यह श्लोक भारतीय संस्कृति के उस मूल चिंतन को रेखांकित करता है जहां विद्या, धन, शौर्य और नम्रता का अंतिम उद्देश्य ‘राष्ट्र सेवा’ माना गया है।
आज का श्लोक –
सुधीराः सुवीराः च नम्राः सविद्याः
धनेनापि युक्ताः वयं निर्धनाः वा।
सदा सेवकाः भारतस्यास्य भूत्वा
धनं जीवनं चार्पयामस्तदर्थम्॥
भावार्थ-
चाहे हम धीर-वीर, नम्र और विद्वान हों, चाहे धनवान् या निर्धन हों। भारत माता के सेवक के नाते इसके लिए धन ओर जीवन अश्वय ही अर्पण करें। भाव यह है कि भारत माता के लिए सर्वस्य अर्पण हमारा कर्त्तव्य है।
आज के लिए प्रासंगिक-
यह श्लोक आज के युवाओं और नागरिकों को संदेश देता है कि आपकी सामाजिक या आर्थिक स्थिति चाहे जो भी हो, आपकी असली पहचान और सार्थकता इस बात में है कि आप अपने ज्ञान, शक्ति और संसाधनों से राष्ट्र निर्माण में कितना योगदान देते हैं।
आज देश की सबसे बड़ी जरूरत जिम्मेदार नागरिक बनना है। अपने कर्तव्यों का पालन करना, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करना, पर्यावरण को बचाना और संविधान का सम्मान करना ही आज के समय में जीवन अर्पण करने (समर्पण) का आधुनिक रूप है।

















