथ ऐसी घटनाएं न हों। मंदिर न तोड़े जाएं, संस्थागत भेदभाव न हो और उसके साथ ही उनके साथ नागरिकों जैसा व्यवहार हो। मगर यह दुर्भाग्य है कि मंदिरों को तोड़े जाने की घटनाएं भी कम नहीं हुई हैं। यह हम सभी ने देखा कि कैसे प्रभु श्रीराम के चित्र का ही अपमान किया गया।
क्या कहती है हालिया रिपोर्ट?
हाल ही में बांग्लादेश में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है, जिसमें एक बार फिर से हिंदुओं के साथ होने वाले अत्याचारों की पुष्टि की गई है। धार्मिक भेदभाव के खिलाफ काम करने वाले मानवाधिकार संगठन ‘बांग्लादेश हिंदू बौद्ध क्रिश्चियन यूनिटी काउंसिल’ ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में कहा कि इस वर्ष अभी तक बांग्लादेश में कम से कम 257 घटनाए अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो चुकी हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार इन 257 घटनाओं में 40 मामले ऐसे थे जिनमें 44 लोगों की जान गई; महिलाओं के खिलाफ हिंसा की पांच घटनाएं, जिनमें दुष्कर्म और सामूहिक दुष्कर्म शामिल हैं और 10 अपहरण, जबरन वसूली और यातना के मामले हैं। इसके अलावा, 42 घटनाओं में हमले, जान से मारने की धमकी या टॉर्चर शामिल थे, जबकि 62 घटनाओं में पूजा की जगहों पर हमले, मूर्तियों को नुकसान पहुंचाना, लूटपाट और आगजनी शामिल थी।
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जगन्नाथ यात्रा के समय टाइम बम?
बांग्लादेश से एक वीडियो सामने आया था, जिसमें एक चमत्कार ने ही हिंदुओं की जान बचाई थी। voice of bd hindus नामक हैंडल ने एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसमें लिखा था कि प्रभु जगन्नाथ ने बांग्लादेश में हिंदुओं की जान बचा ली। उसमें लिखा था कि ढाका में रथयात्रा के दौरान कथित रूप से जिहादियों ने हिन्दू शोभायात्रा में एक टाइम बम लगा दिया था।
मगर वह फटा नहीं और जब रथयात्रा गुजर गई तो एक पुलिस वाले ने देखा और फिर उसे डिफ़्यूज़ किया गया।
मगर यह एक घटना नहीं है। हिंदुओं को लेकर एक घटना सामने आ रही है, जिसमें बांग्लादेश में एक स्थानीय बीएनपी नेता मोहम्मद यूसुफ ने अपने हिन्दू पड़ोसियों को परेशान करने के लिए उनकी कालोनी का एकमात्र रास्ता hई बंद करा दिया। और अब बच्चे स्कूल जाने में अक्षम है और साथ ही वहाँ रहने वाले हिन्दू सड़क पर भी नहीं जा सकते हैं।
कई वीडियोज़ हैं, जिनमें बेअदबी के नाम पर हिंदुओं को मारने का दावा किया जा रहा है।
काउंसिल ने भी अपनी रिपोर्ट में यह बताया कि 2024 में अल्पसंख्यकों के साथ सबसे ज्यादा हिंसा हुई थी। और विस्तार से बताते हुए यह लिखा कि 23 महीनों में हिंसा का उतार चढ़ाव कैसा रहा है। उसने 5 अगस्त से 31 दिसंबर, 2024 तक के पांच महीने, 2025 के 12 महीने और 2026 के पहले छह महीनों में अल्पसंख्यकों के सात हुई घटनाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। काउंसिल के अनुसार, 23 महीनों के दौरान दर्ज कुल 2,963 घटनाओं में से 73.7 प्रतिशत 5 अगस्त, 2024 के बाद के पांच महीनों में हुईं, जिसे उसने बड़े पैमाने पर सामूहिक हिंसा का दौर बताया।
शेख हसीना के बांग्लादेश छोड़ने के बाद जिस प्रकार से बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साथ हिंसा और अत्याचार हुए हैं, वह यह दिखाने के लिए पर्याप्त हैं कि हर छोटी बात पर भारत की तरफ उंगली उठाने के स्थान पर अपने देश मे अल्पसंख्यकों की स्थिति पर बांग्लादेश कैसे बोलता तक नहीं है।

















