उत्तराखंड के जंगलों में क्यों बढ़ रही है इंसानों पर वन्यजीवों की दहशत? आंकड़े कर देंगे हैरान
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उत्तराखंड के जंगलों में क्यों बढ़ रही है इंसानों पर वन्यजीवों की दहशत? आंकड़े कर देंगे हैरान

उत्तराखंड के जंगलों में जंगली जानवर हिंसक हो रहे हैं और इंसानों का शिकार कर रहे हैं। स्थानीय लोग डरे हुए हैं और फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के खिलाफ विरोध कर रहे हैं।

Written byउत्तराखंड ब्यूरोउत्तराखंड ब्यूरो — edited by Mahak Singh
Jul 29, 2026, 02:39 pm IST
inउत्तराखंड
प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

उत्तराखंड के जंगलों में जंगली जानवर हिंसक हो रहे हैं और इंसानों का शिकार कर रहे हैं। स्थानीय लोग डरे हुए हैं और फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के खिलाफ विरोध कर रहे हैं। वन विभाग जंगलों के आसपास स्थानीय लोगों के बचाने में असफल साबित हुआ है। हाल ही में वाइल्डलाइफ बोर्ड की मीटिंग में यह मुद्दा खास तौर पर उठाया गया था। खुद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ज़रूरी है, लेकिन हमें इंसानों की जान भी बचानी चाहिए, और इसके लिए हर मुमकिन तरीका ढूंढना चाहिए।

सीएम धामी ने मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए प्रबंधन पर दिया जोर

सीएम धामी ने कहा कि जंगल के पास के गांवों के लोग जंगल में नहीं जाए,उन्हें चारा मिले ईंधन मिले ऐसे ही जंगली जानवरों को जंगल में ही भोजन मिले इसके लिए प्रबंधन करना चाहिए। उल्लेखनीय है कि पिछले सात महीनों में 118 खतरनाक वन्यजीव चिह्नित किए गए। इनमें 90 गुलदार, 21 बाघ और आठ भालू शामिल हैं। इनमें बाघों को पकड़ने के निर्देश दिए गए हैं। वन अधिकारियों के अनुसार, ये वे वन्यजीव हैं जो बार-बार आबादी वाले क्षेत्रों में घुसकर मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा बने। साथ ही कई मामलों में उक्त जानवर, जानलेवा हमलों में शामिल रहे। नविभाग का कहना है कि किसी भी वन्यजीव को मारने का फैसला अंतिम विकल्प के रूप में ही लिया जाता है, जब उसे पकड़ने या खदेड़ने के सभी प्रयास विफल हो जाते हैं। इसके लिए चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन से अनुमति ली जाती है।

उत्तराखंड में बढ़ा मानव-वन्यजीव संघर्ष

उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों में पहाड़ी और तराई क्षेत्रों में गुलदार, बाघ और भालुओं की आबादी के साथ उनका मानव बस्तियों की ओर रुख बढ़ा है। इससे हमलों और जान के नुकसान की घटनाएं बढ़ गई हैं। वन विभाग का मानना है कि सख्त कार्रवाई से लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी और संघर्ष की घटनाओं में कमी आएगी। आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में उत्तराखंड में बाघ और तेंदुए के हमलों में लगातार मौतें हुई हैं। वर्ष 2015 में बाघ के हमलों में 2 और गुलदार के हमलों में 26 लोगों की मौत हुई। 2016 में यह संख्या क्रमशः 4 और 23 थी, 2017 में 7 और 9, 2018 में 6 और 15, 2019 में 3 और 18 और 2020 में 1 और 30 थी। इसके बाद 2021 में बाघ के हमलों में 2 और तेंदुए के हमलों में 23, 2022 में 16 और 22, 2023 में 17 और 18, 2024 में 12 और 15 और 2025 में 12 और 18 मौतें दर्ज की गईं। वहीं, साल 2026 में अब तक बाघ के हमलों में 12 और तेंदुए के हमलों में 16 लोगों की जान जा चुकी है।

पिछले दशक में वन्यजीव हमलों में 327 लोगों की जान चली गई है। आंकड़े बताते हैं कि हमलों में गुलदार सबसे आगे हैं,जबकि बाघों के हमले भी बीते वर्षों में तेजी से बढ़े हैं। आई एफ एस डॉ पराग मधुकर धकाते कहते है जंगल वन्यजीवों के लिए है वहां इंसानी दखल नहीं होना चाहिए वैसे ही गाँवो की तरफ वन्य जीव नहीं आए ऐसे पुख्ता प्रबंध किए जाने पर विचार हो रहा है ये एक दीर्घकालीन योजना है। उन्होने भालुओं के व्यवहार में अचानक बदलाव की बात स्वीकारी और कहा इसपर विशेषज्ञ सर्वे भी कर रहे है, डॉ पराग ने कहा गर्मियों में जंगलों में लगने वाली आग से भी भालू विचलित हुए प्रतीत हो रहे है ऐसा असर अन्य वन्यजीवों पर देखा जा रहा है।

Topics: forest fireForest departmenttiger attackhuman wildlife conflictwildlife boardDr. Parag Madhukar DhakateWildlife AttacksWildlife Conservationleopard attackCM Pushkar Singh DhamiUttarakhand
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